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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

२३२ • • हित चौरासी सकता है जो सौन्दर्य की निधि, माधुर्य्य के भण्डार, आकर्षण के केन्द्र और अनन्त गुणों के आगार हैं। हाँ, अनुभवीऔर सूक्ष्म प्रज्ञाशील रसिक सन्तों ने उनके सम्बन्ध में जो अल्प मात्र सङ्केत सा किया है वही हमें उस अनुपम रस राशि की ओर प्रेरित करता है। ऐसा एक सङ्केत श्रीध्रुवदास जी ने किया है उन नयनों की वेधन शक्ति की ओर— नैंकु चितै तिरछे मुसकानी। लालहिं सुधि बुधि सबै भुलानी॥ बसी जु प्यारे लाल उर, वह चितवनि मुसकानि। तबते कबहुँ छुटी नहिं, बसी जु उर में आनि॥ एक बार जो चितवन की मुसकान श्रीलालजी के हृदय में बस गयी, सो बस गयी, फिर कभी न निकली। कितनी विचित्र वेधन शक्ति है इन नयनों में ? जिस ओर यह चितवन मुसकान जा गिरती है रूप की वर्षा सी कर देती है— बड़े बड़े उज्ज्वल सुरंग अनियारे नैना, अंजन की रेख हेरैं हियरौ सिरात री। चपलाई खंजन की, अरुनाई कंजन की, उजराई मोतिन की पानिप लजात री॥ सरस सलज्ज नये रहत हैं प्रेम भरे, चंचल न अंचल में कैसैहूँ समात री। 'हित ध्रुव' चितवन छटा जेहिं कोद परै, तेहि ओर बरसा सी रूप की ह्वै जात री॥ —श्रीहित ध्रुवदासजी यह वह चितवन है जिसका घायल जीता तो है पर मृत जैसा रहकर और मर जाने पर भी जीता रहता है उसके रूपामृत का पान करके। इस प्रकार वह जीवित और मृत के बीच बीच की स्थिति में पड़ा लूमता झूमता रहता है मदिरा पीने वाले की तरह। कितने गुण और अवगुणों से भरे हैं ये नयन— अमी हलाहल मद भरे स्वेत स्याम रतनार। जियत मरत झुकि झुकि परत जेहिं चितवत इक बार॥ —बिहारी

२३४ • • हित चौरासी टिप्पणी – मानिनि नायिका श्रीप्रियाजी के वियोग में प्रियतम श्रीलालजी अत्यन्त दुःखी एवं विरह कातर हैं। सखी उनकी दशा देख कर आई है और वही सब बातें श्रीप्रियाजी से कह रही है। सखी ने कहा- "प्यारी ! वे श्याम सुन्दर तो अब आपके वियोग में प्रणय निराशा के साथ साथ जीवन से निराश हो चुके हैं। मैं सङ्कोच एवं भय वश कुछ कह नहीं सकती किन्तु दशा है ही कुछ ऐसी वे मुख में तुम्हारा नाम और हृदय में तुम्हारे ध्यान के रहने से ही अब तक जीवन धारण करने में समर्थ हो सके हैं। जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति प्रत्येक दशा में केवल 'राधा हा राधा ! रटते रहते हैं। यह दूतिका सखी प्रियतम श्रीलालजी की दशा देख कर आयी थी, उसे मालूम था कि प्रियतम की विरह व्यथा वियोग की अन्तिम स्थिति के सन्निकट है किन्तु फिर भी वह कहे कैसे अपने मुख से भावी अमङ्गल के अशुभ शब्द ? वह हेर फेर करके केवल इतना ही कह पाती है- 'मृग शावक लोचनि। अब मान बढ़ाने का समय रहा नहीं। इसका परिणाम क्या होगा जानती हो ? मैं भय वश उसे कह नहीं सकती पर तुम समझ सको तो समझो ? मैंने उनकी जो दशा देखी है मुझे उसका भय है और सङ्कोच लगता है। मानिनि ने सखी की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया तब उसने फिर कहना प्रारम्भ किया “करुणामयि राधे ! तुम सोचो तो सही क्या होगी उनकी दशा ? वे प्रेमोन्मत्त हुए मुरली में केवल आपका ही नाम गा रहे हैं। वे चिन्तन करते हैं तो आपके रूप का। उन्हें सिवाय आपके नाम, गुण लीला गायन के और कुछ मानों रुचता ही नहीं है। उन्हें विश्व प्रपञ्च से कोई प्रीति तो रही नहीं वरं उन्हें अपने आप की भी सुधि नहीं रह गयी है। उनकी उस मन मोहन दशा का कैसे वर्णन करूँ ? प्रिये ! वे प्रेम की आतुरता से प्रेम लम्पट से बन बैठे हैं। उन्हें अब प्यास है तो आपके प्रेम की। इस प्रेम के समक्ष अब उन्हें अन्य कुछ प्रिय रह ही नहीं गया है। उनका जीवन केवल आपके आधीन.....।" सखी से आगे की बात न कही गयी। वह श्रीप्रियाजी के लिये एक गम्भीरार्थ पूर्ण सम्बोधन देकर रह गयी जिससे उसके आन्तरिक भावों की पूर्ण अभिव्यक्ति हो रही थी। उसने कहा- “महा मोहन प्रियतम आतुर लम्पट श्रीलाल की दुख मोचनि।”

