हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५६ • • हित चौरासी निर्त्त सागर रभसि रहसि नागरि नवल, चंद चाली विविध भेदनि जनावै। कोक विद्या विदित भइ अभिनय निपुन, भ्रू विलासनि मकर केतनि नचावै।। निविड़ कानन भवन बाहु रंजित रवन, सरस आलाप सुख पुंज बरसावै। उभै संगम सिंधु सुरत पूषन बंधु, द्रवत मकरंद हरिवंश अलि पावै।।८१।। भावार्थ – (“सखि!) श्रीवृषभानु नन्दिनी मधुर और सुन्दर गान करती हैं और गान में अत्यन्त विलक्षण औघर तान से नन्द नन्दन के मन में भी आनन्द उत्पन्न कर देती हैं। उन्होंने प्रथम स्नान फिर सुन्दर वस्त्र, आँखों में कज्जल, ललाट पर तिलक और कानों में कुण्डल धारण किया है और इस भूषा से अनेकों चन्द्रमाओं को लज्जित कर रही हैं। नासिका पर सुन्दर नक बेसर शोभित है जो स्वर्ण एवं रत्नों से जटित है। जिसके बन्धूक पुष्प से अधर और कुन्द सी दन्तपंक्ति है। बाहुओं में वाजूबन्द कलाइयों में सुन्दर कङ्कण एवं हृदय पर हारवली शोभित है एवं कटि में करधनी और चरणों में नूपुर बज रहे हैं उनके। वह हंस कल गामिनि समस्त सखियों के गर्व को मथ रही है। चरण नखों में मेहंदी का रङ्ग कैसा चमक रहा है? वह नव नागरी आनन्दित हो होकर मानो नृत्य रस के सागर में कल्लोल कर रही है। नृत्य के समय चिन्द नामक अपनी विशेष गति से अनेक प्रकार के भाव भेदों को प्रकट कर रही हैं। श्रीराधा समस्त कोक विद्याओं की पूर्ण ज्ञाता हैं, भाव और अभिनयों में भी चतुर हैं अपने केवल भृकुटियों के सङ्केतों से ही कामदेव के समूहों को नचा रही हैं।" सखि ! अब वे सघन निकुञ्ज भवन में रमण श्रीलालजी के कंधों पर अपनी भुज लताएँ लपेटे हुए सरस आलाप (गान) के साथ मानो सुख समूहों की वृष्टि कर रही हैं। फिर कभी दोनों मिलन-रूप समुद्र में सुरत रस का कमल खिलता है जिससे (प्रेम का) मकरन्द रस बह निकलता है जिसे 'हरिवंश' अलि (सखी या भ्रमर) पान करती है।