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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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२५२ • • हित चौरासी मानवती नायिका श्रीराधा को निकुञ भवन तक ले चलने के लिये दूतिका रस विलास की स्मृति दिलाकर उल्लास जागृत करती हुई प्रियतम श्रीलालजी से मिला देने का उद्योग कर रही है। वह कह रही है- उरसि मुरारेरुपहित हारे घन इव तरल वलाके। तडिदिव पीते रति विपरीते राजसि सुकृत विपाके॥ विगलित वसनं परिहृत रसनं घटयजघनमपिधानम्। किशलय शयने पङ्कज नयने निधिमिव हर्ष निधानम्॥ धीर समीरे यमुना तीरे वसति वने वनमाली। गोपी पीन पयोधर मर्दन चञ्चल कर युग शाली॥ “दूती ने कहा-नितम्बिनि ! अब गमन करने में विलम्ब की आवश्यकता नहीं रही। देखो न, गोपियों के पुष्ट पयोधरों का मर्दन करने में अत्यन्त चञ्चल एवं कुशल मदन मनोहर श्रीकृष्ण आज केवल तुम्हारे लिये यमुना पुलिन धीर समीर पर विराज रहे हैं। वे तुम्हारा नाम ले लेकर वंशी बजाते और तुम्हारे आने की आहट के भ्रम वश पत्तों की खरखराहट से भी चौंक चौंक उठते हैं। राधे ! वे सचकित नयनों से निरन्तर तुम्हारी प्रतीक्षा करते हैं। जब वे तुम्हारे लिये उतने व्याकुल है तब तुम भी चलकर उनसे मिलो न !” “देखो कैसी काली-काली रात है। इस अँधेरी रात में डर किस बात का ? तुम्हें कोई जान भी न सकेगा, खूब छिपेगी काली रात में तुम्हारी नीली साड़ी। अब शीघ्र अपना नील निचोल पहन लो और इन वाचाल नूपुरों को-चुगल खोरों को छोड़ दो वैरी की तरह। ये हैं भी इसी योग्य !” “प्यारी राधे ! तुम वहाँ चलकर श्याम सुन्दर के हृदय से ऐसी लग जाओ, जैसे घन के सङ्ग तरल दामिनि। जैसी तुम गौराङ्गी चपला हो वैसे वे भी सघन नील नीरद श्याम हैं। जब तुम उनके हृदय से चिपटोगी-रति विपरीत विलास करोगी तभी यह तुम्हारी घन दामिनि की उपमा सत्य जँचेगी। उस मिलन के अवसर में तुम विगलित वसना और भूषण रहित हो जाना और ललित कनक लता की भाँति उनके श्रीअङ्गों से लग जाना। हे कमलनयने ! जब वे तुम्हें किशलय शय्या पर निवेशित करेंगे तब उन रसनिधि के रस का आस्वादन केवल तुम्हारे ही भाग्य में होगा।”