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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 234

हित चौरासी • • २२७ समस्त सहचरि परिकर को भी अपार सुख मिला वे सब युगल किशोर को प्रेमाशीष देने लगीं क्योंकि सब तत्सुख मयी हैं न? इस पद में सखियों कें तत्सुखित्व और युगल किशोर के रति विलास की रस पूर्ण झाँकी है- कल्याण मूल-आजु सँभारत नाँहिन गोरी। फूली फिरत मत्त करिनी ज्यौं सुरत समुद्र झकोरी।। आलस वलित अरुन धूसर मषि प्रगट करत दृग चोरी। पिय पर करुन अमी रस वरषत अधर करुनता थोरी।। बाँधत भृंगं उरज अंबुज पर अलकनि बंध किसोरी। संगम किरचि किरचि कंचुकि बँध सिथिल भई कटि डोरी।। देति असीस निरखि जुवती जन जिनकें प्रीति न थोरी। (जै श्री) हित हरिवंश विपिन भूतल पर संतत अविचल जोरी।।६०।। भावार्थ – आज गोरी (राधिका) अपने आपको सम्हाल भी नहीं पा रही है और सुरत समुद्र में झँकोरी (डूबी) मतवाली करिणि की भाँति फूली फिरती है। आलस्य से झँपते हुए नयन अरुण तो हैं ही साथ ही कज्जल से मलिन भी हो रहे हैं जो (रात की) चोरी को मानो प्रकट कर रहे हैं। प्रियतम पर करुणा रूप अमृत रस की वृष्टि करती रहती है न, इसीसे अधरों पर कुछ न्यून सी ही अरुणिमा शेष रह गयी है (अर्थात् उन्होंने प्रियतम को अधरामृत का पान कराया है इससे अधर निरङ्ग हो गये हैं।) आज किशोरी अपने अलक बन्धनों से उरोज कमलों पर भृङ्गों को बाँध रही है (अर्थात् श्रीराधा अपने उरोज कमल और अलक बन्धनों से प्रियतम श्रीकृष्ण के मन भ्रमर को बाँध रही हैं-श्रीकृष्ण इस सौन्दर्य पर मुग्ध हैं।) प्रेम मिलन के प्रवाह और सङ्गम में चोली के समस्त बन्धन टूट चुके हैं और कटि की डोरी-नीबी भी शिथिल हो चुकी है। श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभुपाद कहते हैं कि जिनके हृदय में थोड़ी नहीं वरं अत्यन्त प्रीति है, ऐसी प्रेममयी नव युवति जन-सखियाँ इन (समसी राधिका) को देखकर आशीष देती हैं कि यह जोड़ी भूतल स्थित श्रीवृन्दावन में सर्वदा अविचल रहे-सदा विराजमान् रहे।