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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 254

२४८ • • हित चौरासी नृत्य गान की तान और उसके यथा-स्थल बन्धान (ठेका) सहित नृत्य करने वाली मानमयी चतुरा नागरी श्रीप्रियाजी को देखकर प्रियतम श्याम सुन्दर 'हो हो होरी' कहते (हुए हर्ष से भर कर उनकी प्रशंसा करते) हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं कि इस प्रकार इस नवल किशोरी ने अपने अङ्ग प्रत्यङ्गों की (हाव भाव पूर्ण) मधुरिमा से प्रियतम श्रीलालजी का मन बरवश (हठात्) चुरा लिया है। – ७९ – अवतरण – आज युगल किशोर मिले हुए नृत्य कर रहे हैं किन्तु इस नृत्य में प्रधानता है प्रियाजी की। सखियाँ दर्शन करतीं और कुछ वाद्य बजाती हैं। श्रीहित सखी इसका वर्णन कर रही हैं अपनी समीपवर्त्ती सखियों से- कान्हरौ मूल-रहसि रहसि मोहन पिय के संग री, लड़ैती अति रस लटकति। सरस सुधंग अंग में नागरि, थेई थेई कहति अवनि पद पटकति।। कोक कला कुल जानि सिरोमनि, अभिनय कुटिल भृकुटियनि मटकति। विवस भये प्रीतम अलि लंपट, निरखि करज नासा पुट चटकति ।। गुन गनु रसिक राइ चूड़ामनि रिझवति पदिक हार पट झटकति। (जै श्री) हित हरिवंश निकट दासीजन, लोचन चषक रसासव गटकति।।७९।। भावार्थ- "अरी सखि ! लाड़िली राधा आज अपने प्रियतम मोहन लाल के साथ अनन्दित हो होकर रस पूर्वक लटक रही है अर्थात् लटकती हुई नृत्य कर रही है और अपने अङ्गों में सुधङ्ग नृत्य की गतियाँ भरकर 'थेई थेई' कहती