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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 255

हित चौरासी • • २४६ हुई भूमि पर चरणों को पटकती है। हे सखि ! ये राधा समस्त कोक कलाओं की शिरोमणि रूपा हैं अतः हाव भाव पूर्वक अपनी कुटिल भृकुटियों को मटकाती हैं या नचा रही हैं जिससे रस लम्पट भ्रमर श्रीलालजी रस विवश हो रहे हैं। उनकी विवशता को देखकर श्रीराधा अपनी उँगलियों से नासा पुट चटका रही है अर्थात् श्रीलालजी को सचेत करने के लिये उनकी नासिका के निकट अपनी उँगलियों से चुटकी चटका बजा रही है।" श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं "इस प्रकार अनेक गुण गणों से पूर्ण एवं रसिक राज चूड़ामणि श्रीलालजी को रिझा रही है एवं उनकी मालाएँ, पदक और वस्त्रों को झटक रही है, (मानो रस का उद्दीपन कर रही है।) समीप में स्थित सखी गण इस नृत्य को देखकर अपने नेत्र रूप प्यालों से इस रस आसव का पान कर रही हैं, (या इसे तृष्णा पूर्वक शीघ्र शीघ्र गटक रही हैं।) – ८० – अवतरण – शैय्या विहार के अवसर की एक अत्यन्त ही गोपनीय भावना का चित्रण इस पद में किया गया है। जो सुज्ञ रसिकों की हृदय गम्य भावना का प्राण है। उसका अधिक स्पष्टीकरण द्रौपदी का चीर हरण होगा। इस रस भावना का कथन, श्रवण और मनन सब कुछ मौन में है क्योंकि इसकी चर्चा वैखरी वाणी में नहीं वल्कि परा पश्यन्ति में होती है; जैसा कि श्रीकृष्ण गढ़ाधीश सन्त नागरीदास जी ने कहा है– चरचा करी कैसे जाय? बात जानत कछुक हम पै कहत जिय थरराय।। मौन ही में कहनि ताकी सुनत श्रोता नैन। सोऽब नागर लोग बूझत कहि न आवत बैन।। अतः विवशता है इसके स्पष्ट करने में। रसिक जन अनुभव करें कि श्री हिताचार्य चरण क्या कह रहे हैं, वे कौनसी रसामृत धारा बहा रहे हैं–