हित चौरासी • • २३५ उसने सम्बोधन में ही अपना तात्पर्य प्रकट कर दिया। कण्ठावरोध या प्रेमाधिक्य वश वह अपना आशय स्पष्ट न कर सकी। क्योंकि अत्यन्त विरह में जिस अमङ्गल की भयानक भावना का निवास है उसे 'हित रूपा' सहचरि कैसे अपनी जिह्वा पर ला कहती, उसका चुप होकर दो आँसू रो देना ही पर्याप्त था। इस पद में अव्यक्त व्यञ्जना से श्रीलालजी एवं सखी के प्रेम की बड़ी गम्भीर झाँकी करायी गयी है। यहाँ 'अमङ्गल' शब्द से दुःखी होने या चौंकने की भी आवश्यकता नहीं है कि महामङ्गल मय श्रीलालजी के लिये यह अमङ्गल शब्द क्यों और कैसे ? प्रेम की अत्युच्च स्थिति या विशेष भावों का प्रकाशन करने के लिये ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है जो उचित है। देखिये, श्रीकृष्ण दर्शन से श्रीराधा के मूर्च्छित हो जाने पर उनकी सखी नन्द भवन में जाकर उलाहना दे रही है। उसके शब्दों में क्या भाव हैं- जागिहै, जीहै तो जीहैं सबै, नतु पीहैं हलाहल नंद के द्वारैं। अर्थात् ("वह राधा मूर्च्छा से) जागकर जी उठेगी तो ही हम भी जीती रहेंगी अन्यथा (उनके मरणोपरान्त) हम सभी नन्द राय के द्वार पर बैठ कर विष पी लेंगी और मर जावेंगी।" उसने स्पष्ट कह दिया कि यदि श्रीराधा का जीवन न रहा तो हम भी अपना जीवन न रखेंगी। 'हित चौरासी' में श्रीहिताचार्य पाद ने भी मान के अवसर में दूतिका के मुख से नायक की दशा का वर्णन कराते हुए इसी प्रकार के भाव का प्रकाश किया है- वे तौऽब गनत जीवन यौवन तब 'हित हरिवंश हरि भजहि भामिनि जौ। अर्थात् 'वे (प्रियतम श्रीकृष्ण) अपने जीवन और यौवन को तब कुछ गिनेंगे जब आप जाकर उनसे मिलेंगी, अन्यथा नहीं। यहाँ जीवन की गणना न करने का वही अर्थ है जो अमङ्गल मय कही जा सकती है जिसके लिये दूतिका ने मूल पद में कहा है- हौंऽब डरनि कछु कहि न सकत इक बात सँकोचनि।

२३६ • • हित चौरासी यहाँ सङ्कोच वश न कह सकने योग्य केवल इतनी ही बात थी कि आपके विना वहाँ कितना बड़ा अमङ्गल हो सकता है उसकी कल्पना भी मेरे लिये हृदय विदारक है, जहाँ प्रेमोदय के सात्विक अनुभावों का वर्णन हैं वहाँ स्तम्भ, स्वेद, रोमाञ्च, स्वर भङ्ग, कम्प, वेपथु, वैवर्ण्य, अश्रु, प्रलय एवं मूर्च्छा आदि सभी हैं। इसी प्रकार विरह में अभिलाषा, चिन्ता, स्मरण, गुण कथन, उद्वेग, प्रलाप व्याधि, उन्माद, जड़ता, मूर्च्छा एवं मरण तक का वर्णन किया गया है। प्रेम एवं विरह के प्रत्येक लक्षण समय समय पर युगल किशोर एवं सखियों में सर्वदा देखे जाते हैं जिनका वर्णन श्रीराधा सुधानिधि, गीत गोविन्द, हित चौरासी, श्रीध्रुवदास कृत ग्रन्थावली और प्रेमरस के अनेक ग्रन्थों में यत्र तत्र पाया जाता है। वहाँ प्रत्येक स्थल पर मूर्च्छा एवं मरण का वर्णन प्रेम की पराकाष्ठा के परिचय रूप में है न कि अमङ्गल भावना से। यदि यह मूर्च्छा एवं मरण के लक्षण युगल सरकार जो प्रेम की अवधि हैं इनमें न होंगे तो होंगे कहाँ ? क्योंकि यही तो प्रेम की साकार मूर्त्ति हैं। श्रीहिताचार्य पाद ने अपने ग्रन्थों में जिस प्रेम तत्व का प्रकाश किया है, वह अत्यन्त सूक्ष्म, अवर्णनीय, अतर्क्य और केवल अनुभव गम्य है। इसमें प्रत्येक क्षण भावों की नई–नई तरङ्गैं उठती रहती हैं। इसमें मिलन है, वियोग है, विरह है, मान है, भ्रम है, काम है, क्रोध है, लोभ है, मोह है, मद है, घृणा है, उपेक्षा है, ईर्ष्या है, असूया है, अनादर है, अभाव है, कटुता है, त्रास है, पीड़ा है, मूर्च्छा है, प्रलय है और है मृत्यु। इसमें सब कुछ है। वह सब है जो कहीं नहीं है किन्तु यह सब होकर भी कुछ नहीं है, जिस रूप में इनकी व्याख्या संसार में की जाती है। यहाँ का सब कुछ केवल प्रेम है, विशुद्ध प्रेम। इसलिये अमङ्गल रूप से जिन भावों का प्रकाश सखी ने किया वह भी दिव्य प्रेम है। – ७५ – अवतरण – वृन्दावन के ऐकान्तिक कुञ्ज भवन में श्रीयुगल किशोर सुखमयी शय्या पर विराजमान् हैं पर प्रीति सन्मुख नहीं। प्रियतम प्रेमातुर एवं दीन हैं और प्रिया मान पूर्ण भावों के कारण रूठी सी। उन्होंने अपना श्रीमुख नीचा कर रखा है वे सतत् अपने चरण नखों की ओर निहारती और जाने क्या सोचतीं हैं, प्रियतम लालजी की ओर मानो देखना ही नहीं चाहतीं।

