हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 274, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ें२६८ • • हित चौरासी टिप्पणी – इस पद में सम्भोग शृङ्गार की चरम सीमा सुरत विहार का वर्णन है। ग्रन्थ के इस अन्तिम पद में सुरत विहार का वर्णन करके मानो अपने सेव्य नित्य विहारी लाल की आनन्दमयी केलि सुरत क्रीड़ा की नित्य स्थिति का लक्ष्य कराया गया है। प्रथम पद में "जोई जोई प्यारो करै......तरंगनि न्यारे।" कह कर युगल सरकार के अत्यन्त गाढ़ एकाकार प्रेम का लक्ष्य कराया गया था। ग्रन्थ के मध्य में उपपत्ति रूप से उसी रस को नाना केलि कलाओं से पुष्ट किया गया। मानो इस हित वाणी सुधार्णव में अनेकों लहरियाँ उठीं और समा गयीं अन्त में उसी रस की गम्भीरता में– जै श्री हित हरिवंस करौ दिन दोऊ अचल विहार। इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थ उपक्रम उपपत्ति एवं उपसंहार में आद्यन्त एक ही रस–प्रेम विलास सुरत क्रीड़ा से ओत प्रोत है। इस अन्तिम पद में केवल सुरत क्रीड़ा का ही वर्णन करके यह सूचित किया गया कि यह रस नित्य अविचल और अखण्ड है किंवा श्रीवृन्दावनेश्वरी, श्रीकृष्णआह्लादिनि, नित्यानन्द मयी नित्य नवल किशोरी श्रीराधा और उनके प्रियतम रसिक शेखर नित्यानन्द मय उन्नत नवल किशोर सदा एक रस अविचल विहार में मग्न हैं यह सूचना है। युगल किशोर की भाँति उनका समस्त परिकर सखी गण, खग, मृग, श्रीवन के लता तरु आदि सभी नित्यानन्द मय, रस मय और विलास से ओत प्रोत हैं। यह श्रीहित हरिवंश चन्द्र रसिकाचार्य्यवर्य का आराध्य तत्व रस है, जिसका विमल विकाश है श्रीवृन्दावन का अत्युज्ज्वल शृङ्गार पूर्ण नित्य विहार और जिसकी सुमधुर झाँकी इस सम्पूर्ण ग्रंथ में करायी गयी है।