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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

हित चौरासी • • २१३ जब प्रेमी की दृष्टि में सर्वत्र अपना इष्ट देव ही है तब अन्य है ही कहाँ ? तब उसका विरोध भी किससे और कहाँ रहा ? वह तो सर्वत्र उसे ही देखता है- जहँ देखौं तहँ आपनों इष्ट नाम गुरु धाम। ऐसे दृष्टि प्राप्त महात्मा के लिये विरोध करने के लिये कोई स्थल रह ही नहीं जाता। वह श्रीविहारिन देव जी के शब्दों में कहता है- अब हौं कासौँ बैर करौं। निजु मुख कहत पुकारत प्रभु हैं घट घट हौं विहरौं॥ इसी सर्वत्र इष्ट दर्शन की ऐकान्तिक साधना का मार्ग श्रीहरिराम 'व्यास' इस प्रकार प्रकट करते हैं- जाकी है उपासना, ताही की वासना; ताही कौ नाम रूप लीला गुन गाइये। यहै अनन्य धर्म परपाटी यहै; श्रीवृन्दावन तजि अनत न जाइये।। सोई व्यभिचारी आन कहै, आन करै, ताकौ मुख देखें दारुन दुख पाइये। 'व्यास' होइ उपहास त्रास कियें आस अछत कत दास कहाइये।। कितना स्पष्ट है इन व्यासजी की अनन्य धर्म परिपाटी ! जिसमें जिसकी उपासना उसी की वासना के साथ उसीके नाम रूप लीला गुणों का गान है। अपनी वस्तु से प्रीति है। अन्य किसी से विरोध का लेश भी नहीं। नित्य विहार का नित्य दर्शन करने वाले, सदा विहार की ऐनक लगाये हुए श्रावण के सूर परम रसिक श्रीभगवत रसिक जी के भी शब्द कुछ ऐसे ही हैं- नैननि देखौं और नहिं, श्रवन सुनौं नहिं और। घाँन न सूघौं और कछु, रसना कहौं न और।। रसना कहौं न और त्वचा परसौँ नहिं औरे। कुंज विहारी केलि झेलि इन्द्रिनु सब ठौरे।।

२१४ • • हित चौरासी भगवत रसिक अनन्य कोक उपदेसों सैननिं। बैननि मैंन जगाई रैन दिन देखौं नैननिं।। अनन्य श्रीभगवत रसिकजी अपनी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों से सदा, सर्वत्र श्रीकुअ विहारी की केलि का दिव्य रस ही झेलते रहते हैं। यह है रसिकों की रसिक अनन्यता। अनन्यता का स्थूल अर्थ करने वाले लोग जो प्रायः अन्य देवी देवताओं की निन्दा, विरोध, एवं उपेक्षा आदि जो कुछ करते हैं वे अपने प्रभु के व्यापक रूप विस्तार को भूलकर किसी सङ्कीर्ण दायरे में आ जाते हैं। वे श्रीहित ध्रुवदासजी के नीचे लिखे सिद्धान्त को भूल जाते हैं- अपने अपने इष्ट कौं भजहिं जीव ते धन्य। किसी की निन्दा या विरोध करते समय हम अपनी स्थिति से-अनन्यता से उसी क्षण पतित हो जाते हैं जब हमें अपने इष्ट को छोड़कर किसी अन्य की स्मृति भी हो आती है। अनन्यता तो वह है जहाँ उपासक की स्मृति, तन, मन प्राण और आत्मा के कण कण में अपने प्रियतम का रूप समाया रहे इस प्रकार- आओ प्यारे मोहना पलक झाँपि तोहिं लेऊँ। ना मैं देखौं और कौं ना तोहिं देखन देऊँ।। इस अनन्यता की साधना का पथ श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती पाद इस तरह बता रहे हैं- स्वान्तर्भाव विरोधिनी व्यवहृतिः सर्वाः शनैस्त्यज्यतां, स्वान्तश्चिन्तित तत्वमेव सततं सर्वत्र संधीयताम्। तद्भावेक्षणतः सदा स्थिरचरेऽन्यादृग्तिरोभाव्यतां, वृन्दारण्य विलासिनो निशि दिवा दास्योत्सवे स्थीयताम्।। अर्थात् “अन्तर्भावों के विरोध करने वाले सभी व्यवहारों को धीरे धीरे त्याग दें, अपने अन्तः करण के नित्य चिन्तनीय तत्व को ही सदा सर्वत्र खोजता रहे। (उसी अन्तः करण चिन्तित तत्व श्रीराधावल्लभलालजी के) भाव को स्थिर चर सब में सर्वत्र देखा करे, अन्य दृष्टियों का ही त्याग कर दे और श्रीवृन्दारण्य विलासी श्रीराधा मुरली मनोहर के दास्य सुख में ही दिन रात लगा रहे।”

४. पद ७१-८४: नित्य-विहार, युगल-केलि एवं ग्रन्थ उपसंहार

हित चौरासी • • २१५ और जब तक इस प्रकार विशाल भाव पूर्ण अनन्यता न होगी तब तक- "पंथ पावनो कठिन है कीन्हें कहा बनाव ?" इस अनन्यता के बिना सारी उपासना, प्रेम, परमार्थ, भक्ति, सभी व्यर्थ हैं दुःख रूप हैं। श्रीभगवत रसिकजी ने कहा है- असन वसन परिवार पुत्र विनु सब जग दुखिया। भगवत रसिक अनन्य विना कोऊ नहिं सुखिया।। इस अनेक वासना रूप दुःखों से मुक्त अनन्य रसिक दासों के लिये ही लीला नट प्रकट है। अतः प्रत्येक को अनन्य भावेन इस लीला नट का चरणाश्रय लेना प्रथम धर्म है। – ६५ – अवतरण-मानवती श्रीप्रियाजी को रासोत्सव में ले चलने के लिये श्रीहित सखीजी उन्हें प्रोत्साहन दे रही हैं। उन्होंने मानिनि से कहा- गौरी मूल-मदन मथन घन निकुंज खेलत हरि, राका रुचिर सरद रजनी। यमुना पुलिन तट सुरतरु के निकट, रचित रास चलि मिलि सजनी।। बाजत मृदु मृदंग नाचत सबै सुधंग; तैं न श्रवन सुन्यौ बैंनु बजनी। (जै श्री) हित हरिवंश प्रभु राधिका रमन, मोकौं भावै माई जगत भगत भजनी।।६५।। भावार्थ – (श्रीहित सजनी ने मानिनि श्रीराधा से कहा- हे मानिनि राधे!) देखो, पूर्ण चन्द्र मयी शरद की रुचिर सुन्दर रात्रि में कामदेव को मथित कर देने वाले श्रीहरि सघन लता भवन में (अलौकिक रास रस) खेल रहे हैं। हे सखी ! यमुना तट-पुलिन पर कल्पवृक्ष के ही निकट श्रीहरि ने रास की रचना की है; तुम भी चलकर उसमें मिलो ! अरी माई ! वहाँ कैसे मधुर-मधुर स्वर