हित चौरासी • • २३७ श्याम सुन्दर ने उन्हें मना लेने की बहुत कोशिश की पर वे असफल ही रहे। अन्त में श्रीहित अलि उनकी ओर से प्रयत्न करने लगीं। उन्होंने श्रीप्रिया जी से बड़े ही मधुर और दीन शब्दों में कहा- कान्हरौ मूल-हौं जु कहति इक बात सखी, सुनि काहे कौं डारत? प्रानरमन सौं क्यौंऽब करत, आगस बिनु आरत।। पिय चितवत तुव चंद वदन तन, तूँ अधमुख निजु चरन निहारति। वे मृदु चिबुक प्रलोइ प्रबोधत, तूँ भामिनि कर सौं कर टारति।। बिबस अधीर विरह अति कातर, सर औसर कछुवै न विचारति। (जै श्री) हित हरिवंश रहसि प्रीतम मिलि, तृषित नैन काहे न प्रतिपारति।।७५।। भावार्थ - "हे सखि ! मैं तुमसे यह जो कुछ एक बात कह रही हूँ तुम उसे सुनकर भी टाल क्यों देती हो ? तुम विना कारण-विना अपराध ही अपने प्राण रमण (प्रियतम श्रीकृष्ण) को क्यों दुःखित कर रही हो ? वे तो एकटक तुम्हारे मुख चन्द्र की ओर देखते हैं और तुम अपना मुख नीचे झुकाये अपने चरणों की ओर देखती रहती हो ! (उनकी ओर एक बार भी दृष्टि तक नहीं करतीं !) भामिनि ! वे तो (अनुनय पूर्वक) तुम्हारे कोमल चिबुक में अपने कर कमल का स्पर्श कर कर के तुम्हें समझा रहे हैं और तुम (उपेक्षा पूर्वक) उनके हाथों को अपने हाथों से ठेल देती हो !" (स्वामिनि ! देखो, इस समय प्रियतम) विरह के कारण अत्यन्त अधीर और दुखी हैं तथा प्रेम विवश भी। तुम तो (कुछ ऐसी हो कि) मौका वे मौका कुछ भी नहीं विचरतीं (चाहे जब मान ठान बैठतीं और फिर मनाये भी नहीं मानतीं ।") श्रीहरिवंश चन्द्र (सखी रूप से) कहते हैं "हे राधे ! अब प्रसन्नता पूर्वक अपने प्रियतम से मिल कर उनके प्रेम प्यास एवं विरह से दुःखित नयनों का प्रतिपाल क्यों नहीं करतीं ? (अर्थात् उनके नयन आपका दर्शन करके और आपको अपने अनुकूल देखकर ही सुखी होंगे ।") टिप्पणी-इस पद में कुआन्तर मान न होकर सम्भ्रम मान का वर्णन है। युगल किशोर एक ही सुखद आसन पर सुख पूर्वक विराजमान थे। अकारण

२३८ • • हित चौरासी किसी भ्रम से श्रीप्रियाजी रूठ गयीं और प्रियतम की ओर से मुँह फेर कर पीठ देकर बैठ गयीं। उनके रूठते ही श्रीलालजी व्याकुल हो गये और वे उन्हें मनाने समझाने लगे हैं। जब कभी रूठी हुई प्रियाजी उठकर अन्य किसी कुअ में जा बैठतीं हैं तब उसे कुआन्तर मान या प्रवास मान भी कहते हैं। इस समय दोनों को प्रसन्न करके एकत्र कर देने और प्रीति उत्पन्न करा देने के लिये मध्यस्थ सखी-दूतिका की आवश्यकता होती है। सम्भ्रम मान के अवसर में चाहे दूतिका की आवश्यकता न हो पर अनुनय विनय, दीनता, अधिनता, नायक गुण, रूप प्रशंसा आदि की आवश्यकता तो तब भी होती है। उक्त पद में श्रीहित सजनी मध्या सखी के रूप में चाटुकार हैं, जो रूठी हुई मानिनि प्रिया के समक्ष नायक श्रीलालजी की ओर से अनुनय विनय के भाव उपस्थित कर रही हैं। – ७६ – अवतरण – श्रीवृन्दावन के अन्तर्भाग में एक अत्यन्त रहस्य मय सघन लता भवन है। वहाँ युगल किशोर एकान्तिक रूप से सुरत क्रीड़ा का उपक्रम कर रहे हैं। क्रीड़ा के लिये प्रेम मयी सखियों ने सुमन शैय्या रचकर तैयार कर दी है, जिस पर लाड़िली लाल रस मग्न हुए आसीन हैं। दोनों , दोनों की छबि माधुरी का अवलोकन कर कर के मनोज के मधुमय भावों में डूब रहे हैं। रात्रि का मध्य होने जा रहा है और रति विहार का मधुर प्रारम्भ। इस सुरत सुख का नित्य सुख लेने वाली श्रीहित सखी जी उसका वर्णन इस प्रकार करती हैं- कान्हरौ मूल-नागरीं निकुंज ऐंन किसलय दल रचित सैन, कोक कला कुसल कुँवरि अति उदार री। सुरत रंग अंग अंग हाव भाव भृकुटि भंग, माधुरी तरंग मथत कोटि मार री।

हित चौरासी • • २३६ मुखर नूपुरनि सुभाव किंकनी विचित्र राव, विरमि विरमि नाथ वदत वर विहार री। लाड़िली किसोर राज हंस हंसिनी समाज, सींचत हरिवंश नैन सुरस सार री॥७६॥ भावार्थ - निकुञ्ज भवन में नागरी गण (सखियों) ने नवीन नवीन पल्लवों से शैय्या रची है। उस पर किशोरी श्रीराधा विराजमान् हैं जो प्रेम विहार की क्रीड़ाओं में चतुर एवं अत्यन्त उदार हैं। उनके अङ्ग प्रत्यङ्गों से सुरत रस प्रकट हो रहा है तथा उनके हाव भाव और भौंहों के नर्तन में जो माधुर्य लहरियाँ उठती हैं उनसे कोटि कोटि कामों का भी मन मथित हो जाता है। सुरत विहार में वाचाल नूपुरों के सुन्दर भाव पूर्ण शब्द, किङ्किणियों के विचित्र शब्द और सुरत विहार के बीच बीच में श्रीलालजी के विरमि विरमि (अर्थात् प्रिये ! आप विश्राम लें, विश्राम ले लें थक गयी होंगी इत्यादि) वाक्य (किसी अवर्णनीय रस की उत्पत्ति करते हैं !) श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद (सखी रूप से) कहते हैं कि रसमय लाड़िली एवं किशोर-श्रीराधा वल्लभलाल जो प्रेम लीला रूप मान सरोवर के हंस एवं हंसिनी हैं; अपने सहचरि समाज के नयनों को अपनी सुरत क्रीड़ा के सुन्दर रस सार से सींचते रहते हैं। टिप्पणी- विरमि विरमि नाथ वदत वर विहार री। प्रियतम श्रीकृष्ण विहार के प्रबल प्रवाह के समय भी श्रीप्रियाजी के सुखों का पूर्ण ध्यान रखते हैं तभी तो विहारावसर में भी 'विरमि विरमि' कह उठते हैं। इससे उनके तत्सुखित्व भाव का परिचय मिलता है। श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु पाद के द्वारा प्रकाशित रस मार्ग स्वसुख मय नहीं वरं पूर्ण तत्सुखमय है। नित्य विहार परिकर में से युगल, श्रीवन और प्रत्येक सहचरि प्रत्येक एक दूसरे के सुखों का ही ध्यान रखता है। और इसके लिये अपने सुखों का बलिदान भी करने को उद्यत रहते हैं। श्रीवृन्दावन अपनी सम्पूर्ण श्री सम्पत्ति-शोभा, पुष्प, दल, फल, जल इत्यादि से श्रीकिशोर किशोरी एवं सखी गण को सुखी करना चाहते हैं इसी प्रकार सहचरियाँ अपने तन, मन

