हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
हित चौरासी • • २१६ लालन मिस आतुर पिय परसत उरु नाभि उरजात। अद्भुत छटा विलोकि अवनि पर विथकित वेपथ गात॥ नागरि निरखि मदन विष व्यापित दियौ सुधाधर धीर। सत्वर उठे महामधु पीवत मिलत मीन मिव नीर॥ अबहीं मैं मुख मध्य विलोके बिंबाधर सु रसाल। जागृत ज्यौं भ्रम भयौ पर्यौ मन सत मनसिज कुल जाल॥ सकृदपि मयि अधरामृत मुपनय सुंदरि सहज सनेह। तव पद पंकज कौ निजु मंदिर पालय सखि मम देह॥ प्रिया कहति कहु कहाँ हुते पिय नव निकुंज वर राज। सुंदर वचन रचन कत वितरत रति लंपट बिनु काज॥ इतनौ श्रवन सुनत मानिनि मुख अंतर रह्यौ न धीर। मति कातर विरहज दुख व्यापित बहुतर स्वास समीर॥ (जै श्री) हित हरिवंश भुजनि आकरषे लै राखे उर माँझ। मिथुन मिलत जु कछुक सुख उपज्यों त्रुटि लव मिव भई साँझ॥६६॥ भावार्थ – दोनों प्रियतम (श्रीराधा एवं श्रीलालजी) कुञ्ज में विहार कर रहे हैं; दोनों की देह प्रभा अनुपम गौर एवं श्याम है; (दानों के अनुपम विहार से) वन में सुख पुञ्ज बरस सा रहा है। (युगल क्रीड़ा में) प्रचण्ड काम (मन्मथ) ही अद्भुत खेत (युद्ध का मैदान) है, भूषण ध्वनि ही मानो दुन्दुभि वाद्य हैं। (युगल किशोर के) अङ्ग प्रत्यङ्ग से उत्पन्न कोटि कोटि भावों का प्रकाश ही (दोनों योद्धाओं का) परस्पर जूझना है। भीषण युद्ध से अत्यन्त थकित हो जाने के कारण अवला श्रीप्रियाजी की सुन्दर आँखें नींद से भर गयीं और वे कृशाङ्गी आलस्य से भर प्रियतम की गोद में निः शङ्क भाव से सो गयीं। उस समय प्रेम और दुलार के बहाने प्रेमातुर प्रियतम उनके उरू, नाभि एवं उरोजों का स्पर्श करने लगे। (उस समय प्रियाजी के श्री अङ्गों की छबि देखकर उनका शरीर काँपने लगा और वे मूर्च्छित होकर गिर पड़े। (उनके मूर्च्छित होकर गिरने पर) नागरी श्रीप्रियाजी ने देखा, इनके मदन विष व्याप्त हो गया है, तब उन्होंने (प्रियतम को) अपनी अधर सुधा दी।
२२० • • हित चौरासी उस महामधु का पान करते ही प्रियतम शीघ्रता पूर्वक ऐसे उठ बैठे जैसे मीन को पानी मिल गया हो। (फिर अर्ध चेतन की सी अवस्था में कहने लगे-) "अहो ! अभी अभी तो मैंने अपने मुख के मध्य (किन्हीं) रसमय अधर बिम्बों का अनुभव किया था।" (इतनी स्मृति आते ही) फिर उन्हें पूर्ववत् जागृत की ही भाँति भ्रम हो गया कि मैं श्रीप्रियाजी के आलिङ्गन से वञ्चित हूँ; इसलिए उनका मन पुनः शत-शत कामदेवों के जाल में पड़ गया-वे अधिकाधिक व्यथित हो गये। (मन्मथ-व्यथा से व्यथित होकर श्रीलालजी दीनता पूर्वक श्रीप्रियाजी से विनय सी करने लगे; वे बोले-) "हे सुन्दरि ! आप स्वाभाविक स्नेह के साथ केवल एक ही बार सही अपने अधरों के अमृतका दान मुझे दीजिये ! हे सखि ! अब कृपा पूर्वक आप अपने श्रीचरण कमलों के निवास भवन रूप मेरे इस देह को (कामाग्नि में जलने से) बचाइये- इसका पालन कर लीजिये ?" प्रियतम के इन शब्दों को सुनकर) श्रीप्रियाजी ने कहा-"हे नव निकुञ वर राज ! हे प्रियतम !! तुम तब कहाँ थे ? (जब मैंने अधरामृत दिया था।) अरे रति लम्पट ! अब क्यों व्यर्थ इस (चाटुकारी पूर्ण) वचन रचना का विस्तार कर रहे हो ?" मानिनि प्रिया के मुख से अपने कानों ये शब्द सुनते ही (प्रियतम के) हृदय में धैर्य नहीं रह गया, उनकी बुद्धि कातर हो गयी और विरह जनित दुःख व्याप्त हो गया वे लम्बी लम्बी साँसे लेने लगे। