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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

हित चौरासी • • २६१

  • ८३ - अवतरण - हित मयी सखियों ने लता भवन में शय्या रच दी है। रात्रि का समय है। युगल किशोर के शयन की बेला है किन्तु अकारण या रस वृद्धि के लिये प्रियाजी मान कर बैठी हैं। श्रीहित सजनी उन्हें मना रही हैं- केदारौ मूल- छाँड़िदै मानिनी मान मन धरिबौ। प्रनत सुंदर सुघर प्रानवल्लभ नवल, वचन आधीन सौं इतौ कत करिबौ।। जपत हरि विवस तव नाम प्रतिपद विमल, मनसि तव ध्यान ते निमिष नहिं टरिबौ। घटति पलु पलु सुभग सरद की जामिनी, भामिनी सरस अनुराग दिसि ढरिबौ।। हौं जु कहति निजु बात सुनु मानि सखि, सुमुखि बिनु काज घन विरह दुख भरिबौ। मिलत 'हरिवंश हित' कुंज किसलय सयन, करत कल केलि सुख सिंधु में तरिबौ।।८३।। भावार्थ - (श्रीहित सजनी ने कहा-) "मानिनि ! अब मन में इस तरह का मान रखना छोड़ दो ! देखो, परम सुन्दर नवल किशोर तुम्हारे प्राण वल्लभ ही तुम्हारे प्रति दीन हो गये हैं तुम्हारे वचनों के अधीन हैं, (अर्थात् तुम्हारे कहे में हैं ।) फिर उनसे ही ऐसा (मानादि व्यववहार) करना (क्या उचित है) ? हे प्यारी ! श्रीहरि तो तुम्हारे प्रेम में विवश हुए क्षण क्षण में तुम्हारे पवित्र नाम का जप करते हैं और तुम्हारे ध्यान से पल मात्र के लिये भी अलग नहीं होते। हे भामिनि ! यह सुन्दर शारदीय रात्रि क्रमशः पल पल करके घट ही तो रही है अतः आपका सरस अनुराग की ही ओर ढलना उचित है; (मान की ओर नहीं ।") श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद (सखी रूप से) कहते हैं-"हे सखि ! मैं जो कुछ कह रही हूँ यह तुम्हारे लिये अपनी (खास) बात है अतः उसे सुनो और मान भी लो। सुमुखि ! बिना किसी कारण के व्यर्थ ही इतना घनीभूत विरह दुख