२४० • • हित चौरासी प्राण एवं आत्मा तक वलिदान करके युगल रसिक नरेश को सुख प्रदान करने के लिये सदा लालायित रहती हैं। उनमें व्रज परिकर की गोपियों के समान स्वसुख वासना नहीं है। रास लीला प्रकरण में श्रीकृष्ण के अन्तर्हित होने पर गोपियों ने कहा था- मधुरया गिरा वल्गु वाक्यया, बुध मनोज्ञया पुष्करेक्षण। विधि करीरिमा वीर मुह्यती- रधर सीधुनाप्याययस्व नः॥ श्रीमद्भाग. १०/३१/८ अर्थात् "हे कमल नयन ! हे वीर ! विद्वानों के भी मन को प्रिय लगने वाली और मनोहर पदावली युक्त आपकी मधुर वाणी से हम आपकी दासियाँ मोहित हो रही हैं, अतः आप अपना अधरामृत पिलाकर हमें जीवन दान दीजिये।" यह अधरामृत पान करने की इच्छा- स्व सुख वासना-नित्य विहार रस सेविका सखियों में कदापि नहीं है। वे युगल किशोर के रस मय विहार का दर्शन करके ही उस सुख का भी अनुभव कर लेती हैं जो युगल किशोर को भी अप्राप्य है इसी लिये कहा गया है- लाल लाड़िली प्रेम ते, सरस सखिनु कौ प्रेम। वे तत्सुख मयी सखियाँ किस अनुपम सुख का आस्वादन करती हैं उस विहार का अवलोकन करके, देखिये- विटकुल नृपति किसोरी कर धृत बुधि वल नीवी बंधन मोचत। नेति नेति वचनामृत बोलत प्रनय कोप प्रीतम नहिं सोचत।। (जै श्री) हित हरिवंश रसिक ललितादिक लता भवन रंध्रनि अवलोकत। अनुपम सुख भर भरित विवस असु आनँद वारि कंठ दृग रोकत।। वे सखियाँ आनन्द की अधिकता या सुख के अपार प्रवाह में निकल भागते हुए अपने प्राण एवं आँसुओं को कण्ठ और आँखों में प्रयत्न पूर्वक रोकती हैं। नित्य विहारिणि सखियों में व्रज मण्डल की सखियों की भाँति स्पर्धा और ईर्ष्या नहीं है। गोपियों की ईर्ष्या के उदाहरण ब्रज रस के गान करने वाले संतो के काव्य में खूब मिलेंगे यहाँ उनका उद्धरण देना अनावश्यक है। इसीलिये

हित चौरासी • • २४१ इन सखियों की सर्वोपरिता और प्रेम की पूर्ण पराकाष्ठा प्रकट करने के लिये श्रीहित ध्रुवदासजी महाराज ने कहा है- गोपिनु के सम भक्त न आहीं। उद्धव विधि तिनकी रज चाहीं।। तिनहूँ कौ मन तहाँ न परसै। जेहि ठाँ ललितादिक छबि दरसै।। नित्य विहार अखंडित धारा। मधुर वैस रस विवि सुकुमारा।। इस श्रेष्ठता का मूल है नित्य विहार की सर्वोपरि एवं विलक्षण तत्सुख मयी भावना। अस्तु; जिस प्रकार सखियाँ युगल के सुख में सुखी हैं, उसी प्रकार युगल रसिक नरेश भी परस्पर में एक दूसरे के लिये एवं दोनों मिलकर सखियों के लिये अपने सुखों के त्याग पूर्वक उनको सुखी करने के लिये सर्व भावेन सन्नद्ध रहते हैं। पहले यह देखा जाय कि युगल किशोर सखियों के लिये क्या करते हैं ! युगल किशोर जो भी क्रीड़ाएँ करते हैं अपनी रुचि, प्रीति, इच्छा की पूर्ति के लिये नहीं वरं अपनी प्यारी सखियों के लिये। वे उनके खिलौने बने हुए दारु यन्त्रवत् उन्हीं प्रेममयी सखियों के हाथों खेले खिलाये जाते हैं- दियें लियें मन रहें सहेली दंपति मिले खिलौना। कानन छबि सर क्रीड़त साँवल गौर हंस मनु छौंना।। छिन छिन नये नये अस कौतुक भये न हैं पुनि हौंना। वृंदावन हित रूप अमी नैननि की ओक अँचौंना।। -चाचा वृन्दावन हित रूप युगल किशोर सखियों के हाथ के खिलौने ही नहीं अपितु युगल एवं सखियों की रुचि एवं क्रिया की कितनी एकता है, वे किस प्रकार एक दूसरे के भावों से ओत प्रोत हैं; देखिये- हम गावैं सोई करैं, सहज लाड़िली लाल। करैं लाड़िली लाल सो, हम गावैं तत्काल।।