२१६ • • हित चौरासी में मृदङ्ग बज रहे हैं और सब (सखियाँ) सुधङ्ग गति से नाच रही हैं क्या तुमने अपने कानों उनका मधुर वंशी वादन नहीं सुना ? श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु (सखी भाव से) कह रहे हैं- "हे सखी ! ये प्रभु राधिका रमण-आपके प्रियतम हैं और समस्त विश्व के (प्रेमी) भक्तों के भी भजनीय तत्व हैं। (तुम भले ही मान किये बैठी रहो, जाने तुम्हें ये कैसे लगते हैं पर) मुझे तो ये बहुत अच्छे लगते हैं, (अर्थात् मुझे और समस्त विश्व को ये अच्छे लगते हैं पर तुम्हें नहीं; क्योंकि तुम मान किये बैठी हो। यदि मान का त्याग कर दो तो तुम्हें भी वे अच्छे लगने लगे। वैसे तो सदा ही तुम्हें भी अच्छे लगते हैं पर अभी मान ने इतना अन्तर डाल दिया है। जो मान अपने प्यारे में बुराई का भ्रम उत्पन्न कर दे वह अवश्य और शीघ्र त्याज्य है; अतः आप अब शीघ्र मान का त्याग करके अपने परम प्रियतम से चल कर मिलें।) टिप्पणी— "जगत भगत भजनी" जीवों की रुचियाँ अनेक हैं और विचित्र हैं। इसलिये जीव उन रुचियों के अनुसार विषय, अर्थ, धर्म काम मोक्ष और भक्ति अनेक स्थलों से चिपटा है। उपासना के क्षेत्र में यदि किसी की रुचि, प्रेत, पितृ देवता या ब्रह्मा शिव आदि में है तो रही आवे, अलग बात है, वह तो "ऊधौ ! मन माने की बात !" है पर तत्व विचार या विवेक जन्य निर्णय से पूछा जाय तो यही उत्तर होगा कि जीवों के एकमात्र भजनीय केवल भगवान् श्रीकृष्ण हैं। ये परात्पर ब्रह्म हैं, सर्वेश्वर हैं और जीवों की एक मात्र गति हैं। समस्त जीव इनके सनातन अंश हैं। केवल यही ब्रह्म हैं; शेष इनके अतिरिक्त ब्रह्मा से लेकर स्तम्ब पर्यन्त सब जीव हैं चाहे उनके लिये पुराण और शास्त्रों की रचना ही क्यों न कर डाली गयी हो महत्ता प्रदर्शन के लिये। वेद पुराण एवं समस्त सच्छास्त्रों का यही निर्णीत मत है। प्रत्येक अकामी, सर्वकामी सकामी, एवं मोक्ष कामी के लिये यही भजनीय हैं अन्यत्र देवी देवताओं का भजन व्यर्थ भटकन है। श्रीमद्भागवत इसका निर्णय देता है— अकामः सर्वकामो वा मोक्षकामो उदार धीः। तीव्रेण भक्ति योगेन यजेतपुरुषः परम्॥ श्रीमद्भा. २/३/१०

हित चौरासी • • २१७ अर्थात् "कुछ भी न चाहने वाले, सब कुछ चाहने वाले, अथवा मोक्ष चाहने वाले उदार बुद्धि व्यक्तियों को चाहिये कि वे (अपनी समस्त कामनाओं की पूर्ति के लिये अन्य किन्हीं देवी देवताओं का यजन न करके) तीक्ष्ण भक्ति योग के द्वारा केवल परम पुरुष (भगवान् श्रीकृष्ण शुद्ध सत्व ब्रह्म) की ही आराधना करें।" परम मुमूर्षु राजा परीक्षित के लिये जीवन के अन्तिम दिनों में गङ्गा तट पर परम हंस शिरोमणि भगवान् शुक देव ने राजा के इस प्रश्न पर कि इस समय मेरा क्या कर्त्तव्य है ? यही उत्तर दिया था- तस्मात्भारत सर्वात्मा भगवान्हरिरीश्वरः। श्रोतव्यः कीर्त्तितव्यश्च स्मर्त्तव्यश्चेच्छता भयम्।। एतावान्सांख्य योगाभ्यां स्वधर्म्म परिनिष्ठया। जन्मलाभः परं पुंसामन्ते नारायण स्मृतिः।। प्रायेण मुनयो राजभिवृता विधिषेधतः। नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः।। श्रीमद्भागवत. २/१/५,६,७ अर्थात् "अतः हे भारत ! जिसे अभय पद की आवश्यकता हो उसे सबके आत्म स्वरूप भगवान् श्रीहरि का ही श्रवण कीर्त्तन और स्मरण करना चाहिये। सांख्य, योग तथा स्वधर्म्म निष्ठा आदि समस्त साधनों से अन्त काल में भगवान् का स्मरण रहे यही मनुष्य जन्म का परम लाभ है। हे राजन् ! जो मुनि जन त्रिगुणातीत भाव में स्थित होकर विधि निषेध मर्यादा से परे हो गये हैं, वे भी प्रायः श्रीहरि के गुण गान में ही रमण करते रहते हैं।" अब जिन भगवान् श्रीकृष्ण के भजन स्मरण और कीर्त्तन के ही लिये सत् शास्त्र आज्ञा देते हैं; वही शास्त्र उनकी सर्वोपरिता का भी निरूपण करते हैं; देखिये- एते चांशकला पुंसः कृष्णस्तु भगवान्स्वयम्। श्रीमद्भाग. १/३/२८ अर्थात् "अन्य सभी अवतार आदि तो अंश कलाएँ हैं पर ये श्रीकृष्ण तो परिपूर्णतम् ब्रह्म-भगवान हैं स्वयं भगवान् ! "

