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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 257

हित चौरासी • • २५१ इस रस ब्रह्म की उपासना श्रीवृन्दावन के रसिक भक्तों ने बड़ी तल्लीनता से की है। आज भी उनकी प्रेम तल्लीनता की झाँकी उनके रसमय हृदय से निनादित प्रेम वीणा की झनकारों-गीतों से प्राप्त होती है। उन वाणियों में, शब्दों में, पदों में वह अनिर्वचनीय रस भरा है, जिसका आस्वादन किया जा सकता है अपनी पात्रता के अनुसार, किन्तु वर्णन नहीं। इसका आस्वादन होता है दिव्य हितमय आत्मा में और वर्णन होता है परा पश्यन्ति में। श्रीवन के रसिक जन-पूर्वाचार्यों ने अपनी अनन्त शक्ति के योग से उस 'परा पश्यन्ति' के विषय को भी एक बार वैखरी का विषय बना दिया। अलभ्य और असुलभ वस्तु को सुलभ कर दिया उन्होंने कृपा परवश होकर। वे समर्थ थे, स्वयं रस रूप थे; उनके लिये यह बात क्या असम्भव थी ? उसी परा पश्यन्ति के स्वानन्दानुभव की एक झाँकी है। यह- वल्लवी सु कनक वल्लरी.... .....राधिका सुनामिनी।। एक तो इसके स्पष्टीकरण की शक्ति नहीं और दूसरे इसे स्पष्ट करते हृदय काँपता है वाणी रुक रुक जाती है, आंखें झूम झूम जाती हैं, भावों में ज्वार आ जाता है और हठात लेखनी जड़ता धारण करने लगती है, .... विवशता है। ......ब्रह्म अव्यक्त है और रस भी अव्यक्त है। अव्यक्त का अर्थ ही है जो मन, वाणी एवं बुद्धि किसी के भी द्वारा न तो प्रकट किया जा सके न उनमें आ सके सारांश यह कि जो इनका अविषय हो। अतः अपनी शक्ति के अनुसार कहे सुने जाने पर भी यह रस शेष रह जाता है क्योंकि अनादि है अनन्त है। इस अनादि अनन्त व्यापक अव्यक्त रस ब्रह्म का वर्णन कौन करे और कैसे करे ? इस रस क्षेत्र के भावों की ओर केवल इङ्गित मात्र किया जाता है। ये सङ्केत अवश्य किसी कुशल कलाकार की अपेक्षा रखते हैं क्योंकि इस सूक्ष्माति सूक्ष्म रसानुभव का प्रकाशन भी तो एक विलक्षण कला है, इन कलाकारों में से एक श्री जयदेव कविराज भी हैं। उनकी काव्य कला कुशलता और रसानुभव प्रकाश कला कुशलता कीओर रसिक पाठक गण अपनी रसमयी प्रज्ञा को प्रेरित करें।