भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 275 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 272

२६६ • • हित चौरासी तिन बिच अन्तर पल कौ नाहीं। तऊ तृषित प्रीतम मन माँहीं।। अद्भुत सहज रंग सुखदाई। तहाँ प्रेम की एक दुहाई।। पिय गज मत्त न अंकुस के बस। परम सुछन्द फिरत अपनैं रस।। देखत हीं तिनकी परछाँही। मदन कोटि व्याकुल है जाहीं।। ते मोहन बस कीनें गोरी। राखे बाँधि प्रेम की डोरी।। छुटत न क्यौंहूँ ऐसे अटके। प्राँन हारि चरनन तर लटके।। प्रीति की रीति लाल ही जानैं। तजि प्रभुता बिनु मोल बिकानैं।। प्रेम मयी रस मैंन विनोदा। नव नव उपजत है दुहुँ कोदा।। रहत है दिनहिं प्रेम सरसाई। तहाँ मान की कहाँ समाई।। सूच्छम प्रेम न मन में आवै। स्थूल रूप सबही कौं भावै।। यह है श्रीहिताचार्य्य का रसमय सिद्धान्त। जहाँ-नायक तहाँ न नायिका रस करवावत केलि। सखी उमै संगम सरस पिवत नैन पुट झेलि।। अब विज्ञ रसज्ञ जन परखें कहाँ रस है और कहाँ रसाभास ? इसीतरह मान नायक का उचित है या नायिका का तथा किस मान में रस की पूर्णतया पुष्टि होती है ?