२१८ • • हित चौरासी ये भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त जीवों के भक्तों के, ज्ञानियों के, योगियों के और चराचर के एकमात्र भजनीय हैं। — ६६ — अवतरण—परम रमणीय एवं सर्वकाल सुखमय किसी एकान्त नव निकुञ्ज मन्दिर में श्रीयुगल किशोर की रस पूर्ण रति क्रीड़ा का प्रारम्भ होने जा रहा है। विहार के अवसर पर अत्यन्त प्रेमातुर श्रीलालजी के हृदय का इस पद में बड़ा ही सरस चित्र अङ्कित है साथ ही साथ उनकी प्रेमाधीनता और रस लोलुप वृत्ति का भी। दूसरे पक्ष में श्रीप्रियाजी की रस रूप गर्वोक्ति, गम्भीरता, कोमलता, उदारता, दान शीलता आदि उत्तम नायिकोचित गुणों का प्रकाश करने वाले भावों का समावेश है। विहार की एक रस धारा में काल का बोध भी न हो पाना त्रुटि मात्र में पुनः सायं काल आ जाना रस विहार अत्यन्त रमणीयता का द्योतक है। सम्पूर्ण पद दिव्य एवं अनिर्वचनीय रसमय भावों और शब्द मणियों से गुम्फित हार की तरह है जो युगल रसिक किशोर का हृदय हार बन रहा है। सुज्ञ रसिक जनों के लिये यह पद कितना मादक है अनुभवी ही जानते हैं। श्रीहित संखीजी साक्षी भाव से दर्शन करतीं और अपनी निकट सखियों को उस केलि का वर्णन करके सुनाती हैं- कल्याण मूल-विहरत दोऊ प्रीतम कुंज। अनुपम गौर स्याम तन सोभा वन वरषत सुख पुंज॥ अद्भुत खेत महा मनमथ कौ दुंदुभि भूषन राव। जूझत सुभट परस्पर अँग अँग उपजत कोटिक भाव॥ भर संग्राम भ्रमित अति अबला निद्रायत कल नैन। पिय के अंक निसंक तंक तन आलस जुत कृत सैन॥

हित चौरासी • • २१६ लालन मिस आतुर पिय परसत उरु नाभि उरजात। अद्भुत छटा विलोकि अवनि पर विथकित वेपथ गात॥ नागरि निरखि मदन विष व्यापित दियौ सुधाधर धीर। सत्वर उठे महामधु पीवत मिलत मीन मिव नीर॥ अबहीं मैं मुख मध्य विलोके बिंबाधर सु रसाल। जागृत ज्यौं भ्रम भयौ पर्यौ मन सत मनसिज कुल जाल॥ सकृदपि मयि अधरामृत मुपनय सुंदरि सहज सनेह। तव पद पंकज कौ निजु मंदिर पालय सखि मम देह॥ प्रिया कहति कहु कहाँ हुते पिय नव निकुंज वर राज। सुंदर वचन रचन कत वितरत रति लंपट बिनु काज॥ इतनौ श्रवन सुनत मानिनि मुख अंतर रह्यौ न धीर। मति कातर विरहज दुख व्यापित बहुतर स्वास समीर॥ (जै श्री) हित हरिवंश भुजनि आकरषे लै राखे उर माँझ। मिथुन मिलत जु कछुक सुख उपज्यों त्रुटि लव मिव भई साँझ॥६६॥ भावार्थ – दोनों प्रियतम (श्रीराधा एवं श्रीलालजी) कुञ्ज में विहार कर रहे हैं; दोनों की देह प्रभा अनुपम गौर एवं श्याम है; (दानों के अनुपम विहार से) वन में सुख पुञ्ज बरस सा रहा है। (युगल क्रीड़ा में) प्रचण्ड काम (मन्मथ) ही अद्भुत खेत (युद्ध का मैदान) है, भूषण ध्वनि ही मानो दुन्दुभि वाद्य हैं। (युगल किशोर के) अङ्ग प्रत्यङ्ग से उत्पन्न कोटि कोटि भावों का प्रकाश ही (दोनों योद्धाओं का) परस्पर जूझना है। भीषण युद्ध से अत्यन्त थकित हो जाने के कारण अवला श्रीप्रियाजी की सुन्दर आँखें नींद से भर गयीं और वे कृशाङ्गी आलस्य से भर प्रियतम की गोद में निः शङ्क भाव से सो गयीं। उस समय प्रेम और दुलार के बहाने प्रेमातुर प्रियतम उनके उरू, नाभि एवं उरोजों का स्पर्श करने लगे। (उस समय प्रियाजी के श्री अङ्गों की छबि देखकर उनका शरीर काँपने लगा और वे मूर्च्छित होकर गिर पड़े। (उनके मूर्च्छित होकर गिरने पर) नागरी श्रीप्रियाजी ने देखा, इनके मदन विष व्याप्त हो गया है, तब उन्होंने (प्रियतम को) अपनी अधर सुधा दी।