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि श्रीलालजी की ऐसी प्रेम विह्वल दशा देखकर उदार हृदया श्रीप्रियाजी ने उन्हें अपनी भुजलताओं से आकर्षित करके अपने हृदय के बीच ले लिया। उस समय दोनों के मिलन में जो भी कुछ आनन्द उत्पन्न हुआ, (वह अवर्णनीय है, उसका केवल इतने से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि) उस सुख की विस्मृति में सन्ध्या तो त्रुटि लव मात्र समय जैसी हो गयी, (अर्थात् काल जाते पता न लगा और बहुत सा समय बीत कर फिर से दूसरी सन्ध्या आ लगी।) टिप्पणी – यह पद रति विहार भावना का बड़ा ही सूक्ष्म एवं गम्भीर परिचायक है। इसमें वर्णित रस युगल किशोर रसिक सखि गण एवं रसिक उपासक जनों का जीवन प्राण है। यों तो सम्पूर्ण 'हित चौरासी' के पद इसी एक
हित चौरासी • • २२१ रस से ओत प्रोत हैं किन्तु इसमें जितने स्पष्ट और सरस रूप से किसी छटा की झाँकी कराई गयी है वह व्यञ्जना बड़ी ही अनोखी और अभूत पूर्व है। इस पद में रस के प्रकाश एवं विकास में श्रीहिताचार्य्य चरण ने जिस कुशल शैली का अनुवर्त्तन किया है वह अद्वितीय है। अस्तु; इसमें वर्णित विषय गोप्य है अतः इसका वर्णन कथन, श्रवण सब कुछ मौन में ही है। यह हृदय में ही अनुभव करने की वस्तु है. श्रीनागरीदासजी कहते हैं- चरचा करी कैसे जाय? बात जानत कछुक हम पै कहत जिय थरराय।। मौन में ही कहनि ताकी सुनत श्रोता नैन। सोऽब नागर लोग बूझत कहि न आवत बैन।। कितनी अटपटी है इस रस की भाषा? मौन में कथन और नयन हैं श्रोता ? जिस प्रकार यह गोप्य है, उसी प्रकार गूढ़ भी इतना है कि इसे प्रकाश करने में श्रोत्रिय और रस निष्ठ सभी महानुभाव असमर्थ हैं, किसी न किसी कारण से। फिर भी कृपालु महानुभावों ने अभिलाषी उपासकों को प्रकाश अवश्य दिया है। श्रीहित ध्रवदासजी ने इस रस विलास की ओर जो इङ्गित किया है उससे इस रस के हृदयङ्गम करने में सहायता मिलेगी अवश्य। वे कहते हैं- प्रेम मदन के सिंधु द्वै बहत रहत दिन हीय। कबहुँ विवस चेतत कबहुँ छिन छिन प्यारी पीय।। छिन छिन प्यारी पीय मधुर रस बिलसत ऐसे। सूच्छम प्रेम की बात कहौ कोऊ बरनै कैसे।। यह सुख सखियन बाँट पर्यौ भूले ध्रुव सब नेम। इक रस फूलीं फिरतिं सँग पाइ माधुरी प्रेम।। अस्तु; इस रस की दुरूहता, गम्भीरता, उत्कृष्ट्ता, अलौकिकता, एवं लोक वेदातीत भावना को लक्ष्य में रखकर प्रकाशन करने में समर्थ रहने पर
