हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • २४१ इन सखियों की सर्वोपरिता और प्रेम की पूर्ण पराकाष्ठा प्रकट करने के लिये श्रीहित ध्रुवदासजी महाराज ने कहा है- गोपिनु के सम भक्त न आहीं। उद्धव विधि तिनकी रज चाहीं।। तिनहूँ कौ मन तहाँ न परसै। जेहि ठाँ ललितादिक छबि दरसै।। नित्य विहार अखंडित धारा। मधुर वैस रस विवि सुकुमारा।। इस श्रेष्ठता का मूल है नित्य विहार की सर्वोपरि एवं विलक्षण तत्सुख मयी भावना। अस्तु; जिस प्रकार सखियाँ युगल के सुख में सुखी हैं, उसी प्रकार युगल रसिक नरेश भी परस्पर में एक दूसरे के लिये एवं दोनों मिलकर सखियों के लिये अपने सुखों के त्याग पूर्वक उनको सुखी करने के लिये सर्व भावेन सन्नद्ध रहते हैं। पहले यह देखा जाय कि युगल किशोर सखियों के लिये क्या करते हैं ! युगल किशोर जो भी क्रीड़ाएँ करते हैं अपनी रुचि, प्रीति, इच्छा की पूर्ति के लिये नहीं वरं अपनी प्यारी सखियों के लिये। वे उनके खिलौने बने हुए दारु यन्त्रवत् उन्हीं प्रेममयी सखियों के हाथों खेले खिलाये जाते हैं- दियें लियें मन रहें सहेली दंपति मिले खिलौना। कानन छबि सर क्रीड़त साँवल गौर हंस मनु छौंना।। छिन छिन नये नये अस कौतुक भये न हैं पुनि हौंना। वृंदावन हित रूप अमी नैननि की ओक अँचौंना।। -चाचा वृन्दावन हित रूप युगल किशोर सखियों के हाथ के खिलौने ही नहीं अपितु युगल एवं सखियों की रुचि एवं क्रिया की कितनी एकता है, वे किस प्रकार एक दूसरे के भावों से ओत प्रोत हैं; देखिये- हम गावैं सोई करैं, सहज लाड़िली लाल। करैं लाड़िली लाल सो, हम गावैं तत्काल।।