हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
DevanagariHindipublished275 पृष्ठ
पृष्ठ 236, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 236
हित चौरासी • • २२६ देखकर आकाश में चन्द्र देव थकित हो गये, आगे न बढ़ सके। इस प्रकार लीला सरोवर के हंस रूप सिंह जैसी कटि वाली एवं मत्त गज गामिनि मेरी स्वामिनि श्रीराधा ने मदन के मद को दूर कर दिया।
- ७२ - अवतरण—इस पद में शारदीय विहार के साथ-साथ शय्या विहार का भी वर्णन है। श्रीहित सखी अपनी सखियाँ से कहती हैं— कान्हरौ मूल—सुंदर पुलिन सुभग सुख दाइक। नव नव घन अनुराग परस्पर खेलत कुँवर नागरी नांइक।। सीतल हंस सुता रस बीचिनु परसि पवन सीकर मृदु वरषत। वर मंदार कमल चंपक कुल सौरभ सरसि मिथुन मन हरषत।। सकल सुधंग विलास परावधि नाचत नवल मिले सुर गावत। मृगज मयूर मराल भ्रमर पिक अदभुत कोटि मदन सिर नावत।। निर्मित कुसुम सैन मधु पूरित भाजन कनक निकुंस विराजत। रजनी मुख सुख रासि परस्पर सुरत समर दोऊ दल साजत।। विट कुल नृपति किसोरी कर धृत, बुधि बल नीबी बंधन मोचत। 'नेति नेति' वचनामृत बोलत प्रनय कोप प्रीतम नहिं सोचत।। (जै श्री) हित हरिवंश रसिक ललितादिक लता भवन रंध्रनि अवलोकत। अनुपम सुख भर भरित विवस असु आनँद वारि कंठ दृग रोकत।।७२।। भावार्थ—युगल किशोर नागरी-नायक पारस्परिक घनीभूत एवं नवीन नवीन अनुराग से भरे हुए परम रमणीय और सुखदायक यमुना के सुन्दर पुलिन पर रास रस खेल रहे हैं वायु सूर्य कन्या यमुना की रस पूर्ण शीतल लहरियों का स्पर्श कर करके कोमल कोमल जल फुँहारों की वर्षा कर रहा है और मन्दार, कमल और चम्पक आदि श्रेष्ठ पुष्प समूहों का सौरभ युगल किशोर के मन को हर्षित कर रहा है। युगल किशोर नृत्य की समस्त कलाओं और विलासों की अन्तिम सीमा है, वे नये-नये स्वरों में गाते और मिल कर नाचते भी हैं; जिसे देख देख कर वन के मृग छौने, मोर, हंस, भौंरे और