२२२ • • हित चौरासी भी प्रकाशित न करने की ही आज्ञाएँ सर्वत्र हैं। एक स्थल पर चाचा श्रीहित वृन्दावन दासजी ने आज्ञा दी है- होइ भावना सिद्ध ताहि उर अंतर राखै। मरमी हू सौं बात कछू मित ही की भाखै।। धरमी मरमी बिना कहै तो टोटो परिहै। विमुख करें उपहास चित्त-भावुक जु विगरिहै।। प्रानन प्यारी वस्तु दुरायें डोलैं जतननि। विमुख कूँजरनि हाथ गहावै जनि रस रतननि।। अतः रसिक उपासक का धर्म है कि इस दिव्य रस सार रति विहार का अपने हृदय में अनुभव करके गोप्य ही रखे, बिना अधिकारी के किसी अन्य को इसे न दे, न दे। — ६७ — अवतरण-श्रीहित सजनी अपनी सखियों से परम सौन्दर्यमयी, रूप लावण्यमती श्रीप्रियाजी के नख शिख शृङ्गार का वर्णन करती हैं- कल्याण मूल- रुचिर राजत वधू कानन किसोरी। सरस षोडस कियें, तिलक मृगमद दियें, मृगज लोचन उबटि अंग सिर खोरी।। गंड पंडीर मंडित चिकुर चंद्रिका, मेदिनि कबरि गुंथित सुरंग डोरी। श्रवन ताटंक कै, चिबुक पर बिंदु दै, कसूँभी कंचुकी दुरै उरज फल कोरी।। वलय कंकन दोति, नखन जावक जोति, उदर गुन रेख पट नील कटि थोरी। सुभग जघन स्थली क्वनित किंकिनि भली, कोक संगीत रस सिंधु झक झोरी।।
हित चौरासी • • २२३ विविध लीला रचित रहसि हरिवंश हित; रसिक सिरमौर राधा रमन जोरी। भृकुटि निर्जित मदन मंद सस्मित वदन, किये रस विवस घन स्याम पिय गोरी॥६७॥ भावार्थ - "हे सखि ! श्रीवृन्दा कानन की नव वधू किशोरी बड़ी भली शोभित हो रही है। उनके अङ्ग उबटन से उवट कर रस पूर्ण सोलहों शृङ्गार से पूर्ण किये गये हैं। ललाट पर कस्तूरी का तिलक और सिर पर खोरी शोभित हैं उनके स्वाभाविक सुन्दर मृग छौने से लोचन हैं। युगल किशोर पण्डीर (केशर कस्तूरी पङ्क) से आभूषित-सज्जित हैं। केशों की चन्द्रिका मेदिनि के पुष्पों से गूँथी गयी है तथा कबरी सुरङ्ग डोरी से आबद्ध (बँधी) है। उन्होंने अपने कानों में कर्णफूल धारण करके, ललित चिबुक पर (श्याम) विन्दु धारण किया है; और उनकी कसूँभी चोली में परम सुन्दर उरज फलों की किनारे मात्र ही ढँकी हैं। (बाहुओं में) बाजूबन्द, कलाइयों में कङ्कण की प्रभा और नख मणियों में महावर (जावक) की ज्योति छा रही है। उदर में वलखाती हुई तीन रेखाएँ (त्रिवली) हैं, उन्होंने अपनी अत्यन्त क्षीण कटि पर नील पट धारण कर रखा है एवं सुन्दर सुभग जघन प्रान्त में कोक राग रागनियों की गायिका जैसी झनकार वाली करधनी शोभा पा रही है। स्पष्ट है कि यह किङ्किणि सुरत रस के समुद्र में अवश्य सराबोर हो चुकी है।" • श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु पाद सखी रूप से) कहते हैं- यह श्रीराधा रमण श्रीलालजी की, रसिक शिरोमणि जोड़ी है। यह (एकान्त कुञ्ज में) अनेक अनेक रस लीलाओं की रचना करती रहती है और इसने अपनी भृकुटियों से तो मदन को जीत लिया है और मन्द मुसकान से इस युवती (गोरी) ने प्रियतम घनश्याम (श्रीकृष्ण) को रस विवश कर रखा है। टिप्पणी-"सरस षोडस" शृङ्गार रस में सोलह शृङ्गारों का स्थान बहुत ऊँचा है। इनका वर्णन विद्वानों के मतों में कुछ अन्तर से पाया जाता है। पिछले प्रसङ्ग में केशव कवि के मत से सोलह शृङ्गार लिखे गये हैं। यहाँ रसिक महात्मा श्रीभगवत रसिक जी के मतानुसार सोलह शृङ्गारों के केवल नाम मात्र दिये जाते हैं-
