हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० • • हित चौरासी सभी रस पूर्ण क्रियाएँ हैं। मेरी मान्यता है कि वर्णन में महाप्रभु पाद का उद्देश्य महारास वर्णन न होकर रस प्रक्रिया वर्णन है। – ६४ – अवतरण-श्रीवृन्दावन में सदा शरद एवं वसन्त का साम्राज्य छाया रहता है। निरन्तर श्रीलालजी अपनी मधुर मुरली की तान भी छेड़ा करते हैं और रस एवं भावों से परिपूर्ण अनेक लीलाओं की रचना योजना करते रहते हैं। वैसे ये हैं तो मुनियों के ध्यान में भी न आने वाले पर प्रेम परवश अपने अनन्य प्रेमी जनों के लिये श्रीवन में नित्य प्रकट हैं। इसी बात को श्रीहिताचार्य पाद प्रकट करते हैं- गौरी मूल-बैनु माई बाजै बंसीवट। सदा बसंत रहत वृंदावन पुलिन पवित्र सुभग जमुना तट।। जटिल क्रीट मकराकृत कुंडल मुखारविंद भँवर मानौं लट। दसननि कुंद कली छबि लज्जित सज्जित कनक समान पीत पट।। मुनि मन ध्यान धरत नहिं पावत करत विनोद संग बालक भट। दास अनन्य भजन रस कारन हित हरिवंश प्रकट लीला नट।।६४।। भावार्थ-(श्रीहित अलि ने सखियों से कहा) "हे सखी ! वंशीवट में वेणु तो बजती ही रहती है और यमुना के तट स्थित पवित्र एवं सुन्दर पुलिन पर; श्रीवन में सदा सर्वदा वसन्त भी रहा ही आता है। (ये वेणु बजाने वाले श्रीकृष्ण भी कितने सुन्दर हैं ? उनके श्रीअङ्गो में) मणियों से जड़ा हुआ किरीट और मकराकार कुण्डल शोभित हैं, मुख कमल पर अलकें क्या हैं मानों भ्रमर। दाँतों की पङ्क्ति से तो कुन्द की कलियों की छबि भी लजा उठी है। उनके शरीर पर स्वर्ण के जैसा पीत पट शोभा पा रहा है।" श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि जिन्हें अपने मन में ध्यान करते हुए मुनि जन (ध्यान तक में) नहीं पा सकते, वही बालकवत उन्नत किशोर 'सुरत रण शूर श्रीराधावल्लभ लाल निरन्तर श्रीवन में आमोद प्रमोद पूर्वक