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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

हित चौरासी * • २४५ 'हित ध्रुव' सरस मधुर अधरामृत प्याइ जिवावति लालहिं।। अस्तु; समस्त नित्य विहार परिकर इसी प्रकार परस्पर 'तत्सुख सुखित्वम्' में तल्लीन है। विश्व में प्रत्येक नायिका नायक अपने अपने सुखों से बँधे स्वसुख वाञ्छा से ही समस्त कोक विलास क्रिड़ाएँ करते हैं किन्तु यहाँ यह नहीं है, एक दम विपरीत है। पूर्ण तत्सुख भाव है। और 'विरमि विरमि नाथ वदत वर विहार री' इससे उसका सङ्केत मिलता है। यह तत्सुख भावना ही श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद की नित्य विहार रसोपासना का जीवन है और मूल है।

  • ७७ - अवतरण-श्रीप्रियाजी ने रात्रि में आज अपने प्रियतम के साथ रति क्रीड़ा की है, जिसके चिह्न प्रातः काल उनके श्रीअङ्गों में स्पष्ट दिख रहे हैं। उन नखाघात आदि चिह्नों को दखकर श्रीहित अलिजी अपनी सखियों से कह रही हैं- कान्हरौ मूल- लटकति फिरति जुवति रस फूली। लता भवन में सरस सकल निसि, पिय सँग सुरत हिंडोरे झूली।। जद्यपि अति अनुराग रसासव- पान विवस नाहिंन गति भूली। आलस वलित नैन विगलित लट, उर पर कछुक कंचुकी खूली।। मरगजी माल सिथिल कटि बंधन, चित्रित कज्जल पीक दुकूली। (जै श्री) हित हरिवंश मदन सर जरजर, विथकित स्याम सँजीवन मूली।।७७।। भावार्थ-आज युवति राधिका रस में फूली-फूली लटकती फिरती है क्योंकि वह सम्पूर्ण रात लता भवन में अपने प्रियतम के साथ सरसता पूर्वक

२४६ • • हित चौरासी सुरत रस के झूले झूलती रही है न ? यद्यपि वह (अपने प्रियतम के) अनुराग रूप रसासव का पान करके विवश है फिर भी उसे गति का विस्मरण नहीं हुआ है (अर्थात् यथाशक्य अपनी ओर की सावधानी अवश्य कर रही है चाहे भले ही न कर पावे ।) उसकी आँखें आलस्य से वल खा रही हैं- झँप झँप जाती हैं, केश लटें विखरी हुई अलग लटक रही हैं और वक्ष स्थल पर कुछ कुछ खुली हुई सी चोली भी शोभित है। ऐसे ही (हृदय पर पड़ी हुई) फूल माला भी मसल गयी है, कटि की डोरी (नीबी) ढीली हो गयी है और नीलाम्बर भी पीक एवं कज्जल से चित्रित हो चुका है। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं-(स्पष्ट है कि) श्याम सुन्दर श्रीलालजी की सजीवन मूली-सजीवनी जड़ी श्रीराधिका आज मदन के वाणों से जर्जर (अत्यन्त घायल) हो चुकी है अतएव विशेष रूप से थकित हो चुकी है। टिप्पणी- 'नाहिंन गति भूली' जब प्रियतम बार-बार प्रेम में मूर्च्छित और विवश हो जाते हैं तब प्रियाजी भी जो उन पर अपार प्रेम रखती हैं वे विवश होकर अपनी सुधि बुधि कैसे नहीं भूलतीं? यह सहज आशङ्का है। इसका समाधान भी सहज है। प्रियतम का प्रेम उनके हृदय में समाता नहीं अतः छलक पड़ता है इसी कारण मूर्च्छा, प्रलय और प्रेम के अनेकों अनुभाव देखे जाते हैं किन्तु प्रियाजी का प्रेम जो उनके हृदय में अपने प्रियतम के लिये है इतना गम्भीर और शान्त है जैसे महासागर। जो गङ्गा और सिन्धु जैसे महानदों के मिलने पर भी किसी प्रकार किञ्चिन्मात्र भी उद्वेलित नहीं होता वह सदा अपनी एक सी स्थिति में शान्त और स्थिर रहा आता है। यदि उस प्रेम महासमुद्र में बाढ़ आ जाय वह अपनी मर्यादा का उल्लङ्घन कर जाय तो फिर उसका सम्हालना भी कठिन क्या, असम्भव हो जायगा। फिर तो वह महाप्रलय ही करके रुकेगा ऐसा यह अद्वितीय और अपार प्रेम स्वयमेव अपनी सम्हाल रखता और सीमा का उल्लङ्घन नहीं करना चाहता।

हित चौरासी • • २४७ इसीलिये कहा गया है- जैसी प्रीति लाल की गाई। ताते अधिक प्रिया की माई॥ और यहाँ उस अपार प्रेम सागर की स्वयं सावधानी का वर्णन किया श्रीहिताचार्य चरण ने- जद्यपि अति अनुराग रसासव, पान-विवस नाहिंन गति भूली।

  • ७८ - अवतरण - वसन्त का सुहावना समय है। वासन्ती छटा से मुग्ध प्रिया आज स्वयं नृत्य के लिये तत्पर हैं। मानो नृत्य के बहाने हठात् प्रियतम का मन चुराना चाह रही हैं। जब वे तान बन्धान के साथ "हो हो होरी" कहती हैं तो प्रियतम रस में छक जाते और उनके प्राण प्रेम विह्वल होकर प्रियाजी पर बलिहार हो जाते हैं। सखियाँ इस रस का आस्वादन करतीं हैं। श्रीहित सजनी इसका वर्णन कर रही हैं- कान्हरौ मूल- सुधंग नाचत नवल किसोरी। थेई थेई कहति चहति प्रीतम दिसि, वदन चंद मनौँ त्रिषित चकोरी॥ तान बंधान मान में नागरि देखत स्याम कहत हो हो होरी। (जै श्री) हित हरिवंश माधुरी अँग अँग, बरवस लियौ मोहन चित चोरी॥७८॥ भावार्थ-नवल किशोरी राधिका आज सुधङ्ग नृत्य नाच रही है और थेइ थेई कहते हुए अपने प्रियतम के मुख चन्द्र की ओर ऐसे देखती है जैसे (रूप की) प्यासी चकोरी।