२२४ • • हित चौरासी सुचिता, सील, सनेह गति, चितवन, हास, विलास। कच गूँथनि, सीमंत सुभ, भाल तिलक सुख रास॥ भाल तिलक सुख रासि, दृगनि अंजन अति सोहै। बीरी वदन, सुदेस चिबुक मुसिकन मन मोहै॥ जावक, मँहदी, अंग राग, भगवत, नित रुचिता। ये सोरह श्रृंगार मुख्य तामैं वर सुचिता॥
- ६८ - अवतरण-इस पद में युगल किशोर के एकान्तिक रास नृत्य का वर्णन किया गया है। शरद की सुन्दर रात्रि में रसिक युगल किशोर ने रास क्रीड़ा की योजना की है। नाना प्रकार के वाद्य बज रहे हैं और युगल किशोर आनन्द मग्न होकर नृत्य कर रहे हैं। नृत्य की विविध प्रकार की गतियाँ लेते और घन दामिनि की भाँति एक मेक हो जाते हैं। श्रीहिताचार्य्य महाप्रभु इस रास रसोत्सव का वर्णन करते हैं- कल्याण मूल- रास में रसिक मोहन बने भामिनी। सुभग पावन पुलिन सरस सौरभ नलिन, मत्त मधुकर निकर सरद की जामिनी॥ त्रिविध रोचक पवन ताप दिनमनि दवन, तहाँ ठाढ़े रमन संग सत कामिनी। ताल बीना मृदंग सरस नाचत सुधंग; एक ते एक संगीत की स्वामिनी॥ राग रागिनि जमी विपिन वरसत अमी, अधर बिंबनि रमी मुरलि अभिरामिनी। लाग कट्टर उरप सप्त सुर सौं सुलप लेति सुंदर सुघर राधिका नामिनी॥ तत्त थेई थेई करत गतिव नौतन धरत, पलटि डगमग ढरति मत्त गज गामिनी।
हित चौरासी • • २२५ धाइ नवरँग घरी उरसि राजत खरी; उभय कल हंस हरिवंश घन दामिनी॥६८॥ भावार्थ-आज रसिक मोहन और भामिनि श्रीराधा रास में शोभित हैं। सुन्दर और पवित्र यमुना का पुलिन है शरद् की रात्रि है। कमल की सरस सुगन्ध से भ्रमरों के समूह के समूह मतवाले हो रहे हैं; वैसा ही रुचिकारक त्रिविध पवन वह रहा है जो दिन मणि सूर्य के ताप का दमन करने वाला है। उस पुलिन पर रमण श्रीकृष्ण अपने साथ शत शत कामिनियों को लिये खड़े हैं। बड़ी सरसता पूर्वक ताल, वीणा, मृदङ्ग आदि बज रहे हैं और सब मिलकर सुधङ्ग नृत्य कर रहे हैं। उन कामिनियों में से प्रत्येक एक से बढ़कर एक राग सङ्गीत की अधिष्ठाता प्रधान हैं। वहाँ राग रागिनियों का पूर्ण जमाव है जिससे वन में मानों अमृत(रस) बरस रहा है, और श्याम सुन्दर के अधरों पर परम सुन्दर मुरली विराज रही है। मुरली के सप्त स्वरों के साथ सुन्दरी 'राधा' नामक (कोई अनिर्वचनीय) कामिनि लाग, उरप, कट्टर, तिस्प आदि गतियों के साथ सुलप ले रही है। कभी तो वह तत्ता थेई-थेई' करती हुई नवीन गतियों को धारण करती है एवं कभी मत्त गज गामिनि की भाँति पलट कर (उलटी ओर लौटकर) डगमगाती ढलती हुई आ जाती है। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि (उस समय उस नृत्य परायणा प्रिया को) प्रियतम ने लपक कर शीघ्रता पूर्वक पकड़ लिया, तब प्रिया भी उनके हृदय से लिपट कर बड़ी शोभित हुईं। (शोभित क्यों न हों, क्योंकि दानों ही (केलि सरोवर के) सुन्दर हंस हैं; किंवा केलि रूप आकाश के विद्युत और वारिद हैं न !
