हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
DevanagariHindipublished275 पृष्ठ
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हित चौरासी • • २५५ भ्रमहूँ कौ विरह कहत जहाँ डर आवै, ऐसे हैं रँगीले 'ध्रुव' तनु सुकुमार री।। -श्रीहित ध्रुवदासजी यह विरह विक्षेप रहित नित्य मिलन ही श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु पाद की उपासना का मूल है और उसका उदाहरण है- वल्लवी सु कनक वल्लरी... ....राधिका सुनामिनी। अथवा- रँगमगे दंपति रसमसे, हित ध्रुव अद्भुत केलि। छवि तमाल सौं लपटि रही, मानहुँ छबि की बेलि।। यह सम्भोग श्रृङ्गारमय नित्य विहार ही रस की पराकाष्ठा है। इसी पराकाष्ठा की ओर इस 'वल्लवी ....नामिनी' पद से सङ्केत किया गया है।
- ८१ - अवतरण - युगल किशोर नृत्य कर रहे हैं। नृत्य में श्रीप्रियाजी की प्रधानता है। सखियाँ दर्शन करके आनन्दित हो रही हैं। इस पद में श्रीप्रियाजी के नृत्य कालीन श्रृङ्गार का वर्णन है- केदारौ मूल- वृषभानु नंदिनी मधुर कल गावै। विकट औघर तान चर्चरी ताल सौं, नंदनंदन मनसि मोद उपजावै।। प्रथम मज्जन चारु चीर कज्जल तिलक, श्रवन कुंडल वदन चंदनि लजावै। सुभग नकबेसरी रतन हाटक जरी, अधर बंधूक दसन कुंद चमकावै।। वलय कंकन चारु उरसि राजत हारु, कटिव किंकिनी चरन नूपुर बजावै। हंस कल गामिनी मथति मद कामिनी, नखनि मदयंतिका रंग रुचि द्यावै।।