२४८ • • हित चौरासी नृत्य गान की तान और उसके यथा-स्थल बन्धान (ठेका) सहित नृत्य करने वाली मानमयी चतुरा नागरी श्रीप्रियाजी को देखकर प्रियतम श्याम सुन्दर 'हो हो होरी' कहते (हुए हर्ष से भर कर उनकी प्रशंसा करते) हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं कि इस प्रकार इस नवल किशोरी ने अपने अङ्ग प्रत्यङ्गों की (हाव भाव पूर्ण) मधुरिमा से प्रियतम श्रीलालजी का मन बरवश (हठात्) चुरा लिया है। – ७९ – अवतरण – आज युगल किशोर मिले हुए नृत्य कर रहे हैं किन्तु इस नृत्य में प्रधानता है प्रियाजी की। सखियाँ दर्शन करतीं और कुछ वाद्य बजाती हैं। श्रीहित सखी इसका वर्णन कर रही हैं अपनी समीपवर्त्ती सखियों से- कान्हरौ मूल-रहसि रहसि मोहन पिय के संग री, लड़ैती अति रस लटकति। सरस सुधंग अंग में नागरि, थेई थेई कहति अवनि पद पटकति।। कोक कला कुल जानि सिरोमनि, अभिनय कुटिल भृकुटियनि मटकति। विवस भये प्रीतम अलि लंपट, निरखि करज नासा पुट चटकति ।। गुन गनु रसिक राइ चूड़ामनि रिझवति पदिक हार पट झटकति। (जै श्री) हित हरिवंश निकट दासीजन, लोचन चषक रसासव गटकति।।७९।। भावार्थ- "अरी सखि ! लाड़िली राधा आज अपने प्रियतम मोहन लाल के साथ अनन्दित हो होकर रस पूर्वक लटक रही है अर्थात् लटकती हुई नृत्य कर रही है और अपने अङ्गों में सुधङ्ग नृत्य की गतियाँ भरकर 'थेई थेई' कहती

हित चौरासी • • २४६ हुई भूमि पर चरणों को पटकती है। हे सखि ! ये राधा समस्त कोक कलाओं की शिरोमणि रूपा हैं अतः हाव भाव पूर्वक अपनी कुटिल भृकुटियों को मटकाती हैं या नचा रही हैं जिससे रस लम्पट भ्रमर श्रीलालजी रस विवश हो रहे हैं। उनकी विवशता को देखकर श्रीराधा अपनी उँगलियों से नासा पुट चटका रही है अर्थात् श्रीलालजी को सचेत करने के लिये उनकी नासिका के निकट अपनी उँगलियों से चुटकी चटका बजा रही है।" श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं "इस प्रकार अनेक गुण गणों से पूर्ण एवं रसिक राज चूड़ामणि श्रीलालजी को रिझा रही है एवं उनकी मालाएँ, पदक और वस्त्रों को झटक रही है, (मानो रस का उद्दीपन कर रही है।) समीप में स्थित सखी गण इस नृत्य को देखकर अपने नेत्र रूप प्यालों से इस रस आसव का पान कर रही हैं, (या इसे तृष्णा पूर्वक शीघ्र शीघ्र गटक रही हैं।) – ८० – अवतरण – शैय्या विहार के अवसर की एक अत्यन्त ही गोपनीय भावना का चित्रण इस पद में किया गया है। जो सुज्ञ रसिकों की हृदय गम्य भावना का प्राण है। उसका अधिक स्पष्टीकरण द्रौपदी का चीर हरण होगा। इस रस भावना का कथन, श्रवण और मनन सब कुछ मौन में है क्योंकि इसकी चर्चा वैखरी वाणी में नहीं वल्कि परा पश्यन्ति में होती है; जैसा कि श्रीकृष्ण गढ़ाधीश सन्त नागरीदास जी ने कहा है– चरचा करी कैसे जाय? बात जानत कछुक हम पै कहत जिय थरराय।। मौन ही में कहनि ताकी सुनत श्रोता नैन। सोऽब नागर लोग बूझत कहि न आवत बैन।। अतः विवशता है इसके स्पष्ट करने में। रसिक जन अनुभव करें कि श्री हिताचार्य चरण क्या कह रहे हैं, वे कौनसी रसामृत धारा बहा रहे हैं–

२५० • • हित चौरासी कान्हरौ मूल–वल्लवी सु कनक वल्लरी तमाल स्याम संग, लागि रही अंग अंग मनोभिरामिनी। वदन जोति मनौं मयंक अलक तिलक छबि कलंक, छपति स्याम अंक मनौं जलद दामिनी॥ विगत वास हेम खंभ मनौं भुवंग वैनी दंड, पिय के कंठ प्रेम पुंज कुंज कामिनी। (जै श्री) सोभित हरिवंश नाथ साथ सुरत आलस वंत, उरज कनक कलस राधिका सुनामिनी॥८०॥ भावार्थ – (श्रीहित सखी ने कहा–"सखियो ! आज) स्वर्ण लता रूप परम सुन्दरी वल्लवी श्याम तमाल के साथ अङ्ग अङ्ग से लिपट चिपट रही है। उसकी वदन ज्योति क्या है; चन्द्र और उस वदन पर शोभित अलकें एवं तिलक ही हैं उस चन्द्र के कलङ्क। वह कनक लता, श्याम के अङ्क में ऐसी चिपट रही है, जैसे घन में दामिनि। वह विगत वसना स्वर्ण स्तम्भ सी जान पड़ती है, उसका वेणी दण्ड क्या है मानो भुजङ्ग–काला नाग। वह प्रेम पुञ्ज कुञ्ज कामिनि अपने प्रियतम के कण्ठ से लगी है। वह´सुरतालस मयी शोभा पा रही है श्रीहरिवंश नाथ के साथ। कनक कलशोपम उरोजों से शोभामयी सुन्दरी वह सुन्दर नाम वाली राधा ही है।" टिप्पणी– श्रीराधा रस की अधिष्ठात्री देवी है। वे रस की अनन्त और ओर छोर रहित विशाल धारा हैं–स्वयं रस रूपा हैं। इन्हीं से रस की प्राप्ति करके श्रीकृष्ण रसिक शिरोमणि कहलाते हैं। श्रीराधे के विना श्याम सदा ही आधे हैं। पूर्ण तो वे इसी रस मूर्त्ति को पाकर हो सके हैं अस्तु; तज्ज्ञात्वा तदेव भवति 'अर्थात् उस ब्रह्म को जानकर वही हो जाता है,' इस न्याय से जो इन श्रीराधा एवं श्रीकृष्ण–रस ब्रह्म की उपासना करके उनका ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं वे भी रस रूप ही हो जाते हैं। इस तरह इन रस ब्रह्म को प्राप्त समस्त परिकर अर्थात् वृन्दावन सहचरि एवं खग मृगादि दिव्य रस मय ही हैं या यों कह दें–सर्वं रसमयं ब्रह्म अर्थात् यह सब चराचर रसमय ब्रह्म ही है।