- ६९ - अवतरण-पुनः उपरोक्त पद्धति से रास क्रीड़ा का ही सरस वर्णन करते हैं- कल्याण मूल-मोहिनी मोहन रंगे प्रेम सुरंगे, मत्त मुदित कल नाचत सुधंगे।
हित चौरासी • • २३३ क्या नहीं है इन नयनों में? अमृत है, विष है और है उन्मत्त बना देने वाली मदिरा भी। तभी तो ये श्वेत हैं, श्याम हैं और अरुणिम हैं, इसीलिये इनका घायल जीता है, मरता है और झुक झुक पड़ता-झूम झूम जाता है। – ७४ – अवतरण – मानवती श्रीप्रियाजी को प्रियतम के समीप ले आने के लिये हित सखी ने समझाया, 'प्रिय राधे ! तुम अब मान छोड़कर प्रियतम के निकट चलो ! देखो, तुम्हारे बिना उनकी दशा कुछ अच्छी नहीं है। वे मुरली में यदि कुछ गाते हैं तो केवल तुम्हारा नाम। इस समय वे तुम्हारे स्वरूप में ही तन्मय से हो रहे हैं.....।" हित सखी ने फिर कहा- कान्हरौ मूल-काहे कौं मान बढ़ावतु है बालक मृग लोचनि। हौंब डरनि कछु कहि न सकति इक बात सँकोचनि।। मत्त मुरली अंतर तव गावत जागृत सैन तवाकृति सोचनि। (जै श्री) हित हरिवंश महा मोहन पिय आतुर विट विरहज दुख मोचनि।।७४।। भावार्थ – "हे मृग छौनों से नेत्र वाली मानिनि ! व्यर्थ मान क्यों बढ़ा रही हो? मान जाओ ! मैं तुमसे इस समय एक बात कहना चाह कर भी सङ्कोच वश नहीं कह पा रही हूँ (अर्थात् प्रियतम की दशा कुछ ऐसी है जिसका जिह्वा पर लाना ही ठीक नहीं; वे अत्यन्त व्याकुल हैं यहाँ तक कि जीवन से भी निराश हो चुके हैं। मैं कैसे कहूँ भविष्य की बात कि क्या होगा ? कितनी अमङ्गल पूर्ण है वे बातें ।) वे उन्मत्त हुए मुरली में और अपने हृदय में भी केवल तुम्हारा ही गान करते एवं सोते जागते प्रत्येक दशा में तुम्हारी ही मुखाकृति का चिन्तन करते रहते हैं।" श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद (सखी रूप से) कहते हैं-हे प्यारी राधे ! आप महा मुग्ध एवं प्रेमातुर लम्पट-रसिक प्रियतम के विरह जनित दुःख का विनाश करने वाली हैं (तब आप अपना यह गुण प्रकट क्यों नहीं करतीं ?)
