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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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२४४ • • हित चौरासी (१) (जै श्री) हित हरिवंश परम कौंमल चित, चपल चली पिय तीर। सुनि भय भीत वज्र कौं पिंजर सुरत सूर रणवीर।। (२) (जै श्री) हित हरिवंश चली अति आतुर श्रवन सुनत तेहि काल। लै राखे गिरि कुच बिच सुन्दर सुरत सूर ब्रज बाल।। (३) चपल चली तन की सुधि बिसरी सुनत श्रवन। (जै श्री) हित हरिवंश मिले रस लंपट राधिका रवन।। (४) अतिसै प्रीति हुती अंतरगत हित हरिवंश चली मुकुलित मन। निविड़ निकुंज मिले रस सागर जीते सत रतिराज सुरत रन।। आपकी उदारता और कृपालुता पूर्ण तत्सुख भावना से समस्त व्रज साहित्य काव्य भरा पड़ा है। श्रीकृष्ण आपकी उदारता से ही आज रसिक शेखर की उपाधि से विभूषित हो सके हैं। वे जब जब प्रेम परवश होकर मूर्च्छित होते हैं तब तब प्रियतम सुख को ही सर्वस्व जानने वाली उदार स्वामिनी उन्हें 'अपना महामधुर अधर रस दान करती और मानो उन्हें जीवन दान देती हैं, इसी लिये ये श्रीकृष्ण सजीवनी हैं। जब उदार होती हैं, तब अपना सर्वस्व दान करते न विलम्ब करतीं और न सङ्कोच ही। श्रीहिताचार्य पाद कहते हैं- करुना करि उदार राखत कछु न सार, दसन बसन लागत जब दैन। एवं- आजु रहसि मोहन सब लूटी विविध अपनी थाती। ये वाक्य आपकी उदार भावना के प्रमाण हैं। आपके प्रेम और तत्सुख भाव की गति गोप्य और अद्भुत है- देखौ अदभुत प्रीति की चालहिं। सुनु सखि पियहिं प्यार सौं प्यारी, राखति ज्यौं उर मालहिं।। ह्वै ह्वै जात विवस मन मोहन, निरखि नैन मन चालहिं।