२४२ • • हित चौरासी हम गावैं तत्काल सूत दुहुँ दिसि को ऐसौ। बुध जन लेहु विचारि कमल दिनकर को जैसौ।। लीला ललित विहार स्याम स्यामा मन भावैं। 'भगवत रसिक' अनन्य उपासक अनुदिन गावैं।। —श्रीभगवत रसिकजी अब अन्त में युगल किशोर के पारस्परिक तत्सुखित्व भाव की महा मधुर झाँकी कीजिये। दोनों के तन, मन प्राण प्रेम की तल्लीनता में एक मेक हो गये हैं, श्रीहिताचार्य चरण इसका सरस चित्र अङ्कित करते हैं- जोइ जोइ प्यारौ करै सोई मोहिं भावै, भावै मोहिं जोइ सोई सोई करैं प्यारे। दोनों की क्रिया एवं रुचि मानो एक हो गयी है और परस्पर में प्रियता भी इतनी कि- मेरे तन मन प्रानहूँ तें प्रीतम प्रिय, प्रीतम अपने कोटिक प्रान मोसों हारे। यदि श्रीप्रियाजी ने अपने एक तन मन और प्राण को उन पर न्यौछावर किया है तो श्रीलालजी ने भी अपने कोटि कोटि प्राण और तन मन को उन पर न्यौछावर कर दिया है। ये प्रियतम अपनी प्राण प्रिया के सुख सम्पादन में कितने तत्पर हैं ? देखिये- चरन धरत प्यारी जहाँ लाल धरत तहँ नैन। इसलिये कि उनके सुकुमार चरणों में भूमि की कठोरता कष्ट न पहुँचा दे। इसके लिये वे अपनी पलकों की बुहारी बनाकर उस लता भवन को बुहार डालते हैं जहाँ जानते हैं कि यहाँ प्रियाजी विराजेंगी- पलकन की करि सौंहनी देत लाल तेहि कुंज। लता भवन से निकल प्राण प्यारी श्रीराधा वन में विहार करने चली हैं, उस समय उनके सुख के लिये प्रियतम श्याम सुन्दर क्या क्या करते हैं, उसका वर्णन श्रीमदन मोहन सूरदास जी करते हैं-

हित चौरासी • • २४३ पाछैं ललिता आगैं स्यामा प्यारी, ता आगैं पिय मारग फूल विछावत जात। कठिन कली बीनि बीनि न्यारी करत, प्यारी के चरन कोमल जानि सकुच गड़िवेई डिरात।। दीरघ लता कर सौं निरवारत पाछैं, गहें डार सीस नहिं परसत पल्लव पात। सूरदास मदन मौहन पिय की री अधीनताई, देखत री मेरे नैन सिरात।। कितनी विलक्षण अधीनता, दीनता और लगन के साथ है यह तत्सुख भावना ? इसीलिये श्रीहित हरिवंश महाप्रभु ने मर्यादा रेखा सी खींच दी- प्रीति की रीति रँगीलोई जानै। अर्थात् प्रीति की रीति तो केवल रँगीले श्रीलालजी ही जानते हैं- और कोई तो जानता ही नहीं, क्योंकि यही इतना बड़ा उत्सर्ग करना जानते हैं प्रीति के पथ पर। जो अपना सर्वस्व चढ़ा चुके हैं उनके चरणों पर उन्हीं के लिये एक सर्वश्रेष्ठ एवं आदर्श प्रेमी का पद प्रदान किया सुज्ञ रसिकों ने- एकै प्रेमी एक रस, श्रीराधावल्लभ आहि। भूलि कहै जो और ठाँ झूठो जानौं ताहि।। -श्रीहित ध्रुवदासजी इन परम प्रेमी प्रियतम श्रीलालजी की ही भाँति प्रियतमा श्रीराधा अपने प्राणेश्वर के सुख चिन्तन एवं कार्य कुशलता में सलग्न रहती हैं। यदि श्रीलालजी उनके सुखों का ध्यान मध्य रति काल में भी रख सकते हैं और 'विरमि विरमि' वचनामृत प्रवाहित कर सकते हैं तो प्रियतम सुख मयी प्रिया भी अपना सर्वस्व उनके चरणों में प्रतिक्षण समर्पित करती रहती हैं। वे उनके प्रेम में उन्हें भूल तक जाती हैं और फिर मानिनि बन बैठती हैं और उनकी विरह-व्यथित दशा सुनकर व्याकुल भी हो उठती हैं। उनका प्रेम विलक्षण है। वे कितनी तन्मय हैं प्रियतम में, इसे कभी प्रकट नहीं करना चाहतीं। प्रियतम के दुःख के सन्देश सुनते ही किस आतुरता से दौड़ पड़ती हैं इसका वर्णन हित चौरासी में देखिये-

२४४ • • हित चौरासी (१) (जै श्री) हित हरिवंश परम कौंमल चित, चपल चली पिय तीर। सुनि भय भीत वज्र कौं पिंजर सुरत सूर रणवीर।। (२) (जै श्री) हित हरिवंश चली अति आतुर श्रवन सुनत तेहि काल। लै राखे गिरि कुच बिच सुन्दर सुरत सूर ब्रज बाल।। (३) चपल चली तन की सुधि बिसरी सुनत श्रवन। (जै श्री) हित हरिवंश मिले रस लंपट राधिका रवन।। (४) अतिसै प्रीति हुती अंतरगत हित हरिवंश चली मुकुलित मन। निविड़ निकुंज मिले रस सागर जीते सत रतिराज सुरत रन।। आपकी उदारता और कृपालुता पूर्ण तत्सुख भावना से समस्त व्रज साहित्य काव्य भरा पड़ा है। श्रीकृष्ण आपकी उदारता से ही आज रसिक शेखर की उपाधि से विभूषित हो सके हैं। वे जब जब प्रेम परवश होकर मूर्च्छित होते हैं तब तब प्रियतम सुख को ही सर्वस्व जानने वाली उदार स्वामिनी उन्हें 'अपना महामधुर अधर रस दान करती और मानो उन्हें जीवन दान देती हैं, इसी लिये ये श्रीकृष्ण सजीवनी हैं। जब उदार होती हैं, तब अपना सर्वस्व दान करते न विलम्ब करतीं और न सङ्कोच ही। श्रीहिताचार्य पाद कहते हैं- करुना करि उदार राखत कछु न सार, दसन बसन लागत जब दैन। एवं- आजु रहसि मोहन सब लूटी विविध अपनी थाती। ये वाक्य आपकी उदार भावना के प्रमाण हैं। आपके प्रेम और तत्सुख भाव की गति गोप्य और अद्भुत है- देखौ अदभुत प्रीति की चालहिं। सुनु सखि पियहिं प्यार सौं प्यारी, राखति ज्यौं उर मालहिं।। ह्वै ह्वै जात विवस मन मोहन, निरखि नैन मन चालहिं।

