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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 253

हित चौरासी • • २४७ इसीलिये कहा गया है- जैसी प्रीति लाल की गाई। ताते अधिक प्रिया की माई॥ और यहाँ उस अपार प्रेम सागर की स्वयं सावधानी का वर्णन किया श्रीहिताचार्य चरण ने- जद्यपि अति अनुराग रसासव, पान-विवस नाहिंन गति भूली।

  • ७८ - अवतरण - वसन्त का सुहावना समय है। वासन्ती छटा से मुग्ध प्रिया आज स्वयं नृत्य के लिये तत्पर हैं। मानो नृत्य के बहाने हठात् प्रियतम का मन चुराना चाह रही हैं। जब वे तान बन्धान के साथ "हो हो होरी" कहती हैं तो प्रियतम रस में छक जाते और उनके प्राण प्रेम विह्वल होकर प्रियाजी पर बलिहार हो जाते हैं। सखियाँ इस रस का आस्वादन करतीं हैं। श्रीहित सजनी इसका वर्णन कर रही हैं- कान्हरौ मूल- सुधंग नाचत नवल किसोरी। थेई थेई कहति चहति प्रीतम दिसि, वदन चंद मनौँ त्रिषित चकोरी॥ तान बंधान मान में नागरि देखत स्याम कहत हो हो होरी। (जै श्री) हित हरिवंश माधुरी अँग अँग, बरवस लियौ मोहन चित चोरी॥७८॥ भावार्थ-नवल किशोरी राधिका आज सुधङ्ग नृत्य नाच रही है और थेइ थेई कहते हुए अपने प्रियतम के मुख चन्द्र की ओर ऐसे देखती है जैसे (रूप की) प्यासी चकोरी।