हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 252, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ें२४६ • • हित चौरासी सुरत रस के झूले झूलती रही है न ? यद्यपि वह (अपने प्रियतम के) अनुराग रूप रसासव का पान करके विवश है फिर भी उसे गति का विस्मरण नहीं हुआ है (अर्थात् यथाशक्य अपनी ओर की सावधानी अवश्य कर रही है चाहे भले ही न कर पावे ।) उसकी आँखें आलस्य से वल खा रही हैं- झँप झँप जाती हैं, केश लटें विखरी हुई अलग लटक रही हैं और वक्ष स्थल पर कुछ कुछ खुली हुई सी चोली भी शोभित है। ऐसे ही (हृदय पर पड़ी हुई) फूल माला भी मसल गयी है, कटि की डोरी (नीबी) ढीली हो गयी है और नीलाम्बर भी पीक एवं कज्जल से चित्रित हो चुका है। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं-(स्पष्ट है कि) श्याम सुन्दर श्रीलालजी की सजीवन मूली-सजीवनी जड़ी श्रीराधिका आज मदन के वाणों से जर्जर (अत्यन्त घायल) हो चुकी है अतएव विशेष रूप से थकित हो चुकी है। टिप्पणी- 'नाहिंन गति भूली' जब प्रियतम बार-बार प्रेम में मूर्च्छित और विवश हो जाते हैं तब प्रियाजी भी जो उन पर अपार प्रेम रखती हैं वे विवश होकर अपनी सुधि बुधि कैसे नहीं भूलतीं? यह सहज आशङ्का है। इसका समाधान भी सहज है। प्रियतम का प्रेम उनके हृदय में समाता नहीं अतः छलक पड़ता है इसी कारण मूर्च्छा, प्रलय और प्रेम के अनेकों अनुभाव देखे जाते हैं किन्तु प्रियाजी का प्रेम जो उनके हृदय में अपने प्रियतम के लिये है इतना गम्भीर और शान्त है जैसे महासागर। जो गङ्गा और सिन्धु जैसे महानदों के मिलने पर भी किसी प्रकार किञ्चिन्मात्र भी उद्वेलित नहीं होता वह सदा अपनी एक सी स्थिति में शान्त और स्थिर रहा आता है। यदि उस प्रेम महासमुद्र में बाढ़ आ जाय वह अपनी मर्यादा का उल्लङ्घन कर जाय तो फिर उसका सम्हालना भी कठिन क्या, असम्भव हो जायगा। फिर तो वह महाप्रलय ही करके रुकेगा ऐसा यह अद्वितीय और अपार प्रेम स्वयमेव अपनी सम्हाल रखता और सीमा का उल्लङ्घन नहीं करना चाहता।