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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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२३६ • • हित चौरासी यहाँ सङ्कोच वश न कह सकने योग्य केवल इतनी ही बात थी कि आपके विना वहाँ कितना बड़ा अमङ्गल हो सकता है उसकी कल्पना भी मेरे लिये हृदय विदारक है, जहाँ प्रेमोदय के सात्विक अनुभावों का वर्णन हैं वहाँ स्तम्भ, स्वेद, रोमाञ्च, स्वर भङ्ग, कम्प, वेपथु, वैवर्ण्य, अश्रु, प्रलय एवं मूर्च्छा आदि सभी हैं। इसी प्रकार विरह में अभिलाषा, चिन्ता, स्मरण, गुण कथन, उद्वेग, प्रलाप व्याधि, उन्माद, जड़ता, मूर्च्छा एवं मरण तक का वर्णन किया गया है। प्रेम एवं विरह के प्रत्येक लक्षण समय समय पर युगल किशोर एवं सखियों में सर्वदा देखे जाते हैं जिनका वर्णन श्रीराधा सुधानिधि, गीत गोविन्द, हित चौरासी, श्रीध्रुवदास कृत ग्रन्थावली और प्रेमरस के अनेक ग्रन्थों में यत्र तत्र पाया जाता है। वहाँ प्रत्येक स्थल पर मूर्च्छा एवं मरण का वर्णन प्रेम की पराकाष्ठा के परिचय रूप में है न कि अमङ्गल भावना से। यदि यह मूर्च्छा एवं मरण के लक्षण युगल सरकार जो प्रेम की अवधि हैं इनमें न होंगे तो होंगे कहाँ ? क्योंकि यही तो प्रेम की साकार मूर्त्ति हैं। श्रीहिताचार्य पाद ने अपने ग्रन्थों में जिस प्रेम तत्व का प्रकाश किया है, वह अत्यन्त सूक्ष्म, अवर्णनीय, अतर्क्य और केवल अनुभव गम्य है। इसमें प्रत्येक क्षण भावों की नई–नई तरङ्गैं उठती रहती हैं। इसमें मिलन है, वियोग है, विरह है, मान है, भ्रम है, काम है, क्रोध है, लोभ है, मोह है, मद है, घृणा है, उपेक्षा है, ईर्ष्या है, असूया है, अनादर है, अभाव है, कटुता है, त्रास है, पीड़ा है, मूर्च्छा है, प्रलय है और है मृत्यु। इसमें सब कुछ है। वह सब है जो कहीं नहीं है किन्तु यह सब होकर भी कुछ नहीं है, जिस रूप में इनकी व्याख्या संसार में की जाती है। यहाँ का सब कुछ केवल प्रेम है, विशुद्ध प्रेम। इसलिये अमङ्गल रूप से जिन भावों का प्रकाश सखी ने किया वह भी दिव्य प्रेम है। – ७५ – अवतरण – वृन्दावन के ऐकान्तिक कुञ्ज भवन में श्रीयुगल किशोर सुखमयी शय्या पर विराजमान् हैं पर प्रीति सन्मुख नहीं। प्रियतम प्रेमातुर एवं दीन हैं और प्रिया मान पूर्ण भावों के कारण रूठी सी। उन्होंने अपना श्रीमुख नीचा कर रखा है वे सतत् अपने चरण नखों की ओर निहारती और जाने क्या सोचतीं हैं, प्रियतम लालजी की ओर मानो देखना ही नहीं चाहतीं।