हित चौरासी • • २५१ इस रस ब्रह्म की उपासना श्रीवृन्दावन के रसिक भक्तों ने बड़ी तल्लीनता से की है। आज भी उनकी प्रेम तल्लीनता की झाँकी उनके रसमय हृदय से निनादित प्रेम वीणा की झनकारों-गीतों से प्राप्त होती है। उन वाणियों में, शब्दों में, पदों में वह अनिर्वचनीय रस भरा है, जिसका आस्वादन किया जा सकता है अपनी पात्रता के अनुसार, किन्तु वर्णन नहीं। इसका आस्वादन होता है दिव्य हितमय आत्मा में और वर्णन होता है परा पश्यन्ति में। श्रीवन के रसिक जन-पूर्वाचार्यों ने अपनी अनन्त शक्ति के योग से उस 'परा पश्यन्ति' के विषय को भी एक बार वैखरी का विषय बना दिया। अलभ्य और असुलभ वस्तु को सुलभ कर दिया उन्होंने कृपा परवश होकर। वे समर्थ थे, स्वयं रस रूप थे; उनके लिये यह बात क्या असम्भव थी ? उसी परा पश्यन्ति के स्वानन्दानुभव की एक झाँकी है। यह- वल्लवी सु कनक वल्लरी.... .....राधिका सुनामिनी।। एक तो इसके स्पष्टीकरण की शक्ति नहीं और दूसरे इसे स्पष्ट करते हृदय काँपता है वाणी रुक रुक जाती है, आंखें झूम झूम जाती हैं, भावों में ज्वार आ जाता है और हठात लेखनी जड़ता धारण करने लगती है, .... विवशता है। ......ब्रह्म अव्यक्त है और रस भी अव्यक्त है। अव्यक्त का अर्थ ही है जो मन, वाणी एवं बुद्धि किसी के भी द्वारा न तो प्रकट किया जा सके न उनमें आ सके सारांश यह कि जो इनका अविषय हो। अतः अपनी शक्ति के अनुसार कहे सुने जाने पर भी यह रस शेष रह जाता है क्योंकि अनादि है अनन्त है। इस अनादि अनन्त व्यापक अव्यक्त रस ब्रह्म का वर्णन कौन करे और कैसे करे ? इस रस क्षेत्र के भावों की ओर केवल इङ्गित मात्र किया जाता है। ये सङ्केत अवश्य किसी कुशल कलाकार की अपेक्षा रखते हैं क्योंकि इस सूक्ष्माति सूक्ष्म रसानुभव का प्रकाशन भी तो एक विलक्षण कला है, इन कलाकारों में से एक श्री जयदेव कविराज भी हैं। उनकी काव्य कला कुशलता और रसानुभव प्रकाश कला कुशलता कीओर रसिक पाठक गण अपनी रसमयी प्रज्ञा को प्रेरित करें।

२५२ • • हित चौरासी मानवती नायिका श्रीराधा को निकुञ भवन तक ले चलने के लिये दूतिका रस विलास की स्मृति दिलाकर उल्लास जागृत करती हुई प्रियतम श्रीलालजी से मिला देने का उद्योग कर रही है। वह कह रही है- उरसि मुरारेरुपहित हारे घन इव तरल वलाके। तडिदिव पीते रति विपरीते राजसि सुकृत विपाके॥ विगलित वसनं परिहृत रसनं घटयजघनमपिधानम्। किशलय शयने पङ्कज नयने निधिमिव हर्ष निधानम्॥ धीर समीरे यमुना तीरे वसति वने वनमाली। गोपी पीन पयोधर मर्दन चञ्चल कर युग शाली॥ “दूती ने कहा-नितम्बिनि ! अब गमन करने में विलम्ब की आवश्यकता नहीं रही। देखो न, गोपियों के पुष्ट पयोधरों का मर्दन करने में अत्यन्त चञ्चल एवं कुशल मदन मनोहर श्रीकृष्ण आज केवल तुम्हारे लिये यमुना पुलिन धीर समीर पर विराज रहे हैं। वे तुम्हारा नाम ले लेकर वंशी बजाते और तुम्हारे आने की आहट के भ्रम वश पत्तों की खरखराहट से भी चौंक चौंक उठते हैं। राधे ! वे सचकित नयनों से निरन्तर तुम्हारी प्रतीक्षा करते हैं। जब वे तुम्हारे लिये उतने व्याकुल है तब तुम भी चलकर उनसे मिलो न !” “देखो कैसी काली-काली रात है। इस अँधेरी रात में डर किस बात का ? तुम्हें कोई जान भी न सकेगा, खूब छिपेगी काली रात में तुम्हारी नीली साड़ी। अब शीघ्र अपना नील निचोल पहन लो और इन वाचाल नूपुरों को-चुगल खोरों को छोड़ दो वैरी की तरह। ये हैं भी इसी योग्य !” “प्यारी राधे ! तुम वहाँ चलकर श्याम सुन्दर के हृदय से ऐसी लग जाओ, जैसे घन के सङ्ग तरल दामिनि। जैसी तुम गौराङ्गी चपला हो वैसे वे भी सघन नील नीरद श्याम हैं। जब तुम उनके हृदय से चिपटोगी-रति विपरीत विलास करोगी तभी यह तुम्हारी घन दामिनि की उपमा सत्य जँचेगी। उस मिलन के अवसर में तुम विगलित वसना और भूषण रहित हो जाना और ललित कनक लता की भाँति उनके श्रीअङ्गों से लग जाना। हे कमलनयने ! जब वे तुम्हें किशलय शय्या पर निवेशित करेंगे तब उन रसनिधि के रस का आस्वादन केवल तुम्हारे ही भाग्य में होगा।”

