हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • २६५ अब यह देखना है कि इन युगल रसिक नृपति आचार्य्य के सिद्धान्त से विपरीत जिन्होंने नायक मान स्वीकार किया है। उनके सिद्धान्त से प्रेम विलास में रस का कैसा परिपाक हुआ है और वहाँ नायक एवं नायिका का पारस्परिक सम्बन्ध क्या है ? पश्चात् यह भी देखना होगा कि श्रीहिताचार्य्य चरण के रस सिद्धान्त से उनके रस सिद्धान्त का संतुलन माप क्या है ? श्रीकृष्ण ही रस और रसिकता के मूर्त्त रूप हैं। सबने यह स्वीकार किया है कि श्रीकृष्ण गोपियों एवं श्रीराधा के जार (उपपति) और बहुनायक हैं तथा समस्त युवती मण्डल के प्रेमास्पद भी। जैसा कि माध्व गौड़ीय सम्प्रदायाचार्यों का मत है- आराध्यो भगवान् व्रजेश तनयस्तद्धाम वृन्दावनं, रम्याकाचिदुपासना व्रजवधू वर्गेण या कल्पिता। श्रीमद्भागवतं पुराणममलं प्रेमापुमर्थो महान्, श्रीचैतन्यमहाप्रभोर्मतमिदं तत्राग्र हो नापरः।। अर्थात् " आराध्य है व्रजराजनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण, उनका धाम है श्रीवृन्दावन। पूर्वकाल मे व्रज वधू गणों ने जिस भाव से आराधना की है वही कोई रम्य (परकीया शृङ्गार रस की) उपासना है। इसका प्रमाण है श्रीमद्भागवत जैसा अमल पुराण और इस उपासना का लक्ष्य है परम पुरुषार्थ प्रेम लक्षणा भक्ति। बस इतना ही श्रीचैतन्य महाप्रभु पाद का मत है जो साधक के लिये अवश्य ग्रहणीय है; अन्य नहीं।" इसके उदाहरण श्रीमद्भागवत एवं परकीया भाव से सम्बन्ध रखने वाले समस्त महात्माओं के काव्यों में मिलेंगे। इस रस का आस्वादन वहाँ वहाँ किया जा सकता है। अब पाठक इस रस को ध्यान में रखते हुए श्रीहिताचार्य्य चरण रस सिद्धान्त की ओर दृष्टि करें- नित्य विहार अखंडित धारा। एक बैस रस विवि सुकुमारा।। नित्य किसोर रूप निधि सीवाँ।