भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 275 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 244

२३८ • • हित चौरासी किसी भ्रम से श्रीप्रियाजी रूठ गयीं और प्रियतम की ओर से मुँह फेर कर पीठ देकर बैठ गयीं। उनके रूठते ही श्रीलालजी व्याकुल हो गये और वे उन्हें मनाने समझाने लगे हैं। जब कभी रूठी हुई प्रियाजी उठकर अन्य किसी कुअ में जा बैठतीं हैं तब उसे कुआन्तर मान या प्रवास मान भी कहते हैं। इस समय दोनों को प्रसन्न करके एकत्र कर देने और प्रीति उत्पन्न करा देने के लिये मध्यस्थ सखी-दूतिका की आवश्यकता होती है। सम्भ्रम मान के अवसर में चाहे दूतिका की आवश्यकता न हो पर अनुनय विनय, दीनता, अधिनता, नायक गुण, रूप प्रशंसा आदि की आवश्यकता तो तब भी होती है। उक्त पद में श्रीहित सजनी मध्या सखी के रूप में चाटुकार हैं, जो रूठी हुई मानिनि प्रिया के समक्ष नायक श्रीलालजी की ओर से अनुनय विनय के भाव उपस्थित कर रही हैं। – ७६ – अवतरण – श्रीवृन्दावन के अन्तर्भाग में एक अत्यन्त रहस्य मय सघन लता भवन है। वहाँ युगल किशोर एकान्तिक रूप से सुरत क्रीड़ा का उपक्रम कर रहे हैं। क्रीड़ा के लिये प्रेम मयी सखियों ने सुमन शैय्या रचकर तैयार कर दी है, जिस पर लाड़िली लाल रस मग्न हुए आसीन हैं। दोनों , दोनों की छबि माधुरी का अवलोकन कर कर के मनोज के मधुमय भावों में डूब रहे हैं। रात्रि का मध्य होने जा रहा है और रति विहार का मधुर प्रारम्भ। इस सुरत सुख का नित्य सुख लेने वाली श्रीहित सखी जी उसका वर्णन इस प्रकार करती हैं- कान्हरौ मूल-नागरीं निकुंज ऐंन किसलय दल रचित सैन, कोक कला कुसल कुँवरि अति उदार री। सुरत रंग अंग अंग हाव भाव भृकुटि भंग, माधुरी तरंग मथत कोटि मार री।

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक) · पृष्ठ 244, कुल 275 में से · BharatKosha