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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 240

२३४ • • हित चौरासी टिप्पणी – मानिनि नायिका श्रीप्रियाजी के वियोग में प्रियतम श्रीलालजी अत्यन्त दुःखी एवं विरह कातर हैं। सखी उनकी दशा देख कर आई है और वही सब बातें श्रीप्रियाजी से कह रही है। सखी ने कहा- "प्यारी ! वे श्याम सुन्दर तो अब आपके वियोग में प्रणय निराशा के साथ साथ जीवन से निराश हो चुके हैं। मैं सङ्कोच एवं भय वश कुछ कह नहीं सकती किन्तु दशा है ही कुछ ऐसी वे मुख में तुम्हारा नाम और हृदय में तुम्हारे ध्यान के रहने से ही अब तक जीवन धारण करने में समर्थ हो सके हैं। जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति प्रत्येक दशा में केवल 'राधा हा राधा ! रटते रहते हैं। यह दूतिका सखी प्रियतम श्रीलालजी की दशा देख कर आयी थी, उसे मालूम था कि प्रियतम की विरह व्यथा वियोग की अन्तिम स्थिति के सन्निकट है किन्तु फिर भी वह कहे कैसे अपने मुख से भावी अमङ्गल के अशुभ शब्द ? वह हेर फेर करके केवल इतना ही कह पाती है- 'मृग शावक लोचनि। अब मान बढ़ाने का समय रहा नहीं। इसका परिणाम क्या होगा जानती हो ? मैं भय वश उसे कह नहीं सकती पर तुम समझ सको तो समझो ? मैंने उनकी जो दशा देखी है मुझे उसका भय है और सङ्कोच लगता है। मानिनि ने सखी की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया तब उसने फिर कहना प्रारम्भ किया “करुणामयि राधे ! तुम सोचो तो सही क्या होगी उनकी दशा ? वे प्रेमोन्मत्त हुए मुरली में केवल आपका ही नाम गा रहे हैं। वे चिन्तन करते हैं तो आपके रूप का। उन्हें सिवाय आपके नाम, गुण लीला गायन के और कुछ मानों रुचता ही नहीं है। उन्हें विश्व प्रपञ्च से कोई प्रीति तो रही नहीं वरं उन्हें अपने आप की भी सुधि नहीं रह गयी है। उनकी उस मन मोहन दशा का कैसे वर्णन करूँ ? प्रिये ! वे प्रेम की आतुरता से प्रेम लम्पट से बन बैठे हैं। उन्हें अब प्यास है तो आपके प्रेम की। इस प्रेम के समक्ष अब उन्हें अन्य कुछ प्रिय रह ही नहीं गया है। उनका जीवन केवल आपके आधीन.....।" सखी से आगे की बात न कही गयी। वह श्रीप्रियाजी के लिये एक गम्भीरार्थ पूर्ण सम्बोधन देकर रह गयी जिससे उसके आन्तरिक भावों की पूर्ण अभिव्यक्ति हो रही थी। उसने कहा- “महा मोहन प्रियतम आतुर लम्पट श्रीलाल की दुख मोचनि।”