२२६ • • हित चौरासी सकल कला प्रवीन कल्यान रागिनी लीन, कहत न बनै माधुरी अंग अंगे।। तरनि तनया तीर त्रिविध सखी समीर। मानौं मुनी व्रत धरयौ कपोती कोकिला कीर।। नागरि नव किसोर मिथुन मनसि चोर। सरस गावत दोऊ मंजुल मंदर घोर।। कंकन किंकिनि धुनि मुखर नूपुरनि सुनि। (जै श्री) हित हरिवंश रस वरषत नव तरुनि॥६९॥ भावार्थ-प्रेम के सुन्दर रङ्ग से भीने मोहिनी मोहन (युगल किशोर) प्रेमोन्मत्त हुए प्रसन्नता पूर्वक सुहावन सुधङ्ग नृत्य नाच रहे हैं। दानों समस्त कलाओं में प्रवीण हैं और (इस समय नृत्य करते हुए) कल्याण रागिनि में लीन-तन्मय- हो रहे हैं जिससे उनके अङ्ग प्रत्यङ्गों की माधुरी कुछ कहते ही नहीं बनती। अरी सखी ! तरणि तनया यमुना के तीर पर जहाँ त्रिविध पवन बह रहा है, (रास और गान से मुग्ध होकर) कपोली, कोयल और तोते आदि पक्षियों ने तो मानो मुनि व्रत (मौन) धारण कर रखा है। परम सुन्दर नागरी और किशोर-दोनों एक दूसरे के चित्त चोर हैं अतः परस्पर चित्तों को चोरी करते हुए मधुर स्वरों में कभी उच्च और कभी मन्द मन्द गान गाते हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं कि उस समय रास नृत्य में कङ्कण, किङ्किणियों की मधुर मधुर ध्वनि सुनकर रसमयी नव तरुणि श्रीराधा रस का वर्षण करती हैं, अद्भुत प्रेम विलास का प्रकाश करती हैं। — ७० — अवंतरण – श्रीवृन्दावन के मञ्जुल निकुञ्ज भवन में आज रात्रि में युगल किशोर की रति विलास केलि परम आनन्द पूर्वक सम्पन्न हुई है। प्रातः काल श्रीहित सखी ने निकुञ्ज भवन में प्रवेश किया है। युगल के श्रीअङ्गों में रति विहार के अनेकों चिह्न (लक्षण) शोभा पा रहे हैं। रति विहार के श्रम से श्रीप्रियाजी थकित, आलस्य युक्त और विस्मृता सी हैं, उनकी देह दशा अस्त व्यस्त सी है। श्रीप्रियाजी की यह दशा देखकर श्रीहित सखी को जो सुख हुआ सो तो हुआ ही
हित चौरासी • • २२७ समस्त सहचरि परिकर को भी अपार सुख मिला वे सब युगल किशोर को प्रेमाशीष देने लगीं क्योंकि सब तत्सुख मयी हैं न? इस पद में सखियों कें तत्सुखित्व और युगल किशोर के रति विलास की रस पूर्ण झाँकी है- कल्याण मूल-आजु सँभारत नाँहिन गोरी। फूली फिरत मत्त करिनी ज्यौं सुरत समुद्र झकोरी।। आलस वलित अरुन धूसर मषि प्रगट करत दृग चोरी। पिय पर करुन अमी रस वरषत अधर करुनता थोरी।। बाँधत भृंगं उरज अंबुज पर अलकनि बंध किसोरी। संगम किरचि किरचि कंचुकि बँध सिथिल भई कटि डोरी।। देति असीस निरखि जुवती जन जिनकें प्रीति न थोरी। (जै श्री) हित हरिवंश विपिन भूतल पर संतत अविचल जोरी।।६०।। भावार्थ – आज गोरी (राधिका) अपने आपको सम्हाल भी नहीं पा रही है और सुरत समुद्र में झँकोरी (डूबी) मतवाली करिणि की भाँति फूली फिरती है। आलस्य से झँपते हुए नयन अरुण तो हैं ही साथ ही कज्जल से मलिन भी हो रहे हैं जो (रात की) चोरी को मानो प्रकट कर रहे हैं। प्रियतम पर करुणा रूप अमृत रस की वृष्टि करती रहती है न, इसीसे अधरों पर कुछ न्यून सी ही अरुणिमा शेष रह गयी है (अर्थात् उन्होंने प्रियतम को अधरामृत का पान कराया है इससे अधर निरङ्ग हो गये