हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 215, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • २०६ काचिद्रास परिश्रान्ता पार्श्वस्थस्य गदाभृतः। जग्राह बाहुना स्कन्धं श्लथ वलय मल्लिका।। तत्रैकांसगतं बाहुं कृष्णस्योत्पल सौरभम्। चन्दनालिप्तमाघ्राय हृष्टरोमा चुचुम्ब ह।। कस्याश्चिन्नाट्य विक्षिप्त कुण्डल त्विष मण्डितम्। गण्डं गण्डे संदधत्या अदात्ताम्बूल चर्वितम्।। नृत्यन्ती गायती काचित्कूजन्नूपुर मेखला। पार्श्वस्थाच्युत हस्ताब्जं श्रान्ताधात्स्तनयोः शिवम्।। श्रीमद्भागवत-१०/३३/११,१२,१३,१४ अर्थात् “कोई गोपी नृत्य करते करते थक गयी उसकी कलाइयों से कङ्कण और केशों से मल्लिका के पुष्प खिसकने लगे तब उसने श्रीकृष्ण के कन्धों को अपनी भुजाओं से पकड़ लिया। एक गोपी ने अपने कन्धे पर रखी हुई कमल कुसुम से सुगन्धित श्रीकृष्ण की चन्दन लिप्त भुजा को सूँघ कर आनन्द पुलकित होकर चूम लिया। एक गोपी ने नाचने से हिलते हुए कुण्डलों की कान्ति से सुशोभित अपना कोमल कपोल श्रीकृष्ण चन्द्र के कपोल से मिलाया तब श्रीकृष्ण ने उसके मुख में अपना चबाया हुआ पान दे दिया। कोई गोपी नूपुर और मेखला की झनकार करती हुई नाच और गा रही थी जब वह विशेष थक गयी, तो उसने अपनी बगल में विराजमान् श्रीकृष्ण चन्द्र का शीतल कर कमल अपने स्तन पर रख लिया।” 'इत्यादि; उक्त सभी प्रमाण बता रहे हैं, कि श्रीहिताचार्य्य पाद ने इस पद में महारास वर्णन की शैली से अपना लक्ष्य-इष्ट रस का गान किया है। दूसरी बात यहाँ पर यह भी जान लेने की है कि जैसे अन्यत्र रास वर्णन में श्रीहिताचार्य्य ने श्रीप्रियाजी की उपस्थिति प्रत्येक रास प्रसङ्ग में आवश्यक समझी और वर्णन की है, वैसी यहाँ नहीं समझी और की भी नहीं क्योंकि श्रीमद्भागवत की यही शैली है। रसज्ञ जन जानते हैं कि महारास वर्णन को श्रीमद्भागवत के अनुसार वर्णन करके श्रीहिताचार्य्य ने उसमें आदि से अन्त तक रस-केवल रस की धारा बहायी है। वेणु वादन, गोपी आगमन, नृत्य, आलिङ्गन, एवं चुम्बन आदि