हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • २४३ पाछैं ललिता आगैं स्यामा प्यारी, ता आगैं पिय मारग फूल विछावत जात। कठिन कली बीनि बीनि न्यारी करत, प्यारी के चरन कोमल जानि सकुच गड़िवेई डिरात।। दीरघ लता कर सौं निरवारत पाछैं, गहें डार सीस नहिं परसत पल्लव पात। सूरदास मदन मौहन पिय की री अधीनताई, देखत री मेरे नैन सिरात।। कितनी विलक्षण अधीनता, दीनता और लगन के साथ है यह तत्सुख भावना ? इसीलिये श्रीहित हरिवंश महाप्रभु ने मर्यादा रेखा सी खींच दी- प्रीति की रीति रँगीलोई जानै। अर्थात् प्रीति की रीति तो केवल रँगीले श्रीलालजी ही जानते हैं- और कोई तो जानता ही नहीं, क्योंकि यही इतना बड़ा उत्सर्ग करना जानते हैं प्रीति के पथ पर। जो अपना सर्वस्व चढ़ा चुके हैं उनके चरणों पर उन्हीं के लिये एक सर्वश्रेष्ठ एवं आदर्श प्रेमी का पद प्रदान किया सुज्ञ रसिकों ने- एकै प्रेमी एक रस, श्रीराधावल्लभ आहि। भूलि कहै जो और ठाँ झूठो जानौं ताहि।। -श्रीहित ध्रुवदासजी इन परम प्रेमी प्रियतम श्रीलालजी की ही भाँति प्रियतमा श्रीराधा अपने प्राणेश्वर के सुख चिन्तन एवं कार्य कुशलता में सलग्न रहती हैं। यदि श्रीलालजी उनके सुखों का ध्यान मध्य रति काल में भी रख सकते हैं और 'विरमि विरमि' वचनामृत प्रवाहित कर सकते हैं तो प्रियतम सुख मयी प्रिया भी अपना सर्वस्व उनके चरणों में प्रतिक्षण समर्पित करती रहती हैं। वे उनके प्रेम में उन्हें भूल तक जाती हैं और फिर मानिनि बन बैठती हैं और उनकी विरह-व्यथित दशा सुनकर व्याकुल भी हो उठती हैं। उनका प्रेम विलक्षण है। वे कितनी तन्मय हैं प्रियतम में, इसे कभी प्रकट नहीं करना चाहतीं। प्रियतम के दुःख के सन्देश सुनते ही किस आतुरता से दौड़ पड़ती हैं इसका वर्णन हित चौरासी में देखिये-