हित चौरासी • • २५३ चलों, बहुत हो चुका मान। मान छोड़ो और मान लो मेरी बात। शीघ्र चलकर मधुरिपु की समस्त बाधाओं को दूर कर दो और प्राप्त कर लो अपना स्वत्व-उन पर एकाधिकार।" दूतिका की बात सुनकर श्रीराधा चल पड़ीं और अपने प्राण प्रियतम से जा मिलीं। पश्चात् वहाँ मिलन काल में क्या हुआ उसका वर्णन कौन करे ? उसका वर्णन करने में समस्त कवि कुल मण्डली थकित है क्योंकि मिलन सुख अवर्णनीय है। उक्त वर्णन में श्रीजयदेव कविराज ने भावी मिलन सुख की कल्पना के रूप में दूतिका के मुख से उस दिव्य रस का सङ्केत किया फिर भी वह बात न कही जा सकी जो दोनों के अन्तर में भर रही थी किंवा युगल किशोर की रसानुभूति थी। विरह का गान सबने किया है। इसी विरह गान से समस्त ब्रज़ भाषा साहित्य भरा पड़ा है। 'सूर' को सूर (सूर्य) की उपाधि से इसी विरहगान ने विभूषित किया, क्योंकि उन्होंने गोपियों के विरह गीत गाने में कलम तोड़ दी है। विरह में वेदना है, पीड़ा है, प्यार है उपालम्भ है, आशा है, अभिलाषा है और बहुत कुछ है किन्तु मिलन में क्या है ? दो सृष्टियों का एकीकरण दो प्राण, दो मन, विविध इन्द्रियों की एकता, तल्लीनता और दो सृष्टियों का लय प्रलय। यहाँ अनुभव अनुभावक एवं अनुभाव्य का एकीकरण है त्रिपुटी का विनाश है। यहाँ प्रेमी प्रेमास्पद और प्रेम रूप गङ्गा यमुना एवं सरस्वती का सङ्गम है। इस त्रिवेणी में तीन धाराओं का ही जब विश्लेषण कठिन है, तब अन्य किन्हीं बातों की वहाँ गुंजाइश ही कहाँ है ? इस प्रेम सङ्गम त्रिवेणी का वर्णन किया श्रीहित हरिवंश चन्द्र प्रकट प्रेमावतार ने। क्योंकि वही सफल हो सकते थे। प्रेम स्वयं अपनी लीला एवं अपना स्वरूप लखा दे यह सम्भव है। उस अवर्णनीय केवल अनुभव गम्य प्रेम विलास का वर्णन है- वल्लवी सु कनक वल्लरी .... ......राधिका सुनामिनी।

२५४ • • हित चौरासी शृङ्गार रस के दो भेद हैं- विप्रलम्भ (वियोग) शृङ्गार और सम्भोग (संयोग) शृङ्गार। श्रीहिताचार्य्य चरण की उपासना का मूल सिद्धान्त है मिलन या सम्भोग शृङ्गार। इस रस सम्भोग की पुष्टि के लिये अनेकों उद्दीपन स्वीकार किये गये हैं; यों तो यहाँ सभी परिकर दिव्य रस का ही विकसित रूप है। इस सिद्धान्त के अनुसार यहाँ जो मान, विरह आदि देखे जाते हैं वे भी विलास के लिये स्वीकार किये गये हैं, वस्तुतः वे हैं नहीं, उनका तो भ्रम भी नहीं है। युगल किशोर नित्य निरन्तर मिले सम्भोग लीलाओं में मग्न रहते हैं। इस मिलन में अन्तर के लिये कोई स्थान ही नहीं है- "तिन बिच अन्तर पलकौ नाँही।" यह नित्य मिलन किञ्चिन्मात्र भी विरह या अन्तर नहीं सह सकता वरं पूर्ण लालच के साथ वह एक दूसरे को आत्म सात कर देना चाहता है परस्पर में- "चाहत प्रान में प्रान समाई।" प्रेमी और प्रेमास्पद का आत्म सात हो जाना, द्वैत की सृष्टि का लय कर देना ही रस की, मिलन की या सम्भोग शृङ्गार की पराकाष्ठा है- रस की अवधि इहाँ लौं माई। विवि तन मन एकै हो जाई॥ -हित ध्रुवदासजी इस महामधुर मिलन की परिभाषा करनी कठिन है। उसकी ओर केवल सङ्केत किया जा सकता है । कितना विलक्षण है यह मिलन रस ? मधुर ते मधुर अनूप ते अनूप अति, रसनि कौ रस सब सुखनि कौ सार री। विलास कौ विलास निज प्रेम की है राज दसा, राजै एक छत दिन विमल विहार री।। छिन छिन त्रिषित चकित रूप माधुरी में, भूले से ही रहें कछु आवै न विचार री।

हित चौरासी • • २५५ भ्रमहूँ कौ विरह कहत जहाँ डर आवै, ऐसे हैं रँगीले 'ध्रुव' तनु सुकुमार री।। -श्रीहित ध्रुवदासजी यह विरह विक्षेप रहित नित्य मिलन ही श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु पाद की उपासना का मूल है और उसका उदाहरण है- वल्लवी सु कनक वल्लरी... ....राधिका सुनामिनी। अथवा- रँगमगे दंपति रसमसे, हित ध्रुव अद्भुत केलि। छवि तमाल सौं लपटि रही, मानहुँ छबि की बेलि।। यह सम्भोग श्रृङ्गारमय नित्य विहार ही रस की पराकाष्ठा है। इसी पराकाष्ठा की ओर इस 'वल्लवी ....नामिनी' पद से सङ्केत किया गया है।

