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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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हित चौरासी • • २३६ मुखर नूपुरनि सुभाव किंकनी विचित्र राव, विरमि विरमि नाथ वदत वर विहार री। लाड़िली किसोर राज हंस हंसिनी समाज, सींचत हरिवंश नैन सुरस सार री॥७६॥ भावार्थ - निकुञ्ज भवन में नागरी गण (सखियों) ने नवीन नवीन पल्लवों से शैय्या रची है। उस पर किशोरी श्रीराधा विराजमान् हैं जो प्रेम विहार की क्रीड़ाओं में चतुर एवं अत्यन्त उदार हैं। उनके अङ्ग प्रत्यङ्गों से सुरत रस प्रकट हो रहा है तथा उनके हाव भाव और भौंहों के नर्तन में जो माधुर्य लहरियाँ उठती हैं उनसे कोटि कोटि कामों का भी मन मथित हो जाता है। सुरत विहार में वाचाल नूपुरों के सुन्दर भाव पूर्ण शब्द, किङ्किणियों के विचित्र शब्द और सुरत विहार के बीच बीच में श्रीलालजी के विरमि विरमि (अर्थात् प्रिये ! आप विश्राम लें, विश्राम ले लें थक गयी होंगी इत्यादि) वाक्य (किसी अवर्णनीय रस की उत्पत्ति करते हैं !) श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद (सखी रूप से) कहते हैं कि रसमय लाड़िली एवं किशोर-श्रीराधा वल्लभलाल जो प्रेम लीला रूप मान सरोवर के हंस एवं हंसिनी हैं; अपने सहचरि समाज के नयनों को अपनी सुरत क्रीड़ा के सुन्दर रस सार से सींचते रहते हैं। टिप्पणी- विरमि विरमि नाथ वदत वर विहार री। प्रियतम श्रीकृष्ण विहार के प्रबल प्रवाह के समय भी श्रीप्रियाजी के सुखों का पूर्ण ध्यान रखते हैं तभी तो विहारावसर में भी 'विरमि विरमि' कह उठते हैं। इससे उनके तत्सुखित्व भाव का परिचय मिलता है। श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु पाद के द्वारा प्रकाशित रस मार्ग स्वसुख मय नहीं वरं पूर्ण तत्सुखमय है। नित्य विहार परिकर में से युगल, श्रीवन और प्रत्येक सहचरि प्रत्येक एक दूसरे के सुखों का ही ध्यान रखता है। और इसके लिये अपने सुखों का बलिदान भी करने को उद्यत रहते हैं। श्रीवृन्दावन अपनी सम्पूर्ण श्री सम्पत्ति-शोभा, पुष्प, दल, फल, जल इत्यादि से श्रीकिशोर किशोरी एवं सखी गण को सुखी करना चाहते हैं इसी प्रकार सहचरियाँ अपने तन, मन