भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 239, कुल 275 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 239

२३२ • • हित चौरासी सकता है जो सौन्दर्य की निधि, माधुर्य्य के भण्डार, आकर्षण के केन्द्र और अनन्त गुणों के आगार हैं। हाँ, अनुभवीऔर सूक्ष्म प्रज्ञाशील रसिक सन्तों ने उनके सम्बन्ध में जो अल्प मात्र सङ्केत सा किया है वही हमें उस अनुपम रस राशि की ओर प्रेरित करता है। ऐसा एक सङ्केत श्रीध्रुवदास जी ने किया है उन नयनों की वेधन शक्ति की ओर— नैंकु चितै तिरछे मुसकानी। लालहिं सुधि बुधि सबै भुलानी॥ बसी जु प्यारे लाल उर, वह चितवनि मुसकानि। तबते कबहुँ छुटी नहिं, बसी जु उर में आनि॥ एक बार जो चितवन की मुसकान श्रीलालजी के हृदय में बस गयी, सो बस गयी, फिर कभी न निकली। कितनी विचित्र वेधन शक्ति है इन नयनों में ? जिस ओर यह चितवन मुसकान जा गिरती है रूप की वर्षा सी कर देती है— बड़े बड़े उज्ज्वल सुरंग अनियारे नैना, अंजन की रेख हेरैं हियरौ सिरात री। चपलाई खंजन की, अरुनाई कंजन की, उजराई मोतिन की पानिप लजात री॥ सरस सलज्ज नये रहत हैं प्रेम भरे, चंचल न अंचल में कैसैहूँ समात री। 'हित ध्रुव' चितवन छटा जेहिं कोद परै, तेहि ओर बरसा सी रूप की ह्वै जात री॥ —श्रीहित ध्रुवदासजी यह वह चितवन है जिसका घायल जीता तो है पर मृत जैसा रहकर और मर जाने पर भी जीता रहता है उसके रूपामृत का पान करके। इस प्रकार वह जीवित और मृत के बीच बीच की स्थिति में पड़ा लूमता झूमता रहता है मदिरा पीने वाले की तरह। कितने गुण और अवगुणों से भरे हैं ये नयन— अमी हलाहल मद भरे स्वेत स्याम रतनार। जियत मरत झुकि झुकि परत जेहिं चितवत इक बार॥ —बिहारी