२२० • • हित चौरासी उस महामधु का पान करते ही प्रियतम शीघ्रता पूर्वक ऐसे उठ बैठे जैसे मीन को पानी मिल गया हो। (फिर अर्ध चेतन की सी अवस्था में कहने लगे-) "अहो ! अभी अभी तो मैंने अपने मुख के मध्य (किन्हीं) रसमय अधर बिम्बों का अनुभव किया था।" (इतनी स्मृति आते ही) फिर उन्हें पूर्ववत् जागृत की ही भाँति भ्रम हो गया कि मैं श्रीप्रियाजी के आलिङ्गन से वञ्चित हूँ; इसलिए उनका मन पुनः शत-शत कामदेवों के जाल में पड़ गया-वे अधिकाधिक व्यथित हो गये। (मन्मथ-व्यथा से व्यथित होकर श्रीलालजी दीनता पूर्वक श्रीप्रियाजी से विनय सी करने लगे; वे बोले-) "हे सुन्दरि ! आप स्वाभाविक स्नेह के साथ केवल एक ही बार सही अपने अधरों के अमृतका दान मुझे दीजिये ! हे सखि ! अब कृपा पूर्वक आप अपने श्रीचरण कमलों के निवास भवन रूप मेरे इस देह को (कामाग्नि में जलने से) बचाइये- इसका पालन कर लीजिये ?" प्रियतम के इन शब्दों को सुनकर) श्रीप्रियाजी ने कहा-"हे नव निकुञ वर राज ! हे प्रियतम !! तुम तब कहाँ थे ? (जब मैंने अधरामृत दिया था।) अरे रति लम्पट ! अब क्यों व्यर्थ इस (चाटुकारी पूर्ण) वचन रचना का विस्तार कर रहे हो ?" मानिनि प्रिया के मुख से अपने कानों ये शब्द सुनते ही (प्रियतम के) हृदय में धैर्य नहीं रह गया, उनकी बुद्धि कातर हो गयी और विरह जनित दुःख व्याप्त हो गया वे लम्बी लम्बी साँसे लेने लगे। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि श्रीलालजी की ऐसी प्रेम विह्वल दशा देखकर उदार हृदया श्रीप्रियाजी ने उन्हें अपनी भुजलताओं से आकर्षित करके अपने हृदय के बीच ले लिया। उस समय दोनों के मिलन में जो भी कुछ आनन्द उत्पन्न हुआ, (वह अवर्णनीय है, उसका केवल इतने से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि) उस सुख की विस्मृति में सन्ध्या तो त्रुटि लव मात्र समय जैसी हो गयी, (अर्थात् काल जाते पता न लगा और बहुत सा समय बीत कर फिर से दूसरी सन्ध्या आ लगी।) टिप्पणी – यह पद रति विहार भावना का बड़ा ही सूक्ष्म एवं गम्भीर परिचायक है। इसमें वर्णित रस युगल किशोर रसिक सखि गण एवं रसिक उपासक जनों का जीवन प्राण है। यों तो सम्पूर्ण 'हित चौरासी' के पद इसी एक

हित चौरासी • • २२१ रस से ओत प्रोत हैं किन्तु इसमें जितने स्पष्ट और सरस रूप से किसी छटा की झाँकी कराई गयी है वह व्यञ्जना बड़ी ही अनोखी और अभूत पूर्व है। इस पद में रस के प्रकाश एवं विकास में श्रीहिताचार्य्य चरण ने जिस कुशल शैली का अनुवर्त्तन किया है वह अद्वितीय है। अस्तु; इसमें वर्णित विषय गोप्य है अतः इसका वर्णन कथन, श्रवण सब कुछ मौन में ही है। यह हृदय में ही अनुभव करने की वस्तु है. श्रीनागरीदासजी कहते हैं- चरचा करी कैसे जाय? बात जानत कछुक हम पै कहत जिय थरराय।। मौन में ही कहनि ताकी सुनत श्रोता नैन। सोऽब नागर लोग बूझत कहि न आवत बैन।। कितनी अटपटी है इस रस की भाषा? मौन में कथन और नयन हैं श्रोता ? जिस प्रकार यह गोप्य है, उसी प्रकार गूढ़ भी इतना है कि इसे प्रकाश करने में श्रोत्रिय और रस निष्ठ सभी महानुभाव असमर्थ हैं, किसी न किसी कारण से। फिर भी कृपालु महानुभावों ने अभिलाषी उपासकों को प्रकाश अवश्य दिया है। श्रीहित ध्रवदासजी ने इस रस विलास की ओर जो इङ्गित किया है उससे इस रस के हृदयङ्गम करने में सहायता मिलेगी अवश्य। वे कहते हैं- प्रेम मदन के सिंधु द्वै बहत रहत दिन हीय। कबहुँ विवस चेतत कबहुँ छिन छिन प्यारी पीय।। छिन छिन प्यारी पीय मधुर रस बिलसत ऐसे। सूच्छम प्रेम की बात कहौ कोऊ बरनै कैसे।। यह सुख सखियन बाँट पर्यौ भूले ध्रुव सब नेम। इक रस फूलीं फिरतिं सँग पाइ माधुरी प्रेम।। अस्तु; इस रस की दुरूहता, गम्भीरता, उत्कृष्ट्ता, अलौकिकता, एवं लोक वेदातीत भावना को लक्ष्य में रखकर प्रकाशन करने में समर्थ रहने पर

२२२ • • हित चौरासी भी प्रकाशित न करने की ही आज्ञाएँ सर्वत्र हैं। एक स्थल पर चाचा श्रीहित वृन्दावन दासजी ने आज्ञा दी है- होइ भावना सिद्ध ताहि उर अंतर राखै। मरमी हू सौं बात कछू मित ही की भाखै।। धरमी मरमी बिना कहै तो टोटो परिहै। विमुख करें उपहास चित्त-भावुक जु विगरिहै।। प्रानन प्यारी वस्तु दुरायें डोलैं जतननि। विमुख कूँजरनि हाथ गहावै जनि रस रतननि।। अतः रसिक उपासक का धर्म है कि इस दिव्य रस सार रति विहार का अपने हृदय में अनुभव करके गोप्य ही रखे, बिना अधिकारी के किसी अन्य को इसे न दे, न दे। — ६७ — अवतरण-श्रीहित सजनी अपनी सखियों से परम सौन्दर्यमयी, रूप लावण्यमती श्रीप्रियाजी के नख शिख शृङ्गार का वर्णन करती हैं- कल्याण मूल- रुचिर राजत वधू कानन किसोरी। सरस षोडस कियें, तिलक मृगमद दियें, मृगज लोचन उबटि अंग सिर खोरी।। गंड पंडीर मंडित चिकुर चंद्रिका, मेदिनि कबरि गुंथित सुरंग डोरी। श्रवन ताटंक कै, चिबुक पर बिंदु दै, कसूँभी कंचुकी दुरै उरज फल कोरी।। वलय कंकन दोति, नखन जावक जोति, उदर गुन रेख पट नील कटि थोरी। सुभग जघन स्थली क्वनित किंकिनि भली, कोक संगीत रस सिंधु झक झोरी।।

