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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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हित चौरासी • • २६७

  • ८४ - अवतरण-आज सम्पूर्ण रात्रि युगल किशोर ने रति रस विलास किया है पर सखियों की चोरा चोरी। प्रातः काल रति रस के चिह्नों के प्रकाश ने चोरी प्रकट कर ही दी। श्रीहित सखी ने ठिठोली सी करते हुए अपनी प्राणाधार स्वामिनी श्रीराधा से कहा- केदारौ मूल-आजुऽब देखियत है हो प्यारी रंग भरी। मोपै न दुरति चोरी वृषभानु की किसोरी; सिथिल कटि की डोरी, नंद के लालन सौं सुरत लरी।। मोतियन लर टूटी चिकुर चंद्रिका छूटी; रहसि रसिक लूटी गंडनि पीक परी। नैननि आलस बस अधर बिंब निरस; पुलक प्रेम परस हित हरिवंश री राजत खरी।।८४।। भावार्थ - (श्रीहित सखी ने कहा-"सखी !) हे प्यारी आज तुम इस समय आनन्द से भरी हुई दिख रही हो और हम देख रही हैं। हे वृषभानु की किशोरी ! मुझसे भला आपकी चोरी (छिप छिप कर की गई रति क्रीड़ाएँ, मिलन, प्रियतम सम्भोग की बातें) कैसे छिपाये छिपेंगी ? नहीं छिप सकतीं। देखो न; तुम्हारी कटि की डोरी (कटि बन्धन, नीबी) ढीली है; अतः (स्पष्ट है कि) तुम नन्द के दुलारे श्रीश्याम सुन्दर से अवश्य सुरत युद्ध करती रही हो। [या अब प्रातःकाल उनसे रति युद्ध करके ही आयी हो।] श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद (सखी भाव से) कहते हैं-"राधे ! तुम्हारी मोती माला टूट चुकी है और गुँथी हुई केश चन्द्रिका भी छूट चुकी है। कपोलों पर पीक चिह्न भी अङ्कित हैं (इससे ज्ञात होता है कि) रसिक लाल जी ने तुम्हें एकान्त में लूट लिया है। अरी ! तुम्हारी आँखें आलस्य वश हैं और बिम्बा फल से अधर भी रङ्ग हीन या रस हीन से हैं। तुम्हारा सम्पूर्ण शरीर प्रेम के स्पर्श के कारण पुलकित है। अहा ! तुम अब इन सम्पूर्ण शोभाओं से युक्त होकर कैसी भली लग रही हो ?" (अर्थात् 'राजत खरी' यह मधुर व्यङ्गोक्ति भी है।)