  • ८१ - अवतरण - युगल किशोर नृत्य कर रहे हैं। नृत्य में श्रीप्रियाजी की प्रधानता है। सखियाँ दर्शन करके आनन्दित हो रही हैं। इस पद में श्रीप्रियाजी के नृत्य कालीन श्रृङ्गार का वर्णन है- केदारौ मूल- वृषभानु नंदिनी मधुर कल गावै। विकट औघर तान चर्चरी ताल सौं, नंदनंदन मनसि मोद उपजावै।। प्रथम मज्जन चारु चीर कज्जल तिलक, श्रवन कुंडल वदन चंदनि लजावै। सुभग नकबेसरी रतन हाटक जरी, अधर बंधूक दसन कुंद चमकावै।। वलय कंकन चारु उरसि राजत हारु, कटिव किंकिनी चरन नूपुर बजावै। हंस कल गामिनी मथति मद कामिनी, नखनि मदयंतिका रंग रुचि द्यावै।।

२५६ • • हित चौरासी निर्त्त सागर रभसि रहसि नागरि नवल, चंद चाली विविध भेदनि जनावै। कोक विद्या विदित भइ अभिनय निपुन, भ्रू विलासनि मकर केतनि नचावै।। निविड़ कानन भवन बाहु रंजित रवन, सरस आलाप सुख पुंज बरसावै। उभै संगम सिंधु सुरत पूषन बंधु, द्रवत मकरंद हरिवंश अलि पावै।।८१।। भावार्थ – (“सखि!) श्रीवृषभानु नन्दिनी मधुर और सुन्दर गान करती हैं और गान में अत्यन्त विलक्षण औघर तान से नन्द नन्दन के मन में भी आनन्द उत्पन्न कर देती हैं। उन्होंने प्रथम स्नान फिर सुन्दर वस्त्र, आँखों में कज्जल, ललाट पर तिलक और कानों में कुण्डल धारण किया है और इस भूषा से अनेकों चन्द्रमाओं को लज्जित कर रही हैं। नासिका पर सुन्दर नक बेसर शोभित है जो स्वर्ण एवं रत्नों से जटित है। जिसके बन्धूक पुष्प से अधर और कुन्द सी दन्तपंक्ति है। बाहुओं में वाजूबन्द कलाइयों में सुन्दर कङ्कण एवं हृदय पर हारवली शोभित है एवं कटि में करधनी और चरणों में नूपुर बज रहे हैं उनके। वह हंस कल गामिनि समस्त सखियों के गर्व को मथ रही है। चरण नखों में मेहंदी का रङ्ग कैसा चमक रहा है? वह नव नागरी आनन्दित हो होकर मानो नृत्य रस के सागर में कल्लोल कर रही है। नृत्य के समय चिन्द नामक अपनी विशेष गति से अनेक प्रकार के भाव भेदों को प्रकट कर रही हैं। श्रीराधा समस्त कोक विद्याओं की पूर्ण ज्ञाता हैं, भाव और अभिनयों में भी चतुर हैं अपने केवल भृकुटियों के सङ्केतों से ही कामदेव के समूहों को नचा रही हैं।" सखि ! अब वे सघन निकुञ्ज भवन में रमण श्रीलालजी के कंधों पर अपनी भुज लताएँ लपेटे हुए सरस आलाप (गान) के साथ मानो सुख समूहों की वृष्टि कर रही हैं। फिर कभी दोनों मिलन-रूप समुद्र में सुरत रस का कमल खिलता है जिससे (प्रेम का) मकरन्द रस बह निकलता है जिसे 'हरिवंश' अलि (सखी या भ्रमर) पान करती है।

  • ८२ - अवतरण - पद में श्रीप्रियाजी के रूप, गुण, शील, सौन्दर्य, माधुर्य्य, उदारता, सुकुमारता, कला, विद्या, हाव भाव चातुरी रसिकता आदि अनेक लक्षणों का वर्णन है। श्रीप्रियाजी के इन्हीं लक्षणों पर श्रीलालजी आसक्त हैं और इतने आसक्त कि किसी प्रकार उनसे छूट नहीं सकते। श्रीहित सखीजी इन्हीं बातों का वर्णन करती हैं- केदारौ मूल-नागरता की रासि किसोरी। नव नागर कुल मौलि साँवरौ, वर बस कियौ चितै मुख मोरी।। रूप रुचिर अँग अंग माधुरी, बिनु भूषन भूषित ब्रज गोरी। छिन छिन कुसल सुधंग अंग में, कोक रभस रस सिंधु झकोरी।। चंचल रसिक मधुप मौहन मन, राखे कनक कमल कुच कोरी। प्रीतम नैन जुगल खंजन खग, बाँधे विविध निबंधनि डोरी।। अवनी उदर नाभि सरसी में, मनौं कछुक मदिक मधु घोरी। (जै श्री) हित हरिवंश पिवत सुंदर वर, सीव सुदृढ़ निगमनि की तोरी।।८२।। भावार्थ-किशोरी राधिका सुन्दरता की राशि हैं। इन्होंने नव नागर समूह के भी सिरमौर श्याम सुन्दर को अपनी चितवन और ललितभाव से मुख मोड़ने की क्रिया से ही विवश कर दिया है। इनका रूप अत्यन्त रुचिर है और अङ्ग-अङ्ग में माधुर्य्य है। ये व्रज गोरी विना भूषणों के ही भूषित है अर्थात् अत्यन्त रमणीय है। यह सुधङ्ग नृत्य के प्रत्येक अङ्ग में कुशल तो है ही अपितु एकान्तिक कोक विलास के रस समुद्र में भी प्रतिक्षण सराबोर सी हैं। इन्होंने परम चञ्चल रसिक मन मोहन भ्रमर के मन को अपने कनक जैसे कुच कमलों की कोर से ही अटका लिया है और प्रियतम के युगल नयन खञ्जन पक्षियों को भी (अपने रूप माधुर्य्य आदि) अनेक बन्धन डोरियों से बाँध रखा है। श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु पाद (सखी रूप से) कहते है इन परम सौन्दर्य्य मयी श्रीराधा ने अपने उदर रूप भूमि में स्थित नाभि कुण्डिका में कुछ एक मधुर एवं मादक रस घोल रखा है, जिसे सुन्दर शिरोमणि श्रीलालजी वेदों की भी सुदृढ़ मर्यादा-सीमाओं को तोड़कर उल्लङ्घन करके पी रहे हैं।

