हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० • • हित चौरासी कान्हरौ मूल–वल्लवी सु कनक वल्लरी तमाल स्याम संग, लागि रही अंग अंग मनोभिरामिनी। वदन जोति मनौं मयंक अलक तिलक छबि कलंक, छपति स्याम अंक मनौं जलद दामिनी॥ विगत वास हेम खंभ मनौं भुवंग वैनी दंड, पिय के कंठ प्रेम पुंज कुंज कामिनी। (जै श्री) सोभित हरिवंश नाथ साथ सुरत आलस वंत, उरज कनक कलस राधिका सुनामिनी॥८०॥ भावार्थ – (श्रीहित सखी ने कहा–"सखियो ! आज) स्वर्ण लता रूप परम सुन्दरी वल्लवी श्याम तमाल के साथ अङ्ग अङ्ग से लिपट चिपट रही है। उसकी वदन ज्योति क्या है; चन्द्र और उस वदन पर शोभित अलकें एवं तिलक ही हैं उस चन्द्र के कलङ्क। वह कनक लता, श्याम के अङ्क में ऐसी चिपट रही है, जैसे घन में दामिनि। वह विगत वसना स्वर्ण स्तम्भ सी जान पड़ती है, उसका वेणी दण्ड क्या है मानो भुजङ्ग–काला नाग। वह प्रेम पुञ्ज कुञ्ज कामिनि अपने प्रियतम के कण्ठ से लगी है। वह´सुरतालस मयी शोभा पा रही है श्रीहरिवंश नाथ के साथ। कनक कलशोपम उरोजों से शोभामयी सुन्दरी वह सुन्दर नाम वाली राधा ही है।" टिप्पणी– श्रीराधा रस की अधिष्ठात्री देवी है। वे रस की अनन्त और ओर छोर रहित विशाल धारा हैं–स्वयं रस रूपा हैं। इन्हीं से रस की प्राप्ति करके श्रीकृष्ण रसिक शिरोमणि कहलाते हैं। श्रीराधे के विना श्याम सदा ही आधे हैं। पूर्ण तो वे इसी रस मूर्त्ति को पाकर हो सके हैं अस्तु; तज्ज्ञात्वा तदेव भवति 'अर्थात् उस ब्रह्म को जानकर वही हो जाता है,' इस न्याय से जो इन श्रीराधा एवं श्रीकृष्ण–रस ब्रह्म की उपासना करके उनका ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं वे भी रस रूप ही हो जाते हैं। इस तरह इन रस ब्रह्म को प्राप्त समस्त परिकर अर्थात् वृन्दावन सहचरि एवं खग मृगादि दिव्य रस मय ही हैं या यों कह दें–सर्वं रसमयं ब्रह्म अर्थात् यह सब चराचर रसमय ब्रह्म ही है।