हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६४ • • हित चौरासी सामान्य स्थिति में रखने की आवश्यकता है इसीलिये वह नायिका मान द्वारा रोका जाता है। इसके अतिरिक्त एक विशेष बात यह है, जिसे सभी रस शास्त्रों ने स्वीकार किया है कि रस की सम्पुष्टि नायिका के ही प्राधान्य में होती है, नायक के प्राधान्य में नहीं। श्रीहिताचार्य्य चरण रस के सुज्ञ आचार्य्य हैं उन्होंने अपनी उपासना में श्रीप्रियाजी का ही स्थान प्रधान रखा है इसके अनेक कारणों में एक यह भी है कि वे उक्त सिद्धान्त की महत्ता को ध्यान में रखते हैं। उन्हें ज्ञात है कि नायक की प्रधानता तो दूर रही समकक्षता स्वीकार करने में भी रसाभास हो जाता है। इसी रसाभास से बचकर उन्होंने अपने समस्त ग्रन्थों का प्रणयन किया है। रसों की परिभाषा के क्षेत्र में कटु, अम्ल, और तिक्त भी रस कहे गये हैं और साहित्य क्षेत्र में वीर, भयानक एवं वीभत्स तक। किन्तु इन रसों के आस्वादन कर्त्ता रसिक न कहे जायेंगे अपितु छः रसों में से मधुर और नव रसों में से शृङ्गाररस के आस्वादन कर्त्ता ही रसिक पद से विभूषित होंगे। इसीलिये श्रीसेवक दामोदरजी ने कहा- रसिक बिनु कहें सबही जु मानत बुरौ, कहौ रसिकई कैसे जु जानी ? रसिक न कहे जाने से आराधक वर्ग में से प्रायः सभी को बुरा तो अवश्य लगता है पर 'आपने रसिकता कैसे जानी कहाँ से जानी ? इस प्रश्न का उनके पास कोई उत्तर नहीं है। इस पर यदि वे रसिकता की वाञ्छा करते हैं तो उन्हें सीधा मार्ग दिखाते हैं- जौरु तुम रसिक रस रीति के चाड़िले, तौरु मन देहु हरिवंश बानी। ठीक तो है, यदि तुम्हें रसिक कहलाना है और तुम्हारे चित्त में रस रीति की वाञ्छा है तो तुम श्रीहरिवंशचन्द्र की रसमयी सुधा वाणी में मन दो। क्योंकि यही रसिकाचार्य्य है और इनकी वाणी, रस।