२५८ • • हित चौरासी टिप्पणी- "......पिवत सुंदरवर सींव सुदृढ़ निगमनि की तोरी राजा परीक्षित के प्रश्न-धर्म स्थापना के लिये अवतरित होकर भी भगवान् श्रीकृष्ण ने रास-क्रीड़ा जैसा जुगुप्सित कर्म क्यों किया ?-पर शुकदेव जी ने एक ही उत्तर दिया था- धर्म व्यत्तिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम्। श्रीमद्भागवत-१०/३३/३० अर्थात् "धर्म के उल्लङ्घन कर देने की सामर्थ्य ईश्वर में है।" क्योंकि सारी मर्यादाएँ उन्हीं की स्थापित की हुई हैं न ! इस सिद्धान्त के अनुसार नित्य विहारी श्रीराधावल्लभ लालजी की भी क्रीड़ा समस्त वेद उपनिषद्, शास्त्र एवं पुराणों की मर्यादाओं से अतीत है, एक दम परे है। जैसा कि सन्त महानुभाव गण कहते हैं- (१) अलक्ष्यं राधारव्यं निखिल निगमैरप्यतितरां, रसाम्भोधेः सारं किमपि सुकुमारं विजयते। -श्रीहित हरिवंशचन्द रसिकाचार्य अर्थात् "समस्त वेदों के शिरोभूषण उपनिषदों से भी अलक्षित राधा नामक जो एक तत्व है, उस परम रस सागर सार रूप अनिवर्चनीय किन्हीं सुकुमारी की जय हो। (२) आगम निगम अगोचर राधे चरन सरोज व्यास अवतंस। श्रीहरिराम जी 'व्यास' (३) पाई रस भक्ति गूढ़ जुग जुग जग दुर्लभ भव इन्द्रादि विधिम्। आगम अरु निगम पुरान अगोचर सहज माधुरी रूप निधिम्।। एवं- निगम लोक मरजाद भंजि क्रीडन्त रंग रस। -श्रीदामोदर 'सेवक जी' (४) अमग निगम की कौन चलावै। महाविष्णु के मन नहिं आवै।। -श्रीहित ध्रुवदासजी

हित चौरासी • • २५६ (५) सम्प्रदाय नवधा भगति वेद सुरसरी नीर। ललिता सखी उपासना ज्यौं सिंहिनि कौ छीर॥ -श्रीभगवत रसिकजी इत्यादि महापुरुषों के वाक्य प्रमाण हैं। इसी तत्व की ओर नेति नेति शब्दों से श्रुतियों ने लक्ष्य कराया है। यह नित्य विहार सर्व उपनिषदोपरि तो है ही साथ-साथ सृष्टि चक्र से भी सर्वथा अतीत है। नित्य विहारी श्रीकृष्ण के लिये विश्व के उद्भव पालन एवं संहार से कोई सम्बन्ध की आवश्यकता नहीं है। इसके लिये तो प्रत्येक ब्रह्माण्ड में भिन्न भिन्न ब्रह्मा विष्णु और शिव कार्य किया करते हैं। इस प्रकार यह नित्य विहार वेदोपरि, और विश्व से भी परे है। वेदों की सारी मर्यादाएँ विश्व के सञ्चालन के लिये हैं मनुष्यों की उच्छृङ्खल वृत्तियों के नियमन के लिये हैं, गुणातीत, सर्वेश्वर, भूमा और अव्यक्त तत्व श्रीनित्य विहारी लाल पर नियमन, शासन करने के लिये नहीं। यह नित्य क्रीड़ा नित्य विहारी लाल की सर्व तन्त्र स्वतंत्र आत्म क्रीड़ा है-प्रेम विलास है। वे अपनी आत्मा श्रीराधा और श्रीराधा की अनेक मूर्ति रूपा सखि जनों के साथ रमण करते हैं, इसी से राधा रमण कहे जाते हैं। यह विहार प्राकृत मन बुद्धि और इन्द्रियों का विषय नहीं है इनसे अलक्षित है अतः जब इनका अविषय है तब उस पर टीका टिप्पणी और उचित अनुचित की मोहर लगाने का किसी को हक ही कैसा ? यदि इस विहार को तात्विक दृष्टि से देखें तो ज्ञात होगा कि यह नित्य विहारी लाल की आह्लादिनि सन्धिनि, लीला और क्रिया शक्ति का दिव्य विलास है। यह विलास अत्यन्त गोपनीय है अतः वेदों का भी अविषय है, यह स्तर वेदों से ऊँचा है जो भगवद्रूप रसिक महात्मा गणों के हृदय में ही प्रकट हुआ।* जो स्तर वेदों से ऊपर है उसमें वेदों की मर्यादाओं का उल्लङ्घन सहज है। *जिस प्रकार वेदों का साक्षात्कार मन्त्र-द्रष्टा मुनि और ऋषियों ने किया था, उसी प्रकार इन रसिकों ने- नित्य बिहार उद्धार कियौ, मथि निज हृदय सिंधु वर वारिज॥