हित चौरासी * • २४५ 'हित ध्रुव' सरस मधुर अधरामृत प्याइ जिवावति लालहिं।। अस्तु; समस्त नित्य विहार परिकर इसी प्रकार परस्पर 'तत्सुख सुखित्वम्' में तल्लीन है। विश्व में प्रत्येक नायिका नायक अपने अपने सुखों से बँधे स्वसुख वाञ्छा से ही समस्त कोक विलास क्रिड़ाएँ करते हैं किन्तु यहाँ यह नहीं है, एक दम विपरीत है। पूर्ण तत्सुख भाव है। और 'विरमि विरमि नाथ वदत वर विहार री' इससे उसका सङ्केत मिलता है। यह तत्सुख भावना ही श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद की नित्य विहार रसोपासना का जीवन है और मूल है।

  • ७७ - अवतरण-श्रीप्रियाजी ने रात्रि में आज अपने प्रियतम के साथ रति क्रीड़ा की है, जिसके चिह्न प्रातः काल उनके श्रीअङ्गों में स्पष्ट दिख रहे हैं। उन नखाघात आदि चिह्नों को दखकर श्रीहित अलिजी अपनी सखियों से कह रही हैं- कान्हरौ मूल- लटकति फिरति जुवति रस फूली। लता भवन में सरस सकल निसि, पिय सँग सुरत हिंडोरे झूली।। जद्यपि अति अनुराग रसासव- पान विवस नाहिंन गति भूली। आलस वलित नैन विगलित लट, उर पर कछुक कंचुकी खूली।। मरगजी माल सिथिल कटि बंधन, चित्रित कज्जल पीक दुकूली। (जै श्री) हित हरिवंश मदन सर जरजर, विथकित स्याम सँजीवन मूली।।७७।। भावार्थ-आज युवति राधिका रस में फूली-फूली लटकती फिरती है क्योंकि वह सम्पूर्ण रात लता भवन में अपने प्रियतम के साथ सरसता पूर्वक

२४६ • • हित चौरासी सुरत रस के झूले झूलती रही है न ? यद्यपि वह (अपने प्रियतम के) अनुराग रूप रसासव का पान करके विवश है फिर भी उसे गति का विस्मरण नहीं हुआ है (अर्थात् यथाशक्य अपनी ओर की सावधानी अवश्य कर रही है चाहे भले ही न कर पावे ।) उसकी आँखें आलस्य से वल खा रही हैं- झँप झँप जाती हैं, केश लटें विखरी हुई अलग लटक रही हैं और वक्ष स्थल पर कुछ कुछ खुली हुई सी चोली भी शोभित है। ऐसे ही (हृदय पर पड़ी हुई) फूल माला भी मसल गयी है, कटि की डोरी (नीबी) ढीली हो गयी है और नीलाम्बर भी पीक एवं कज्जल से चित्रित हो चुका है। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं-(स्पष्ट है कि) श्याम सुन्दर श्रीलालजी की सजीवन मूली-सजीवनी जड़ी श्रीराधिका आज मदन के वाणों से जर्जर (अत्यन्त घायल) हो चुकी है अतएव विशेष रूप से थकित हो चुकी है। टिप्पणी- 'नाहिंन गति भूली' जब प्रियतम बार-बार प्रेम में मूर्च्छित और विवश हो जाते हैं तब प्रियाजी भी जो उन पर अपार प्रेम रखती हैं वे विवश होकर अपनी सुधि बुधि कैसे नहीं भूलतीं? यह सहज आशङ्का है। इसका समाधान भी सहज है। प्रियतम का प्रेम उनके हृदय में समाता नहीं अतः छलक पड़ता है इसी कारण मूर्च्छा, प्रलय और प्रेम के अनेकों अनुभाव देखे जाते हैं किन्तु प्रियाजी का प्रेम जो उनके हृदय में अपने प्रियतम के लिये है इतना गम्भीर और शान्त है जैसे महासागर। जो गङ्गा और सिन्धु जैसे महानदों के मिलने पर भी किसी प्रकार किञ्चिन्मात्र भी उद्वेलित नहीं होता वह सदा अपनी एक सी स्थिति में शान्त और स्थिर रहा आता है। यदि उस प्रेम महासमुद्र में बाढ़ आ जाय वह अपनी मर्यादा का उल्लङ्घन कर जाय तो फिर उसका सम्हालना भी कठिन क्या, असम्भव हो जायगा। फिर तो वह महाप्रलय ही करके रुकेगा ऐसा यह अद्वितीय और अपार प्रेम स्वयमेव अपनी सम्हाल रखता और सीमा का उल्लङ्घन नहीं करना चाहता।

हित चौरासी • • २४७ इसीलिये कहा गया है- जैसी प्रीति लाल की गाई। ताते अधिक प्रिया की माई॥ और यहाँ उस अपार प्रेम सागर की स्वयं सावधानी का वर्णन किया श्रीहिताचार्य चरण ने- जद्यपि अति अनुराग रसासव, पान-विवस नाहिंन गति भूली।

  • ७८ - अवतरण - वसन्त का सुहावना समय है। वासन्ती छटा से मुग्ध प्रिया आज स्वयं नृत्य के लिये तत्पर हैं। मानो नृत्य के बहाने हठात् प्रियतम का मन चुराना चाह रही हैं। जब वे तान बन्धान के साथ "हो हो होरी" कहती हैं तो प्रियतम रस में छक जाते और उनके प्राण प्रेम विह्वल होकर प्रियाजी पर बलिहार हो जाते हैं। सखियाँ इस रस का आस्वादन करतीं हैं। श्रीहित सजनी इसका वर्णन कर रही हैं- कान्हरौ मूल- सुधंग नाचत नवल किसोरी। थेई थेई कहति चहति प्रीतम दिसि, वदन चंद मनौँ त्रिषित चकोरी॥ तान बंधान मान में नागरि देखत स्याम कहत हो हो होरी। (जै श्री) हित हरिवंश माधुरी अँग अँग, बरवस लियौ मोहन चित चोरी॥७८॥ भावार्थ-नवल किशोरी राधिका आज सुधङ्ग नृत्य नाच रही है और थेइ थेई कहते हुए अपने प्रियतम के मुख चन्द्र की ओर ऐसे देखती है जैसे (रूप की) प्यासी चकोरी।