हित चौरासी • • २२३ विविध लीला रचित रहसि हरिवंश हित; रसिक सिरमौर राधा रमन जोरी। भृकुटि निर्जित मदन मंद सस्मित वदन, किये रस विवस घन स्याम पिय गोरी॥६७॥ भावार्थ - "हे सखि ! श्रीवृन्दा कानन की नव वधू किशोरी बड़ी भली शोभित हो रही है। उनके अङ्ग उबटन से उवट कर रस पूर्ण सोलहों शृङ्गार से पूर्ण किये गये हैं। ललाट पर कस्तूरी का तिलक और सिर पर खोरी शोभित हैं उनके स्वाभाविक सुन्दर मृग छौने से लोचन हैं। युगल किशोर पण्डीर (केशर कस्तूरी पङ्क) से आभूषित-सज्जित हैं। केशों की चन्द्रिका मेदिनि के पुष्पों से गूँथी गयी है तथा कबरी सुरङ्ग डोरी से आबद्ध (बँधी) है। उन्होंने अपने कानों में कर्णफूल धारण करके, ललित चिबुक पर (श्याम) विन्दु धारण किया है; और उनकी कसूँभी चोली में परम सुन्दर उरज फलों की किनारे मात्र ही ढँकी हैं। (बाहुओं में) बाजूबन्द, कलाइयों में कङ्कण की प्रभा और नख मणियों में महावर (जावक) की ज्योति छा रही है। उदर में वलखाती हुई तीन रेखाएँ (त्रिवली) हैं, उन्होंने अपनी अत्यन्त क्षीण कटि पर नील पट धारण कर रखा है एवं सुन्दर सुभग जघन प्रान्त में कोक राग रागनियों की गायिका जैसी झनकार वाली करधनी शोभा पा रही है। स्पष्ट है कि यह किङ्किणि सुरत रस के समुद्र में अवश्य सराबोर हो चुकी है।" • श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु पाद सखी रूप से) कहते हैं- यह श्रीराधा रमण श्रीलालजी की, रसिक शिरोमणि जोड़ी है। यह (एकान्त कुञ्ज में) अनेक अनेक रस लीलाओं की रचना करती रहती है और इसने अपनी भृकुटियों से तो मदन को जीत लिया है और मन्द मुसकान से इस युवती (गोरी) ने प्रियतम घनश्याम (श्रीकृष्ण) को रस विवश कर रखा है। टिप्पणी-"सरस षोडस" शृङ्गार रस में सोलह शृङ्गारों का स्थान बहुत ऊँचा है। इनका वर्णन विद्वानों के मतों में कुछ अन्तर से पाया जाता है। पिछले प्रसङ्ग में केशव कवि के मत से सोलह शृङ्गार लिखे गये हैं। यहाँ रसिक महात्मा श्रीभगवत रसिक जी के मतानुसार सोलह शृङ्गारों के केवल नाम मात्र दिये जाते हैं-

२२४ • • हित चौरासी सुचिता, सील, सनेह गति, चितवन, हास, विलास। कच गूँथनि, सीमंत सुभ, भाल तिलक सुख रास॥ भाल तिलक सुख रासि, दृगनि अंजन अति सोहै। बीरी वदन, सुदेस चिबुक मुसिकन मन मोहै॥ जावक, मँहदी, अंग राग, भगवत, नित रुचिता। ये सोरह श्रृंगार मुख्य तामैं वर सुचिता॥

  • ६८ - अवतरण-इस पद में युगल किशोर के एकान्तिक रास नृत्य का वर्णन किया गया है। शरद की सुन्दर रात्रि में रसिक युगल किशोर ने रास क्रीड़ा की योजना की है। नाना प्रकार के वाद्य बज रहे हैं और युगल किशोर आनन्द मग्न होकर नृत्य कर रहे हैं। नृत्य की विविध प्रकार की गतियाँ लेते और घन दामिनि की भाँति एक मेक हो जाते हैं। श्रीहिताचार्य्य महाप्रभु इस रास रसोत्सव का वर्णन करते हैं- कल्याण मूल- रास में रसिक मोहन बने भामिनी। सुभग पावन पुलिन सरस सौरभ नलिन, मत्त मधुकर निकर सरद की जामिनी॥ त्रिविध रोचक पवन ताप दिनमनि दवन, तहाँ ठाढ़े रमन संग सत कामिनी। ताल बीना मृदंग सरस नाचत सुधंग; एक ते एक संगीत की स्वामिनी॥ राग रागिनि जमी विपिन वरसत अमी, अधर बिंबनि रमी मुरलि अभिरामिनी। लाग कट्टर उरप सप्त सुर सौं सुलप लेति सुंदर सुघर राधिका नामिनी॥ तत्त थेई थेई करत गतिव नौतन धरत, पलटि डगमग ढरति मत्त गज गामिनी।

हित चौरासी • • २२५ धाइ नवरँग घरी उरसि राजत खरी; उभय कल हंस हरिवंश घन दामिनी॥६८॥ भावार्थ-आज रसिक मोहन और भामिनि श्रीराधा रास में शोभित हैं। सुन्दर और पवित्र यमुना का पुलिन है शरद् की रात्रि है। कमल की सरस सुगन्ध से भ्रमरों के समूह के समूह मतवाले हो रहे हैं; वैसा ही रुचिकारक त्रिविध पवन वह रहा है जो दिन मणि सूर्य के ताप का दमन करने वाला है। उस पुलिन पर रमण श्रीकृष्ण अपने साथ शत शत कामिनियों को लिये खड़े हैं। बड़ी सरसता पूर्वक ताल, वीणा, मृदङ्ग आदि बज रहे हैं और सब मिलकर सुधङ्ग नृत्य कर रहे हैं। उन कामिनियों में से प्रत्येक एक से बढ़कर एक राग सङ्गीत की अधिष्ठाता प्रधान हैं। वहाँ राग रागिनियों का पूर्ण जमाव है जिससे वन में मानों अमृत(रस) बरस रहा है, और श्याम सुन्दर के अधरों पर परम सुन्दर मुरली विराज रही है। मुरली के सप्त स्वरों के साथ सुन्दरी 'राधा' नामक (कोई अनिर्वचनीय) कामिनि लाग, उरप, कट्टर, तिस्प आदि गतियों के साथ सुलप ले रही है। कभी तो वह तत्ता थेई-थेई' करती हुई नवीन गतियों को धारण करती है एवं कभी मत्त गज गामिनि की भाँति पलट कर (उलटी ओर लौटकर) डगमगाती ढलती हुई आ जाती है। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि (उस समय उस नृत्य परायणा प्रिया को) प्रियतम ने लपक कर शीघ्रता पूर्वक पकड़ लिया, तब प्रिया भी उनके हृदय से लिपट कर बड़ी शोभित हुईं। (शोभित क्यों न हों, क्योंकि दानों ही (केलि सरोवर के) सुन्दर हंस हैं; किंवा केलि रूप आकाश के विद्युत और वारिद हैं न !

