हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • २२५ धाइ नवरँग घरी उरसि राजत खरी; उभय कल हंस हरिवंश घन दामिनी॥६८॥ भावार्थ-आज रसिक मोहन और भामिनि श्रीराधा रास में शोभित हैं। सुन्दर और पवित्र यमुना का पुलिन है शरद् की रात्रि है। कमल की सरस सुगन्ध से भ्रमरों के समूह के समूह मतवाले हो रहे हैं; वैसा ही रुचिकारक त्रिविध पवन वह रहा है जो दिन मणि सूर्य के ताप का दमन करने वाला है। उस पुलिन पर रमण श्रीकृष्ण अपने साथ शत शत कामिनियों को लिये खड़े हैं। बड़ी सरसता पूर्वक ताल, वीणा, मृदङ्ग आदि बज रहे हैं और सब मिलकर सुधङ्ग नृत्य कर रहे हैं। उन कामिनियों में से प्रत्येक एक से बढ़कर एक राग सङ्गीत की अधिष्ठाता प्रधान हैं। वहाँ राग रागिनियों का पूर्ण जमाव है जिससे वन में मानों अमृत(रस) बरस रहा है, और श्याम सुन्दर के अधरों पर परम सुन्दर मुरली विराज रही है। मुरली के सप्त स्वरों के साथ सुन्दरी 'राधा' नामक (कोई अनिर्वचनीय) कामिनि लाग, उरप, कट्टर, तिस्प आदि गतियों के साथ सुलप ले रही है। कभी तो वह तत्ता थेई-थेई' करती हुई नवीन गतियों को धारण करती है एवं कभी मत्त गज गामिनि की भाँति पलट कर (उलटी ओर लौटकर) डगमगाती ढलती हुई आ जाती है। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि (उस समय उस नृत्य परायणा प्रिया को) प्रियतम ने लपक कर शीघ्रता पूर्वक पकड़ लिया, तब प्रिया भी उनके हृदय से लिपट कर बड़ी शोभित हुईं। (शोभित क्यों न हों, क्योंकि दानों ही (केलि सरोवर के) सुन्दर हंस हैं; किंवा केलि रूप आकाश के विद्युत और वारिद हैं न !
- ६९ - अवतरण-पुनः उपरोक्त पद्धति से रास क्रीड़ा का ही सरस वर्णन करते हैं- कल्याण मूल-मोहिनी मोहन रंगे प्रेम सुरंगे, मत्त मुदित कल नाचत सुधंगे।