हैं।) आज किशोरी अपने अलक बन्धनों से उरोज कमलों पर भृङ्गों को बाँध रही है (अर्थात् श्रीराधा अपने उरोज कमल और अलक बन्धनों से प्रियतम श्रीकृष्ण के मन भ्रमर को बाँध रही हैं-श्रीकृष्ण इस सौन्दर्य पर मुग्ध हैं।) प्रेम मिलन के प्रवाह और सङ्गम में चोली के समस्त बन्धन टूट चुके हैं और कटि की डोरी-नीबी भी शिथिल हो चुकी है। श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभुपाद कहते हैं कि जिनके हृदय में थोड़ी नहीं वरं अत्यन्त प्रीति है, ऐसी प्रेममयी नव युवति जन-सखियाँ इन (समसी राधिका) को देखकर आशीष देती हैं कि यह जोड़ी भूतल स्थित श्रीवृन्दावन में सर्वदा अविचल रहे-सदा विराजमान् रहे।
२२८ • • हित चौरासी
- ७१ - अवतरण - इस पद में भी शारदीय रात्रि के रसमय दिव्य रास रसोत्सव का वर्णन है। श्रीहित सखीजी अपनी सखियों से कह रही हैं- कल्याण मूल- स्याम सँग राधिका रास मंडल बनी। बीच नँदलाल ब्रजबाल चंपक बरन, ज्यौंध घन तडित बिच कनक मरकत मनी॥ लेति गति मान तत्त थेई हस्तक भेद, स रि ग म प ध नि ये सप्त सुर नंदिनी। निर्त्त रस पहिर पट नील प्रगटित छबी, वदन जनु जलद में मकर की चंदिनी॥ राग रागिनि तान मान संगीत मत, थकित राकेस नभ सरद की जामिनी। (जै श्री) हित हरिवंश प्रभु हंस कटि केहरी, दूरि कृत मदन मद मत्त गज गामिनी॥७१॥ भावार्थ - रास मण्डल के बीच में राधिका श्याम सुन्दर के साथ शोभित हैं आस पास अनेकों चम्पक वर्णी ब्रज बालाओं के बीच बीच में अनेकों नन्दलाल हैं (जिससे ऐसी छटा प्रकट होती है) जैसे मेघ और दामिनियों के मण्डल के बीच में (कोई नील पीत ज्योतिपूर्ण) स्वर्ण और मरकत मणि शोभा पा रहे हों। नृत्य में सभी मान पूर्ण गतियाँ लेते और मुख से 'तत्ता थेई' कहते हुए हाथों से हाव भावों के भेद भी दिखाते जाते हैं। 'स रि ग म प ध नि' इन सात स्वरों में (यथाक्रम) गान करते हुए आनन्दित होते हैं। नीली सारी पहिन कर श्रीराधा ने (नाचते हुए) सम्पूर्ण नृत्य रस को प्रकट कर दिया है, उस समय की उनकी ऐसी मुख छवि प्रकट हो रही हैं, जैसे बादलों के बीच में मकर राशि की चाँदनी। श्रीहित हरिवंशचन्द्र कहते हैं इस शरद निशा में रास के अवसर पर राग रागिनियों की तानें, उनके यथोचित उतार चढ़ाव के प्रमाण और भेदों को
हित चौरासी • • २२६ देखकर आकाश में चन्द्र देव थकित हो गये, आगे न बढ़ सके। इस प्रकार लीला सरोवर के हंस रूप सिंह जैसी कटि वाली एवं मत्त गज गामिनि मेरी स्वामिनि श्रीराधा ने मदन के मद को दूर कर दिया।
- ७२ - अवतरण—इस पद में शारदीय विहार के साथ-साथ शय्या विहार का भी वर्णन है। श्रीहित सखी अपनी सखियाँ से कहती हैं— कान्हरौ मूल—सुंदर पुलिन सुभग सुख दाइक। नव नव घन अनुराग परस्पर खेलत कुँवर नागरी नांइक।। सीतल हंस सुता रस बीचिनु परसि पवन सीकर मृदु वरषत। वर मंदार कमल चंपक कुल सौरभ सरसि मिथुन मन हरषत।। सकल सुधंग विलास परावधि नाचत नवल मिले सुर गावत। मृगज मयूर मराल भ्रमर पिक अदभुत कोटि मदन सिर नावत।। निर्मित कुसुम सैन मधु पूरित भाजन कनक निकुंस विराजत। रजनी मुख सुख रासि परस्पर सुरत समर दोऊ दल साजत।। विट कुल नृपति किसोरी कर धृत, बुधि बल नीबी बंधन मोचत। 