  • ६९ - अवतरण-पुनः उपरोक्त पद्धति से रास क्रीड़ा का ही सरस वर्णन करते हैं- कल्याण मूल-मोहिनी मोहन रंगे प्रेम सुरंगे, मत्त मुदित कल नाचत सुधंगे।

हित चौरासी • • २३३ क्या नहीं है इन नयनों में? अमृत है, विष है और है उन्मत्त बना देने वाली मदिरा भी। तभी तो ये श्वेत हैं, श्याम हैं और अरुणिम हैं, इसीलिये इनका घायल जीता है, मरता है और झुक झुक पड़ता-झूम झूम जाता है। – ७४ – अवतरण – मानवती श्रीप्रियाजी को प्रियतम के समीप ले आने के लिये हित सखी ने समझाया, 'प्रिय राधे ! तुम अब मान छोड़कर प्रियतम के निकट चलो ! देखो, तुम्हारे बिना उनकी दशा कुछ अच्छी नहीं है। वे मुरली में यदि कुछ गाते हैं तो केवल तुम्हारा नाम। इस समय वे तुम्हारे स्वरूप में ही तन्मय से हो रहे हैं.....।" हित सखी ने फिर कहा- कान्हरौ मूल-काहे कौं मान बढ़ावतु है बालक मृग लोचनि। हौंब डरनि कछु कहि न सकति इक बात सँकोचनि।। मत्त मुरली अंतर तव गावत जागृत सैन तवाकृति सोचनि। (जै श्री) हित हरिवंश महा मोहन पिय आतुर विट विरहज दुख मोचनि।।७४।। भावार्थ – "हे मृग छौनों से नेत्र वाली मानिनि ! व्यर्थ मान क्यों बढ़ा रही हो? मान जाओ ! मैं तुमसे इस समय एक बात कहना चाह कर भी सङ्कोच वश नहीं कह पा रही हूँ (अर्थात् प्रियतम की दशा कुछ ऐसी है जिसका जिह्वा पर लाना ही ठीक नहीं; वे अत्यन्त व्याकुल हैं यहाँ तक कि जीवन से भी निराश हो चुके हैं। मैं कैसे कहूँ भविष्य की बात कि क्या होगा ? कितनी अमङ्गल पूर्ण है वे बातें ।) वे उन्मत्त हुए मुरली में और अपने हृदय में भी केवल तुम्हारा ही गान करते एवं सोते जागते प्रत्येक दशा में तुम्हारी ही मुखाकृति का चिन्तन करते रहते हैं।" श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद (सखी रूप से) कहते हैं-हे प्यारी राधे ! आप महा मुग्ध एवं प्रेमातुर लम्पट-रसिक प्रियतम के विरह जनित दुःख का विनाश करने वाली हैं (तब आप अपना यह गुण प्रकट क्यों नहीं करतीं ?)

२२६ • • हित चौरासी सकल कला प्रवीन कल्यान रागिनी लीन, कहत न बनै माधुरी अंग अंगे।। तरनि तनया तीर त्रिविध सखी समीर। मानौं मुनी व्रत धरयौ कपोती कोकिला कीर।। नागरि नव किसोर मिथुन मनसि चोर। सरस गावत दोऊ मंजुल मंदर घोर।। कंकन किंकिनि धुनि मुखर नूपुरनि सुनि। (जै श्री) हित हरिवंश रस वरषत नव तरुनि॥६९॥ भावार्थ-प्रेम के सुन्दर रङ्ग से भीने मोहिनी मोहन (युगल किशोर) प्रेमोन्मत्त हुए प्रसन्नता पूर्वक सुहावन सुधङ्ग नृत्य नाच रहे हैं। दानों समस्त कलाओं में प्रवीण हैं और (इस समय नृत्य करते हुए) कल्याण रागिनि में लीन-तन्मय- हो रहे हैं जिससे उनके अङ्ग प्रत्यङ्गों की माधुरी कुछ कहते ही नहीं बनती। अरी सखी ! तरणि तनया यमुना के तीर पर जहाँ त्रिविध पवन बह रहा है, (रास और गान से मुग्ध होकर) कपोली, कोयल और तोते आदि पक्षियों ने तो मानो मुनि व्रत (मौन) धारण कर रखा है। परम सुन्दर नागरी और किशोर-दोनों एक दूसरे के चित्त चोर हैं अतः परस्पर चित्तों को चोरी करते हुए मधुर स्वरों में कभी उच्च और कभी मन्द मन्द गान गाते हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं कि उस समय रास नृत्य में कङ्कण, किङ्किणियों की मधुर मधुर ध्वनि सुनकर रसमयी नव तरुणि श्रीराधा रस का वर्षण करती हैं, अद्भुत प्रेम विलास का प्रकाश करती हैं। — ७० — अवंतरण – श्रीवृन्दावन के मञ्जुल निकुञ्ज भवन में आज रात्रि में युगल किशोर की रति विलास केलि परम आनन्द पूर्वक सम्पन्न हुई है। प्रातः काल श्रीहित सखी ने निकुञ्ज भवन में प्रवेश किया है। युगल के श्रीअङ्गों में रति विहार के अनेकों चिह्न (लक्षण) शोभा पा रहे हैं। रति विहार के श्रम से श्रीप्रियाजी थकित, आलस्य युक्त और विस्मृता सी हैं, उनकी देह दशा अस्त व्यस्त सी है। श्रीप्रियाजी की यह दशा देखकर श्रीहित सखी को जो सुख हुआ सो तो हुआ ही

