हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ • • हित चौरासी हम गावैं तत्काल सूत दुहुँ दिसि को ऐसौ। बुध जन लेहु विचारि कमल दिनकर को जैसौ।। लीला ललित विहार स्याम स्यामा मन भावैं। 'भगवत रसिक' अनन्य उपासक अनुदिन गावैं।। —श्रीभगवत रसिकजी अब अन्त में युगल किशोर के पारस्परिक तत्सुखित्व भाव की महा मधुर झाँकी कीजिये। दोनों के तन, मन प्राण प्रेम की तल्लीनता में एक मेक हो गये हैं, श्रीहिताचार्य चरण इसका सरस चित्र अङ्कित करते हैं- जोइ जोइ प्यारौ करै सोई मोहिं भावै, भावै मोहिं जोइ सोई सोई करैं प्यारे। दोनों की क्रिया एवं रुचि मानो एक हो गयी है और परस्पर में प्रियता भी इतनी कि- मेरे तन मन प्रानहूँ तें प्रीतम प्रिय, प्रीतम अपने कोटिक प्रान मोसों हारे। यदि श्रीप्रियाजी ने अपने एक तन मन और प्राण को उन पर न्यौछावर किया है तो श्रीलालजी ने भी अपने कोटि कोटि प्राण और तन मन को उन पर न्यौछावर कर दिया है। ये प्रियतम अपनी प्राण प्रिया के सुख सम्पादन में कितने तत्पर हैं ? देखिये- चरन धरत प्यारी जहाँ लाल धरत तहँ नैन। इसलिये कि उनके सुकुमार चरणों में भूमि की कठोरता कष्ट न पहुँचा दे। इसके लिये वे अपनी पलकों की बुहारी बनाकर उस लता भवन को बुहार डालते हैं जहाँ जानते हैं कि यहाँ प्रियाजी विराजेंगी- पलकन की करि सौंहनी देत लाल तेहि कुंज। लता भवन से निकल प्राण प्यारी श्रीराधा वन में विहार करने चली हैं, उस समय उनके सुख के लिये प्रियतम श्याम सुन्दर क्या क्या करते हैं, उसका वर्णन श्रीमदन मोहन सूरदास जी करते हैं-