२४८ • • हित चौरासी नृत्य गान की तान और उसके यथा-स्थल बन्धान (ठेका) सहित नृत्य करने वाली मानमयी चतुरा नागरी श्रीप्रियाजी को देखकर प्रियतम श्याम सुन्दर 'हो हो होरी' कहते (हुए हर्ष से भर कर उनकी प्रशंसा करते) हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं कि इस प्रकार इस नवल किशोरी ने अपने अङ्ग प्रत्यङ्गों की (हाव भाव पूर्ण) मधुरिमा से प्रियतम श्रीलालजी का मन बरवश (हठात्) चुरा लिया है। – ७९ – अवतरण – आज युगल किशोर मिले हुए नृत्य कर रहे हैं किन्तु इस नृत्य में प्रधानता है प्रियाजी की। सखियाँ दर्शन करतीं और कुछ वाद्य बजाती हैं। श्रीहित सखी इसका वर्णन कर रही हैं अपनी समीपवर्त्ती सखियों से- कान्हरौ मूल-रहसि रहसि मोहन पिय के संग री, लड़ैती अति रस लटकति। सरस सुधंग अंग में नागरि, थेई थेई कहति अवनि पद पटकति।। कोक कला कुल जानि सिरोमनि, अभिनय कुटिल भृकुटियनि मटकति। विवस भये प्रीतम अलि लंपट, निरखि करज नासा पुट चटकति ।। गुन गनु रसिक राइ चूड़ामनि रिझवति पदिक हार पट झटकति। (जै श्री) हित हरिवंश निकट दासीजन, लोचन चषक रसासव गटकति।।७९।। भावार्थ- "अरी सखि ! लाड़िली राधा आज अपने प्रियतम मोहन लाल के साथ अनन्दित हो होकर रस पूर्वक लटक रही है अर्थात् लटकती हुई नृत्य कर रही है और अपने अङ्गों में सुधङ्ग नृत्य की गतियाँ भरकर 'थेई थेई' कहती

हित चौरासी • • २४६ हुई भूमि पर चरणों को पटकती है। हे सखि ! ये राधा समस्त कोक कलाओं की शिरोमणि रूपा हैं अतः हाव भाव पूर्वक अपनी कुटिल भृकुटियों को मटकाती हैं या नचा रही हैं जिससे रस लम्पट भ्रमर श्रीलालजी रस विवश हो रहे हैं। उनकी विवशता को देखकर श्रीराधा अपनी उँगलियों से नासा पुट चटका रही है अर्थात् श्रीलालजी को सचेत करने के लिये उनकी नासिका के निकट अपनी उँगलियों से चुटकी चटका बजा रही है।" श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं "इस प्रकार अनेक गुण गणों से पूर्ण एवं रसिक राज चूड़ामणि श्रीलालजी को रिझा रही है एवं उनकी मालाएँ, पदक और वस्त्रों को झटक रही है, (मानो रस का उद्दीपन कर रही है।) समीप में स्थित सखी गण इस नृत्य को देखकर अपने नेत्र रूप प्यालों से इस रस आसव का पान कर रही हैं, (या इसे तृष्णा पूर्वक शीघ्र शीघ्र गटक रही हैं।) – ८० – अवतरण – शैय्या विहार के अवसर की एक अत्यन्त ही गोपनीय भावना का चित्रण इस पद में किया गया है। जो सुज्ञ रसिकों की हृदय गम्य भावना का प्राण है। उसका अधिक स्पष्टीकरण द्रौपदी का चीर हरण होगा। इस रस भावना का कथन, श्रवण और मनन सब कुछ मौन में है क्योंकि इसकी चर्चा वैखरी वाणी में नहीं वल्कि परा पश्यन्ति में होती है; जैसा कि श्रीकृष्ण गढ़ाधीश सन्त नागरीदास जी ने कहा है– चरचा करी कैसे जाय? बात जानत कछुक हम पै कहत जिय थरराय।। मौन ही में कहनि ताकी सुनत श्रोता नैन। सोऽब नागर लोग बूझत कहि न आवत बैन।। अतः विवशता है इसके स्पष्ट करने में। रसिक जन अनुभव करें कि श्री हिताचार्य चरण क्या कह रहे हैं, वे कौनसी रसामृत धारा बहा रहे हैं–

२५० • • हित चौरासी कान्हरौ मूल–वल्लवी सु कनक वल्लरी तमाल स्याम संग, लागि रही अंग अंग मनोभिरामिनी। वदन जोति मनौं मयंक अलक तिलक छबि कलंक, छपति स्याम अंक मनौं जलद दामिनी॥ विगत वास हेम खंभ मनौं भुवंग वैनी दंड, पिय के कंठ प्रेम पुंज कुंज कामिनी। (जै श्री) सोभित हरिवंश नाथ साथ सुरत आलस वंत, उरज कनक कलस राधिका सुनामिनी॥८०॥ भावार्थ – (श्रीहित सखी ने कहा–"सखियो ! आज) स्वर्ण लता रूप परम सुन्दरी वल्लवी श्याम तमाल के साथ अङ्ग अङ्ग से लिपट चिपट रही है। उसकी वदन ज्योति क्या है; चन्द्र और उस वदन पर शोभित अलकें एवं तिलक ही हैं उस चन्द्र के कलङ्क। वह कनक लता, श्याम के अङ्क में ऐसी चिपट रही है, जैसे घन में दामिनि। वह विगत वसना स्वर्ण स्तम्भ सी जान पड़ती है, उसका वेणी दण्ड क्या है मानो भुजङ्ग–काला नाग। वह प्रेम पुञ्ज कुञ्ज कामिनि अपने प्रियतम के कण्ठ से लगी है। वह´सुरतालस मयी शोभा पा रही है श्रीहरिवंश नाथ के साथ। कनक कलशोपम उरोजों से शोभामयी सुन्दरी वह सुन्दर नाम वाली राधा ही है।" टिप्पणी– श्रीराधा रस की अधिष्ठात्री देवी है। वे रस की अनन्त और ओर छोर रहित विशाल धारा हैं–स्वयं रस रूपा हैं। इन्हीं से रस की प्राप्ति करके श्रीकृष्ण रसिक शिरोमणि कहलाते हैं। श्रीराधे के विना श्याम सदा ही आधे हैं। पूर्ण तो वे इसी रस मूर्त्ति को पाकर हो सके हैं अस्तु; तज्ज्ञात्वा तदेव भवति 'अर्थात् उस ब्रह्म को जानकर वही हो जाता है,' इस न्याय से जो इन श्रीराधा एवं श्रीकृष्ण–रस ब्रह्म की उपासना करके उनका ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं वे भी रस रूप ही हो जाते हैं। इस तरह इन रस ब्रह्म को प्राप्त समस्त परिकर अर्थात् वृन्दावन सहचरि एवं खग मृगादि दिव्य रस मय ही हैं या यों कह दें–सर्वं रसमयं ब्रह्म अर्थात् यह सब चराचर रसमय ब्रह्म ही है।

