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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 268

२६२ • • हित चौरासी भोगना क्या उचित है ?" चल कर कुञ्ज भवन में रचित किशलय शय्या पर मधुर मधुर सुन्दर सुन्दर प्रेम क्रीड़ा कीजिये और सुख समुद्र का अवगाहन कीजिये !" टिप्पणी—सम्भोग शृङ्गार में मान एक विशेष दुःख दायक स्थिति है चाहे फिर वह नायक के लिये हो या नायिका के लिये। स्वामी श्रीहरिदासजी ने अपने केलिमाल में एक पद लिखा है, जिसमें श्रीलालजी के द्वारा प्रार्थना करायी गयी है कि हे प्रियाजी ! आप मान न किया करें मुझे ऐसा वरदान दीजिये। इसीसे अनुमान किया जा सकता है कि कितनी वेदना पूर्ण स्थिति है इस मान की। इसमें उद्विग्नता और विकलता का तो ओर छोर नहीं मिलता। बात बात पर भय और आशङ्काएँ खड़ी दिखती हैं, श्रम जो मानिनि के मनाने में होता है उसका तो वारापार नहीं। फिर भी यह 'मान' सम्भोग शृङ्गार का एक विशेष अङ्ग है। यद्यपि इस नित्य विहार में विरह मान आदि का भ्रम भी नहीं है फिर भी मान है। इसका यह अर्थ कि यहाँ 'मान' मान के अर्थ में नहीं वरं रस की वृद्धि के लिये केलि के विकाश के लिये है क्योंकि इससे रस की विशेष पुष्टि होती है, ऐसा रसिकाचार्य्यों का मत है। नित्य विहार की क्रीड़ा में इस मान की स्थिति श्रीप्रियाजी के हृदय में नहीं है यह वहाँ वाह्य रूप से है। वे सदा अपने प्रियतम के अनुकूल एवं दक्षिण होकर भी मानवती बन जाती हैं इसका बड़ा ही गम्भीर आशय है। वह यह कि वे जानती हैं कि मेरी सर्व काल अनुकूल प्रीति से श्रीलालजी को मेरे प्रति, प्रतिक्षण द्रवित होना पड़ता है तब वे अपने प्रेम प्रवाह को रोकने में स्वयं असमर्थ हो जाते हैं अतः नाट्य रूप से ही सही मान धारण करके उनके बढ़ते हुए प्रवाह को रोक देती हैं; जिससे उन्हें अपने स्ववश रहने का अधिक अवसर मिले यह है कृपालु श्रीराधा के मान का गम्भीरार्थ। स्वामी श्रीहरिदासजी एवं रसिकाचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु के नित्य मिलन सिद्धान्त में मान का एक अर्थ उक्त प्रकार से है और अन्यान्य शैलियों से मान के अनेकों भाव हैं। जो यहाँ प्रकाश में ले आना असम्भव और अनुचित होगा।

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