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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 233

२२६ • • हित चौरासी सकल कला प्रवीन कल्यान रागिनी लीन, कहत न बनै माधुरी अंग अंगे।। तरनि तनया तीर त्रिविध सखी समीर। मानौं मुनी व्रत धरयौ कपोती कोकिला कीर।। नागरि नव किसोर मिथुन मनसि चोर। सरस गावत दोऊ मंजुल मंदर घोर।। कंकन किंकिनि धुनि मुखर नूपुरनि सुनि। (जै श्री) हित हरिवंश रस वरषत नव तरुनि॥६९॥ भावार्थ-प्रेम के सुन्दर रङ्ग से भीने मोहिनी मोहन (युगल किशोर) प्रेमोन्मत्त हुए प्रसन्नता पूर्वक सुहावन सुधङ्ग नृत्य नाच रहे हैं। दानों समस्त कलाओं में प्रवीण हैं और (इस समय नृत्य करते हुए) कल्याण रागिनि में लीन-तन्मय- हो रहे हैं जिससे उनके अङ्ग प्रत्यङ्गों की माधुरी कुछ कहते ही नहीं बनती। अरी सखी ! तरणि तनया यमुना के तीर पर जहाँ त्रिविध पवन बह रहा है, (रास और गान से मुग्ध होकर) कपोली, कोयल और तोते आदि पक्षियों ने तो मानो मुनि व्रत (मौन) धारण कर रखा है। परम सुन्दर नागरी और किशोर-दोनों एक दूसरे के चित्त चोर हैं अतः परस्पर चित्तों को चोरी करते हुए मधुर स्वरों में कभी उच्च और कभी मन्द मन्द गान गाते हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं कि उस समय रास नृत्य में कङ्कण, किङ्किणियों की मधुर मधुर ध्वनि सुनकर रसमयी नव तरुणि श्रीराधा रस का वर्षण करती हैं, अद्भुत प्रेम विलास का प्रकाश करती हैं। — ७० — अवंतरण – श्रीवृन्दावन के मञ्जुल निकुञ्ज भवन में आज रात्रि में युगल किशोर की रति विलास केलि परम आनन्द पूर्वक सम्पन्न हुई है। प्रातः काल श्रीहित सखी ने निकुञ्ज भवन में प्रवेश किया है। युगल के श्रीअङ्गों में रति विहार के अनेकों चिह्न (लक्षण) शोभा पा रहे हैं। रति विहार के श्रम से श्रीप्रियाजी थकित, आलस्य युक्त और विस्मृता सी हैं, उनकी देह दशा अस्त व्यस्त सी है। श्रीप्रियाजी की यह दशा देखकर श्रीहित सखी को जो सुख हुआ सो तो हुआ ही