हित चौरासी • • २५१ इस रस ब्रह्म की उपासना श्रीवृन्दावन के रसिक भक्तों ने बड़ी तल्लीनता से की है। आज भी उनकी प्रेम तल्लीनता की झाँकी उनके रसमय हृदय से निनादित प्रेम वीणा की झनकारों-गीतों से प्राप्त होती है। उन वाणियों में, शब्दों में, पदों में वह अनिर्वचनीय रस भरा है, जिसका आस्वादन किया जा सकता है अपनी पात्रता के अनुसार, किन्तु वर्णन नहीं। इसका आस्वादन होता है दिव्य हितमय आत्मा में और वर्णन होता है परा पश्यन्ति में। श्रीवन के रसिक जन-पूर्वाचार्यों ने अपनी अनन्त शक्ति के योग से उस 'परा पश्यन्ति' के विषय को भी एक बार वैखरी का विषय बना दिया। अलभ्य और असुलभ वस्तु को सुलभ कर दिया उन्होंने कृपा परवश होकर। वे समर्थ थे, स्वयं रस रूप थे; उनके लिये यह बात क्या असम्भव थी ? उसी परा पश्यन्ति के स्वानन्दानुभव की एक झाँकी है। यह- वल्लवी सु कनक वल्लरी.... .....राधिका सुनामिनी।। एक तो इसके स्पष्टीकरण की शक्ति नहीं और दूसरे इसे स्पष्ट करते हृदय काँपता है वाणी रुक रुक जाती है, आंखें झूम झूम जाती हैं, भावों में ज्वार आ जाता है और हठात लेखनी जड़ता धारण करने लगती है, .... विवशता है। ......ब्रह्म अव्यक्त है और रस भी अव्यक्त है। अव्यक्त का अर्थ ही है जो मन, वाणी एवं बुद्धि किसी के भी द्वारा न तो प्रकट किया जा सके न उनमें आ सके सारांश यह कि जो इनका अविषय हो। अतः अपनी शक्ति के अनुसार कहे सुने जाने पर भी यह रस शेष रह जाता है क्योंकि अनादि है अनन्त है। इस अनादि अनन्त व्यापक अव्यक्त रस ब्रह्म का वर्णन कौन करे और कैसे करे ? इस रस क्षेत्र के भावों की ओर केवल इङ्गित मात्र किया जाता है। ये सङ्केत अवश्य किसी कुशल कलाकार की अपेक्षा रखते हैं क्योंकि इस सूक्ष्माति सूक्ष्म रसानुभव का प्रकाशन भी तो एक विलक्षण कला है, इन कलाकारों में से एक श्री जयदेव कविराज भी हैं। उनकी काव्य कला कुशलता और रसानुभव प्रकाश कला कुशलता कीओर रसिक पाठक गण अपनी रसमयी प्रज्ञा को प्रेरित करें।

२५२ • • हित चौरासी मानवती नायिका श्रीराधा को निकुञ भवन तक ले चलने के लिये दूतिका रस विलास की स्मृति दिलाकर उल्लास जागृत करती हुई प्रियतम श्रीलालजी से मिला देने का उद्योग कर रही है। वह कह रही है- उरसि मुरारेरुपहित हारे घन इव तरल वलाके। तडिदिव पीते रति विपरीते राजसि सुकृत विपाके॥ विगलित वसनं परिहृत रसनं घटयजघनमपिधानम्। किशलय शयने पङ्कज नयने निधिमिव हर्ष निधानम्॥ धीर समीरे यमुना तीरे वसति वने वनमाली। गोपी पीन पयोधर मर्दन चञ्चल कर युग शाली॥ “दूती ने कहा-नितम्बिनि ! अब गमन करने में विलम्ब की आवश्यकता नहीं रही। देखो न, गोपियों के पुष्ट पयोधरों का मर्दन करने में अत्यन्त चञ्चल एवं कुशल मदन मनोहर श्रीकृष्ण आज केवल तुम्हारे लिये यमुना पुलिन धीर समीर पर विराज रहे हैं। वे तुम्हारा नाम ले लेकर वंशी बजाते और तुम्हारे आने की आहट के भ्रम वश पत्तों की खरखराहट से भी चौंक चौंक उठते हैं। राधे ! वे सचकित नयनों से निरन्तर तुम्हारी प्रतीक्षा करते हैं। जब वे तुम्हारे लिये उतने व्याकुल है तब तुम भी चलकर उनसे मिलो न !” “देखो कैसी काली-काली रात है। इस अँधेरी रात में डर किस बात का ? तुम्हें कोई जान भी न सकेगा, खूब छिपेगी काली रात में तुम्हारी नीली साड़ी। अब शीघ्र अपना नील निचोल पहन लो और इन वाचाल नूपुरों को-चुगल खोरों को छोड़ दो वैरी की तरह। ये हैं भी इसी योग्य !” “प्यारी राधे ! तुम वहाँ चलकर श्याम सुन्दर के हृदय से ऐसी लग जाओ, जैसे घन के सङ्ग तरल दामिनि। जैसी तुम गौराङ्गी चपला हो वैसे वे भी सघन नील नीरद श्याम हैं। जब तुम उनके हृदय से चिपटोगी-रति विपरीत विलास करोगी तभी यह तुम्हारी घन दामिनि की उपमा सत्य जँचेगी। उस मिलन के अवसर में तुम विगलित वसना और भूषण रहित हो जाना और ललित कनक लता की भाँति उनके श्रीअङ्गों से लग जाना। हे कमलनयने ! जब वे तुम्हें किशलय शय्या पर निवेशित करेंगे तब उन रसनिधि के रस का आस्वादन केवल तुम्हारे ही भाग्य में होगा।”