२६० • • हित चौरासी वास्तव में वेदों की मर्यादाओं का जाल तो माया मुग्ध जीवों को नियन्त्रण में लाने के लिये है। ब्रह्माजी ने वेद की कर्म डोरीसे सबको नाथ दिया है जिससे ये उच्छृङ्खल न हो जायें और क्रमशः सत्कर्म परायणता से उठकर भगवत्प्राप्ति रूप परम फल को प्राप्त करें। तब इन मर्यादाओं से परम पुरुष प्रभु को बँधा देखना कितना गलत दृष्टि कोण है। जब उनके उपासक महात्मा गण इन कर्म शृङ्खलाओं से नहीं बँध सकते तो फिर परात्पर पुरुष, वेदातीत, त्रिगुणातीत परिपूर्णतम भगवान् नित्य विहारी श्रीराधावल्लभ लाल ही उसके बन्धन में कैस आ सकते हैं ? उनके समक्ष इन तुच्छ मर्यादाओं का अस्तित्व ही क्या है ? श्रीशुकदेव जी कहते हैं- यत्पादपङ्कज पराग निषेव तृप्ता योग प्रभाव विधुताखिल कर्मबन्धाः। स्वैरं चरन्ति मुनयोजऽपि न नह्यमानां- स्तरयेच्छयात्तवपुषः कुत एव बन्धः॥ श्रीमद्भा. १०/३३/३५ अर्थात् "जिनके चरण कमलों कीधूलि के सेवन से तृप्त भक्त जन और योग साधन के प्रभाव से सम्पूर्ण कर्म बन्धनों से मुक्तयोगी जन भी सब प्रकार के विधि निषेध रूप बन्धनों से छूटे हुए स्वच्छन्द विचरते हैं फिर स्वेच्छा शरीरधारी श्रीहरि को ही किस प्रकार कर्म का बन्धन हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता।" अस्तु; इस नित्य विहार में वेद एवं शास्त्रों की मर्यादाएँ तो पग पग पर टूटती हैं या यों कह दें कि अधिकारी गणों के लिये कर्म बन्धन रूप डोरियों को तोड़ दिखाने के ही लिये है तो यह कथन अत्युक्ति रूप न होगा। यह मर्यादातीत विहार केवल श्रीवृन्दावन में ही है और वृन्दावन के रसिक जनों ने बहुत बहुत प्रकार से इसका गान किया है। इस मर्यादातीत गान से आज भी श्रीवृन्दावन का रस साहित्य गौरवान्वित है जिसकी एक झाँकी है यह- अवनी उदर नाभि सरसी में मनौं कछुक मादिक मधु घोरी। (जै श्री) हित हरिवंश पिवत सुंदर वर, सींव सुदृढ़ निगमन की तोरी।।

हित चौरासी • • २६१

  • ८३ - अवतरण - हित मयी सखियों ने लता भवन में शय्या रच दी है। रात्रि का समय है। युगल किशोर के शयन की बेला है किन्तु अकारण या रस वृद्धि के लिये प्रियाजी मान कर बैठी हैं। श्रीहित सजनी उन्हें मना रही हैं- केदारौ मूल- छाँड़िदै मानिनी मान मन धरिबौ। प्रनत सुंदर सुघर प्रानवल्लभ नवल, वचन आधीन सौं इतौ कत करिबौ।। जपत हरि विवस तव नाम प्रतिपद विमल, मनसि तव ध्यान ते निमिष नहिं टरिबौ। घटति पलु पलु सुभग सरद की जामिनी, भामिनी सरस अनुराग दिसि ढरिबौ।। हौं जु कहति निजु बात सुनु मानि सखि, सुमुखि बिनु काज घन विरह दुख भरिबौ। मिलत 'हरिवंश हित' कुंज किसलय सयन, करत कल केलि सुख सिंधु में तरिबौ।।८३।। भावार्थ - (श्रीहित सजनी ने कहा-) "मानिनि ! अब मन में इस तरह का मान रखना छोड़ दो ! देखो, परम सुन्दर नवल किशोर तुम्हारे प्राण वल्लभ ही तुम्हारे प्रति दीन हो गये हैं तुम्हारे वचनों के अधीन हैं, (अर्थात् तुम्हारे कहे में हैं ।) फिर उनसे ही ऐसा (मानादि व्यववहार) करना (क्या उचित है) ? हे प्यारी ! श्रीहरि तो तुम्हारे प्रेम में विवश हुए क्षण क्षण में तुम्हारे पवित्र नाम का जप करते हैं और तुम्हारे ध्यान से पल मात्र के लिये भी अलग नहीं होते। हे भामिनि ! यह सुन्दर शारदीय रात्रि क्रमशः पल पल करके घट ही तो रही है अतः आपका सरस अनुराग की ही ओर ढलना उचित है; (मान की ओर नहीं ।") श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद (सखी रूप से) कहते हैं-"हे सखि ! मैं जो कुछ कह रही हूँ यह तुम्हारे लिये अपनी (खास) बात है अतः उसे सुनो और मान भी लो। सुमुखि ! बिना किसी कारण के व्यर्थ ही इतना घनीभूत विरह दुख

२६२ • • हित चौरासी भोगना क्या उचित है ?" चल कर कुञ्ज भवन में रचित किशलय शय्या पर मधुर मधुर सुन्दर सुन्दर प्रेम क्रीड़ा कीजिये और सुख समुद्र का अवगाहन कीजिये !" टिप्पणी—सम्भोग शृङ्गार में मान एक विशेष दुःख दायक स्थिति है चाहे फिर वह नायक के लिये हो या नायिका के लिये। स्वामी श्रीहरिदासजी ने अपने केलिमाल में एक पद लिखा है, जिसमें श्रीलालजी के द्वारा प्रार्थना करायी गयी है कि हे प्रियाजी ! आप मान न किया करें मुझे ऐसा वरदान दीजिये। इसीसे अनुमान किया जा सकता है कि कितनी वेदना पूर्ण स्थिति है इस मान की। इसमें उद्विग्नता और विकलता का तो ओर छोर नहीं मिलता। बात बात पर भय और आशङ्काएँ खड़ी दिखती हैं, श्रम जो मानिनि के मनाने में होता है उसका तो वारापार नहीं। फिर भी यह 'मान' सम्भोग शृङ्गार का एक विशेष अङ्ग है। यद्यपि इस नित्य विहार में विरह मान आदि का भ्रम भी नहीं है फिर भी मान है। इसका यह अर्थ कि यहाँ 'मान' मान के अर्थ में नहीं वरं रस की वृद्धि के लिये केलि के विकाश के लिये है क्योंकि इससे रस की विशेष पुष्टि होती है, ऐसा रसिकाचार्य्यों का मत है। नित्य विहार की क्रीड़ा में इस मान की स्थिति श्रीप्रियाजी के हृदय में नहीं है यह वहाँ वाह्य रूप से है। वे सदा अपने प्रियतम के अनुकूल एवं दक्षिण होकर भी मानवती बन जाती हैं इसका बड़ा ही गम्भीर आशय है। वह यह कि वे जानती हैं कि मेरी सर्व काल अनुकूल प्रीति से श्रीलालजी को मेरे प्रति, प्रतिक्षण द्रवित होना पड़ता है तब वे अपने प्रेम प्रवाह को रोकने में स्वयं असमर्थ हो जाते हैं अतः नाट्य रूप से ही सही मान धारण करके उनके बढ़ते हुए प्रवाह को रोक देती हैं; जिससे उन्हें अपने स्ववश रहने का अधिक अवसर मिले यह है कृपालु श्रीराधा के मान का गम्भीरार्थ। स्वामी श्रीहरिदासजी एवं रसिकाचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु के नित्य मिलन सिद्धान्त में मान का एक अर्थ उक्त प्रकार से है और अन्यान्य शैलियों से मान के अनेकों भाव हैं। जो यहाँ प्रकाश में ले आना असम्भव और अनुचित होगा।