हित चौरासी • • २२७ समस्त सहचरि परिकर को भी अपार सुख मिला वे सब युगल किशोर को प्रेमाशीष देने लगीं क्योंकि सब तत्सुख मयी हैं न? इस पद में सखियों कें तत्सुखित्व और युगल किशोर के रति विलास की रस पूर्ण झाँकी है- कल्याण मूल-आजु सँभारत नाँहिन गोरी। फूली फिरत मत्त करिनी ज्यौं सुरत समुद्र झकोरी।। आलस वलित अरुन धूसर मषि प्रगट करत दृग चोरी। पिय पर करुन अमी रस वरषत अधर करुनता थोरी।। बाँधत भृंगं उरज अंबुज पर अलकनि बंध किसोरी। संगम किरचि किरचि कंचुकि बँध सिथिल भई कटि डोरी।। देति असीस निरखि जुवती जन जिनकें प्रीति न थोरी। (जै श्री) हित हरिवंश विपिन भूतल पर संतत अविचल जोरी।।६०।। भावार्थ – आज गोरी (राधिका) अपने आपको सम्हाल भी नहीं पा रही है और सुरत समुद्र में झँकोरी (डूबी) मतवाली करिणि की भाँति फूली फिरती है। आलस्य से झँपते हुए नयन अरुण तो हैं ही साथ ही कज्जल से मलिन भी हो रहे हैं जो (रात की) चोरी को मानो प्रकट कर रहे हैं। प्रियतम पर करुणा रूप अमृत रस की वृष्टि करती रहती है न, इसीसे अधरों पर कुछ न्यून सी ही अरुणिमा शेष रह गयी है (अर्थात् उन्होंने प्रियतम को अधरामृत का पान कराया है इससे अधर निरङ्ग हो गये हैं।) आज किशोरी अपने अलक बन्धनों से उरोज कमलों पर भृङ्गों को बाँध रही है (अर्थात् श्रीराधा अपने उरोज कमल और अलक बन्धनों से प्रियतम श्रीकृष्ण के मन भ्रमर को बाँध रही हैं-श्रीकृष्ण इस सौन्दर्य पर मुग्ध हैं।) प्रेम मिलन के प्रवाह और सङ्गम में चोली के समस्त बन्धन टूट चुके हैं और कटि की डोरी-नीबी भी शिथिल हो चुकी है। श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभुपाद कहते हैं कि जिनके हृदय में थोड़ी नहीं वरं अत्यन्त प्रीति है, ऐसी प्रेममयी नव युवति जन-सखियाँ इन (समसी राधिका) को देखकर आशीष देती हैं कि यह जोड़ी भूतल स्थित श्रीवृन्दावन में सर्वदा अविचल रहे-सदा विराजमान् रहे।

२२८ • • हित चौरासी

  • ७१ - अवतरण - इस पद में भी शारदीय रात्रि के रसमय दिव्य रास रसोत्सव का वर्णन है। श्रीहित सखीजी अपनी सखियों से कह रही हैं- कल्याण मूल- स्याम सँग राधिका रास मंडल बनी। बीच नँदलाल ब्रजबाल चंपक बरन, ज्यौंध घन तडित बिच कनक मरकत मनी॥ लेति गति मान तत्त थेई हस्तक भेद, स रि ग म प ध नि ये सप्त सुर नंदिनी। निर्त्त रस पहिर पट नील प्रगटित छबी, वदन जनु जलद में मकर की चंदिनी॥ राग रागिनि तान मान संगीत मत, थकित राकेस नभ सरद की जामिनी। (जै श्री) हित हरिवंश प्रभु हंस कटि केहरी, दूरि कृत मदन मद मत्त गज गामिनी॥७१॥ भावार्थ - रास मण्डल के बीच में राधिका श्याम सुन्दर के साथ शोभित हैं आस पास अनेकों चम्पक वर्णी ब्रज बालाओं के बीच बीच में अनेकों नन्दलाल हैं (जिससे ऐसी छटा प्रकट होती है) जैसे मेघ और दामिनियों के मण्डल के बीच में (कोई नील पीत ज्योतिपूर्ण) स्वर्ण और मरकत मणि शोभा पा रहे हों। नृत्य में सभी मान पूर्ण गतियाँ लेते और मुख से 'तत्ता थेई' कहते हुए हाथों से हाव भावों के भेद भी दिखाते जाते हैं। 'स रि ग म प ध नि' इन सात स्वरों में (यथाक्रम) गान करते हुए आनन्दित होते हैं। नीली सारी पहिन कर श्रीराधा ने (नाचते हुए) सम्पूर्ण नृत्य रस को प्रकट कर दिया है, उस समय की उनकी ऐसी मुख छवि प्रकट हो रही हैं, जैसे बादलों के बीच में मकर राशि की चाँदनी। श्रीहित हरिवंशचन्द्र कहते हैं इस शरद निशा में रास के अवसर पर राग रागिनियों की तानें, उनके यथोचित उतार चढ़ाव के प्रमाण और भेदों को

हित चौरासी • • २२६ देखकर आकाश में चन्द्र देव थकित हो गये, आगे न बढ़ सके। इस प्रकार लीला सरोवर के हंस रूप सिंह जैसी कटि वाली एवं मत्त गज गामिनि मेरी स्वामिनि श्रीराधा ने मदन के मद को दूर कर दिया।

