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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 237

२३० • • हित चौरासी कोयल तो कोयल कोटि कोटि अद्भुत कामदेव भी लजाकर अपना सिर झुका देते हैं मानों सब अपने अपने गुणों की हार स्वीकार कर लेते हैं। इधर निकुञ्ज भवन के भीतर सखियों ने पुष्प शय्या रच रखी है; समीप ही मधुर आसवों से भरे हुए अनेकों कनक घट विराज रहे हैं। सन्ध्या का समय है। दोनों सुख राशि नव किशोर पारस्परिक सुरत युद्ध के लिये अपनी अपनी (मदन) सेनाएँ सजा रहे हैं। युद्ध के समय लम्पटों के शिरोमणि रूप प्रियतम किशोरी श्रीराधा के करों को अपने कर से पकड़ कर अपने बुद्धि–बल प्रयोग से उनका नीवी बन्धन खोलना चाहते हैं तब प्रियाजी "नहीं ! नहीं !! ऐसे अमृत मय शब्द कहतीं और कुपित होती हैं, पर उनके इस कोप को प्रणय कोप समझ कर प्रियतम उसकी कोई परवाह ही नहीं करते– अपने प्रयत्न में आगे बढ़ते ही जाते हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं कि रसिक ललिता आदि सखियाँ कुञ्ज भवन के छिद्रों से लगीं (इस रस विलास का) दर्शन कर रही हैं और अनुपम सुख के परिपूर्ण प्रवाह में पड़कर विवश हो रही हैं (किन्तु अपने द्वारा युगल सरकार के सुख में किसी प्रकार भी विक्षेप न आने देने के लिये; प्रेम से निकलते हुए अपने) प्राण और प्रेमाश्रुओं को कण्ठ और आँखों में ही रोक लेती हैं; (क्योंकि प्राण और आँसुओं के निकल जाने के पश्चात् यह बात छिपी न रह सकेगी और इससे अभी तत्क्षण उनके सुख में–क्रीड़ा में एक महान् अन्तराय अवश्य आ जायगा। ऐसा उनका भाव है।)

  • ७३ - अवतरण – श्रीराधा के नयनों में अनन्त सौन्दर्य है और अनन्त माधुर्य, औदार्य, वशीकरण और सम्मोहन भी। दूसरे का सर्वस्व अपहरण करते इन नयनों को न दया है न किसी प्रकार का भय ही। किन्तु इनमें अपार करुणा, दया, कोमलता, उदारता और सरसता भी है अपने जनों के लिये। इन नयनों की दया–भीख माँगती हुई श्रीहित अलिजी कहती हैं–