हित चौरासी • • २६३ 'हित चौरासी' के सम्पूर्ण पदों का अध्ययन करने पर एक बात पाठकों को यह भी मिलेगी कि सर्वत्र श्रीप्रियाजी ही मानवती हैं। इसके अनेक कारणों में से एक तो ऊपर ही कहा जा चुका। दूसरा यह कि यहाँ प्रेम की शैली अन्य शैलियों से विलक्षण है। यहाँ श्रीराधा प्रेमास्पद और श्रीकृष्ण प्रेमी हैं किन्तु अन्य उपासना मार्गों में श्रीकृष्ण चन्द्र प्रेमास्पद और श्रीराधा प्रेमी हैं। इसीलिये अन्य उपासना मार्गों में श्रीकृष्ण के लिये भी मान का अवसर है जैसा कि 'गीत गोविन्द' एवं जगन्नाथ वल्लभ नाटक में श्रीजयदेव कविराज एवं राय रामानन्द जी ने वर्णन किया है। इसी प्रकार व्रज लीला गायक महाकवि महात्मा सूरदास जी ने श्रीराधा से रूठ कर श्याम सुन्दर के चले जाने और श्रीराधा के दुखी होने विलाप करने का वर्णन कितने ही पदों में किया है। इसके सिवाय व्रज भाषा एवं संस्कृत साहित्य में नायक नायिका भेद का वर्णन करने वाले कवि, महात्मा और सन्तों में से अधिकांश ने नायक मान का वर्णन किया है, जो साहित्य श्रृङ्गार की मर्यादा के शायद अनुकूल है या नहीं, मैं नहीं जानता किन्तु इससे बचकर चलने वाले दो ही आचार्यों के दर्शन मुझे हुए- (१) रसिकाचार्य्य वर्य गोस्वामी श्रीहित हरिवंश चन्द्र (२) रसिकानन्य नृपति स्वामी श्रीहरिदासजी। ये क्यों बचकर चले ? इसलिये कि इनकी उपासना का लक्ष्य नित्य मिलन शृङ्गार है और इस नित्य मिलन में प्रधानता नायिका की है, नायक की नहीं। दूसरे इनकी आराध्या नायिका श्रीराधा स्वाधीन भर्तृका है तथा नायक अपनी प्रियतमा श्रीराधा के अनुकूल एवं पति हैं; जार (उपपति) एवं बहुनायक नहीं। यद्यपि यहाँ नायिका श्रीराधा प्रेमास्पद हैं फिर भी उनका प्रेम अपने प्रेमी नायक श्रीलालजी के प्रति अगाध एवं अपार है। या यों कह दें दोनों दोनों के प्रेमास्पद हैं। श्रीराधा प्रेमास्पदा का प्रेम अपने प्रेमी के प्रति अगाध और अपार है, जो प्रवाहित होने पर किसी प्रकार रोका नहीं जा सकता, अतएव उसका प्रवाहित न होना आवश्यक है इसलिये भी यहाँ नायक मान की आवश्यकता नहीं रह जाती। इसके विपरीत नायक की दशा है कि वह दीन और अधीन है अपनी प्रिया नायिका के। उसका प्रेम बढ़ता रहता है अतः उसे रोकर कर

२६४ • • हित चौरासी सामान्य स्थिति में रखने की आवश्यकता है इसीलिये वह नायिका मान द्वारा रोका जाता है। इसके अतिरिक्त एक विशेष बात यह है, जिसे सभी रस शास्त्रों ने स्वीकार किया है कि रस की सम्पुष्टि नायिका के ही प्राधान्य में होती है, नायक के प्राधान्य में नहीं। श्रीहिताचार्य्य चरण रस के सुज्ञ आचार्य्य हैं उन्होंने अपनी उपासना में श्रीप्रियाजी का ही स्थान प्रधान रखा है इसके अनेक कारणों में एक यह भी है कि वे उक्त सिद्धान्त की महत्ता को ध्यान में रखते हैं। उन्हें ज्ञात है कि नायक की प्रधानता तो दूर रही समकक्षता स्वीकार करने में भी रसाभास हो जाता है। इसी रसाभास से बचकर उन्होंने अपने समस्त ग्रन्थों का प्रणयन किया है। रसों की परिभाषा के क्षेत्र में कटु, अम्ल, और तिक्त भी रस कहे गये हैं और साहित्य क्षेत्र में वीर, भयानक एवं वीभत्स तक। किन्तु इन रसों के आस्वादन कर्त्ता रसिक न कहे जायेंगे अपितु छः रसों में से मधुर और नव रसों में से शृङ्गाररस के आस्वादन कर्त्ता ही रसिक पद से विभूषित होंगे। इसीलिये श्रीसेवक दामोदरजी ने कहा- रसिक बिनु कहें सबही जु मानत बुरौ, कहौ रसिकई कैसे जु जानी ? रसिक न कहे जाने से आराधक वर्ग में से प्रायः सभी को बुरा तो अवश्य लगता है पर 'आपने रसिकता कैसे जानी कहाँ से जानी ? इस प्रश्न का उनके पास कोई उत्तर नहीं है। इस पर यदि वे रसिकता की वाञ्छा करते हैं तो उन्हें सीधा मार्ग दिखाते हैं- जौरु तुम रसिक रस रीति के चाड़िले, तौरु मन देहु हरिवंश बानी। ठीक तो है, यदि तुम्हें रसिक कहलाना है और तुम्हारे चित्त में रस रीति की वाञ्छा है तो तुम श्रीहरिवंशचन्द्र की रसमयी सुधा वाणी में मन दो। क्योंकि यही रसिकाचार्य्य है और इनकी वाणी, रस।