  • ७२ - अवतरण—इस पद में शारदीय विहार के साथ-साथ शय्या विहार का भी वर्णन है। श्रीहित सखी अपनी सखियाँ से कहती हैं— कान्हरौ मूल—सुंदर पुलिन सुभग सुख दाइक। नव नव घन अनुराग परस्पर खेलत कुँवर नागरी नांइक।। सीतल हंस सुता रस बीचिनु परसि पवन सीकर मृदु वरषत। वर मंदार कमल चंपक कुल सौरभ सरसि मिथुन मन हरषत।। सकल सुधंग विलास परावधि नाचत नवल मिले सुर गावत। मृगज मयूर मराल भ्रमर पिक अदभुत कोटि मदन सिर नावत।। निर्मित कुसुम सैन मधु पूरित भाजन कनक निकुंस विराजत। रजनी मुख सुख रासि परस्पर सुरत समर दोऊ दल साजत।। विट कुल नृपति किसोरी कर धृत, बुधि बल नीबी बंधन मोचत। 'नेति नेति' वचनामृत बोलत प्रनय कोप प्रीतम नहिं सोचत।। (जै श्री) हित हरिवंश रसिक ललितादिक लता भवन रंध्रनि अवलोकत। अनुपम सुख भर भरित विवस असु आनँद वारि कंठ दृग रोकत।।७२।। भावार्थ—युगल किशोर नागरी-नायक पारस्परिक घनीभूत एवं नवीन नवीन अनुराग से भरे हुए परम रमणीय और सुखदायक यमुना के सुन्दर पुलिन पर रास रस खेल रहे हैं वायु सूर्य कन्या यमुना की रस पूर्ण शीतल लहरियों का स्पर्श कर करके कोमल कोमल जल फुँहारों की वर्षा कर रहा है और मन्दार, कमल और चम्पक आदि श्रेष्ठ पुष्प समूहों का सौरभ युगल किशोर के मन को हर्षित कर रहा है। युगल किशोर नृत्य की समस्त कलाओं और विलासों की अन्तिम सीमा है, वे नये-नये स्वरों में गाते और मिल कर नाचते भी हैं; जिसे देख देख कर वन के मृग छौने, मोर, हंस, भौंरे और

२३० • • हित चौरासी कोयल तो कोयल कोटि कोटि अद्भुत कामदेव भी लजाकर अपना सिर झुका देते हैं मानों सब अपने अपने गुणों की हार स्वीकार कर लेते हैं। इधर निकुञ्ज भवन के भीतर सखियों ने पुष्प शय्या रच रखी है; समीप ही मधुर आसवों से भरे हुए अनेकों कनक घट विराज रहे हैं। सन्ध्या का समय है। दोनों सुख राशि नव किशोर पारस्परिक सुरत युद्ध के लिये अपनी अपनी (मदन) सेनाएँ सजा रहे हैं। युद्ध के समय लम्पटों के शिरोमणि रूप प्रियतम किशोरी श्रीराधा के करों को अपने कर से पकड़ कर अपने बुद्धि–बल प्रयोग से उनका नीवी बन्धन खोलना चाहते हैं तब प्रियाजी "नहीं ! नहीं !! ऐसे अमृत मय शब्द कहतीं और कुपित होती हैं, पर उनके इस कोप को प्रणय कोप समझ कर प्रियतम उसकी कोई परवाह ही नहीं करते– अपने प्रयत्न में आगे बढ़ते ही जाते हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं कि रसिक ललिता आदि सखियाँ कुञ्ज भवन के छिद्रों से लगीं (इस रस विलास का) दर्शन कर रही हैं और अनुपम सुख के परिपूर्ण प्रवाह में पड़कर विवश हो रही हैं (किन्तु अपने द्वारा युगल सरकार के सुख में किसी प्रकार भी विक्षेप न आने देने के लिये; प्रेम से निकलते हुए अपने) प्राण और प्रेमाश्रुओं को कण्ठ और आँखों में ही रोक लेती हैं; (क्योंकि प्राण और आँसुओं के निकल जाने के पश्चात् यह बात छिपी न रह सकेगी और इससे अभी तत्क्षण उनके सुख में–क्रीड़ा में एक महान् अन्तराय अवश्य आ जायगा। ऐसा उनका भाव है।)

  • ७३ - अवतरण – श्रीराधा के नयनों में अनन्त सौन्दर्य है और अनन्त माधुर्य, औदार्य, वशीकरण और सम्मोहन भी। दूसरे का सर्वस्व अपहरण करते इन नयनों को न दया है न किसी प्रकार का भय ही। किन्तु इनमें अपार करुणा, दया, कोमलता, उदारता और सरसता भी है अपने जनों के लिये। इन नयनों की दया–भीख माँगती हुई श्रीहित अलिजी कहती हैं–

हित चौरासी • • २३१ कान्हरौ मूल-खंजन मीन मृगज मद मेंटत, कहा कहौं नैननि की बातैं। सुनि सुंदरी कहाँ लौं सिखईं, मोहन बसीकरन की घातैं।। बंक निसंक चपल अनियारे, अरुन स्याम सित रचे कहाँ तैं। डरत न हरत परायौ सर्वसु; मृदु मधुमिव मादिक दृग पातैं।। नैंकु प्रसन्न दृष्टि पूरन करि, नहिं मोतन चितयौ प्रमदा तैं। (जै श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनि, भावै सो करहु प्रेम के नातैं।।७३।। भावार्थ – (श्रीहित अलि ने कहा- "हे राधे!) मैं तुम्हारे नयनों की क्या बातें कहूँ ये तो खंजन, मीन एवं मृग छौनों का भी मद चूर चूर कर रहे हैं। हे सुन्दरि! सुनो तुमने मोहन को अपने वश में कर लेने के लिये कितनी कितनी युक्तियाँ सोच रखी हैं ? (उन अनेक युक्तियों में से नयनों की सुन्दरता भी एक युक्ति है।) अरी ! तुमने ये तिरछे, नुकीले, चञ्चल, और वेखटक (निडर) इसी तरह अरुनारे, श्याम और स्वेत (वर्णों से युक्त) नयन कहाँ से बनाकर तैयार कर लिये? इन लोचनों की मीठी मदिरा जैसी मद पूर्ण चोटों से दूसरे का सर्वस्व अपहरण करते तुम्हें डर भी नहीं लगता?" हे प्रमोद मयी प्रमदे ! तुमने आज तक कभी मेरी ओर प्रसन्नता पूर्वक प्रेम पूर्ण दृष्टि से तनिक भी नहीं देखा ! (अतः ऐसी दृष्टि से देख देना तो उचित ही है पर यदि न देखना चाहो तो) तुम्हारी इच्छा ! जो चाहो सो करो ! हे हंस कल गामिनि! प्रेम के नाते से हमें यह सब स्वीकार है। टिप्पणी – इस पद में श्रीप्रियाजी के नेत्रों के सौन्दर्य्य की अनुपम रीति से वर्णना है। इन परम सौन्दर्य्य मयी प्रियाजी के रूप के एक कण मात्र का भी वर्णन करने में समस्त कवि कुल मण्डली अपना सिर झुका देती है-असमर्थता प्रकट कर देती है फिर रस के तीव्र आयुध आपके नयनों का वर्णन कर ही कौन