भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 275 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 251

हित चौरासी * • २४५ 'हित ध्रुव' सरस मधुर अधरामृत प्याइ जिवावति लालहिं।। अस्तु; समस्त नित्य विहार परिकर इसी प्रकार परस्पर 'तत्सुख सुखित्वम्' में तल्लीन है। विश्व में प्रत्येक नायिका नायक अपने अपने सुखों से बँधे स्वसुख वाञ्छा से ही समस्त कोक विलास क्रिड़ाएँ करते हैं किन्तु यहाँ यह नहीं है, एक दम विपरीत है। पूर्ण तत्सुख भाव है। और 'विरमि विरमि नाथ वदत वर विहार री' इससे उसका सङ्केत मिलता है। यह तत्सुख भावना ही श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद की नित्य विहार रसोपासना का जीवन है और मूल है।

  • ७७ - अवतरण-श्रीप्रियाजी ने रात्रि में आज अपने प्रियतम के साथ रति क्रीड़ा की है, जिसके चिह्न प्रातः काल उनके श्रीअङ्गों में स्पष्ट दिख रहे हैं। उन नखाघात आदि चिह्नों को दखकर श्रीहित अलिजी अपनी सखियों से कह रही हैं- कान्हरौ मूल- लटकति फिरति जुवति रस फूली। लता भवन में सरस सकल निसि, पिय सँग सुरत हिंडोरे झूली।। जद्यपि अति अनुराग रसासव- पान विवस नाहिंन गति भूली। आलस वलित नैन विगलित लट, उर पर कछुक कंचुकी खूली।। मरगजी माल सिथिल कटि बंधन, चित्रित कज्जल पीक दुकूली। (जै श्री) हित हरिवंश मदन सर जरजर, विथकित स्याम सँजीवन मूली।।७७।। भावार्थ-आज युवति राधिका रस में फूली-फूली लटकती फिरती है क्योंकि वह सम्पूर्ण रात लता भवन में अपने प्रियतम के साथ सरसता पूर्वक
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक) · पृष्ठ 251, कुल 275 में से · BharatKosha