हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० • • हित चौरासी वास्तव में वेदों की मर्यादाओं का जाल तो माया मुग्ध जीवों को नियन्त्रण में लाने के लिये है। ब्रह्माजी ने वेद की कर्म डोरीसे सबको नाथ दिया है जिससे ये उच्छृङ्खल न हो जायें और क्रमशः सत्कर्म परायणता से उठकर भगवत्प्राप्ति रूप परम फल को प्राप्त करें। तब इन मर्यादाओं से परम पुरुष प्रभु को बँधा देखना कितना गलत दृष्टि कोण है। जब उनके उपासक महात्मा गण इन कर्म शृङ्खलाओं से नहीं बँध सकते तो फिर परात्पर पुरुष, वेदातीत, त्रिगुणातीत परिपूर्णतम भगवान् नित्य विहारी श्रीराधावल्लभ लाल ही उसके बन्धन में कैस आ सकते हैं ? उनके समक्ष इन तुच्छ मर्यादाओं का अस्तित्व ही क्या है ? श्रीशुकदेव जी कहते हैं- यत्पादपङ्कज पराग निषेव तृप्ता योग प्रभाव विधुताखिल कर्मबन्धाः। स्वैरं चरन्ति मुनयोजऽपि न नह्यमानां- स्तरयेच्छयात्तवपुषः कुत एव बन्धः॥ श्रीमद्भा. १०/३३/३५ अर्थात् "जिनके चरण कमलों कीधूलि के सेवन से तृप्त भक्त जन और योग साधन के प्रभाव से सम्पूर्ण कर्म बन्धनों से मुक्तयोगी जन भी सब प्रकार के विधि निषेध रूप बन्धनों से छूटे हुए स्वच्छन्द विचरते हैं फिर स्वेच्छा शरीरधारी श्रीहरि को ही किस प्रकार कर्म का बन्धन हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता।" अस्तु; इस नित्य विहार में वेद एवं शास्त्रों की मर्यादाएँ तो पग पग पर टूटती हैं या यों कह दें कि अधिकारी गणों के लिये कर्म बन्धन रूप डोरियों को तोड़ दिखाने के ही लिये है तो यह कथन अत्युक्ति रूप न होगा। यह मर्यादातीत विहार केवल श्रीवृन्दावन में ही है और वृन्दावन के रसिक जनों ने बहुत बहुत प्रकार से इसका गान किया है। इस मर्यादातीत गान से आज भी श्रीवृन्दावन का रस साहित्य गौरवान्वित है जिसकी एक झाँकी है यह- अवनी उदर नाभि सरसी में मनौं कछुक मादिक मधु घोरी। (जै श्री) हित हरिवंश पिवत सुंदर वर, सींव सुदृढ़ निगमन की तोरी।।