हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • २३५ उसने सम्बोधन में ही अपना तात्पर्य प्रकट कर दिया। कण्ठावरोध या प्रेमाधिक्य वश वह अपना आशय स्पष्ट न कर सकी। क्योंकि अत्यन्त विरह में जिस अमङ्गल की भयानक भावना का निवास है उसे 'हित रूपा' सहचरि कैसे अपनी जिह्वा पर ला कहती, उसका चुप होकर दो आँसू रो देना ही पर्याप्त था। इस पद में अव्यक्त व्यञ्जना से श्रीलालजी एवं सखी के प्रेम की बड़ी गम्भीर झाँकी करायी गयी है। यहाँ 'अमङ्गल' शब्द से दुःखी होने या चौंकने की भी आवश्यकता नहीं है कि महामङ्गल मय श्रीलालजी के लिये यह अमङ्गल शब्द क्यों और कैसे ? प्रेम की अत्युच्च स्थिति या विशेष भावों का प्रकाशन करने के लिये ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है जो उचित है। देखिये, श्रीकृष्ण दर्शन से श्रीराधा के मूर्च्छित हो जाने पर उनकी सखी नन्द भवन में जाकर उलाहना दे रही है। उसके शब्दों में क्या भाव हैं- जागिहै, जीहै तो जीहैं सबै, नतु पीहैं हलाहल नंद के द्वारैं। अर्थात् ("वह राधा मूर्च्छा से) जागकर जी उठेगी तो ही हम भी जीती रहेंगी अन्यथा (उनके मरणोपरान्त) हम सभी नन्द राय के द्वार पर बैठ कर विष पी लेंगी और मर जावेंगी।" उसने स्पष्ट कह दिया कि यदि श्रीराधा का जीवन न रहा तो हम भी अपना जीवन न रखेंगी। 'हित चौरासी' में श्रीहिताचार्य पाद ने भी मान के अवसर में दूतिका के मुख से नायक की दशा का वर्णन कराते हुए इसी प्रकार के भाव का प्रकाश किया है- वे तौऽब गनत जीवन यौवन तब 'हित हरिवंश हरि भजहि भामिनि जौ। अर्थात् 'वे (प्रियतम श्रीकृष्ण) अपने जीवन और यौवन को तब कुछ गिनेंगे जब आप जाकर उनसे मिलेंगी, अन्यथा नहीं। यहाँ जीवन की गणना न करने का वही अर्थ है जो अमङ्गल मय कही जा सकती है जिसके लिये दूतिका ने मूल पद में कहा है- हौंऽब डरनि कछु कहि न सकत इक बात सँकोचनि।