'नेति नेति' वचनामृत बोलत प्रनय कोप प्रीतम नहिं सोचत।। (जै श्री) हित हरिवंश रसिक ललितादिक लता भवन रंध्रनि अवलोकत। अनुपम सुख भर भरित विवस असु आनँद वारि कंठ दृग रोकत।।७२।। भावार्थ—युगल किशोर नागरी-नायक पारस्परिक घनीभूत एवं नवीन नवीन अनुराग से भरे हुए परम रमणीय और सुखदायक यमुना के सुन्दर पुलिन पर रास रस खेल रहे हैं वायु सूर्य कन्या यमुना की रस पूर्ण शीतल लहरियों का स्पर्श कर करके कोमल कोमल जल फुँहारों की वर्षा कर रहा है और मन्दार, कमल और चम्पक आदि श्रेष्ठ पुष्प समूहों का सौरभ युगल किशोर के मन को हर्षित कर रहा है। युगल किशोर नृत्य की समस्त कलाओं और विलासों की अन्तिम सीमा है, वे नये-नये स्वरों में गाते और मिल कर नाचते भी हैं; जिसे देख देख कर वन के मृग छौने, मोर, हंस, भौंरे और
२३० • • हित चौरासी कोयल तो कोयल कोटि कोटि अद्भुत कामदेव भी लजाकर अपना सिर झुका देते हैं मानों सब अपने अपने गुणों की हार स्वीकार कर लेते हैं। इधर निकुञ्ज भवन के भीतर सखियों ने पुष्प शय्या रच रखी है; समीप ही मधुर आसवों से भरे हुए अनेकों कनक घट विराज रहे हैं। सन्ध्या का समय है। दोनों सुख राशि नव किशोर पारस्परिक सुरत युद्ध के लिये अपनी अपनी (मदन) सेनाएँ सजा रहे हैं। युद्ध के समय लम्पटों के शिरोमणि रूप प्रियतम किशोरी श्रीराधा के करों को अपने कर से पकड़ कर अपने बुद्धि–बल प्रयोग से उनका नीवी बन्धन खोलना चाहते हैं तब प्रियाजी "नहीं ! नहीं !! ऐसे अमृत मय शब्द कहतीं और कुपित होती हैं, पर उनके इस कोप को प्रणय कोप समझ कर प्रियतम उसकी कोई परवाह ही नहीं करते– अपने प्रयत्न में आगे बढ़ते ही जाते हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं कि रसिक ललिता आदि सखियाँ कुञ्ज भवन के छिद्रों से लगीं (इस रस विलास का) दर्शन कर रही हैं और अनुपम सुख के परिपूर्ण प्रवाह में पड़कर विवश हो रही हैं (किन्तु अपने द्वारा युगल सरकार के सुख में किसी प्रकार भी विक्षेप न आने देने के लिये; प्रेम से निकलते हुए अपने) प्राण और प्रेमाश्रुओं को कण्ठ और आँखों में ही रोक लेती हैं; (क्योंकि प्राण और आँसुओं के निकल जाने के पश्चात् यह बात छिपी न रह सकेगी और इससे अभी तत्क्षण उनके सुख में–क्रीड़ा में एक महान् अन्तराय अवश्य आ जायगा। ऐसा उनका भाव है।)
- ७३ - अवतरण – श्रीराधा के नयनों में अनन्त सौन्दर्य है और अनन्त माधुर्य, औदार्य, वशीकरण और सम्मोहन भी। दूसरे का सर्वस्व अपहरण करते इन नयनों को न दया है न किसी प्रकार का भय ही। किन्तु इनमें अपार करुणा, दया, कोमलता, उदारता और सरसता भी है अपने जनों के लिये। इन नयनों की दया–भीख माँगती हुई श्रीहित अलिजी कहती हैं–
हित चौरासी • • २३१ कान्हरौ मूल-खंजन मीन मृगज मद मेंटत, कहा कहौं नैननि की बातैं। सुनि सुंदरी कहाँ लौं सिखईं, मोहन बसीकरन की घातैं।। बंक निसंक चपल अनियारे, अरुन स्याम सित रचे कहाँ तैं। डरत न हरत परायौ सर्वसु; मृदु मधुमिव मादिक दृग पातैं।। नैंकु प्रसन्न दृष्टि पूरन करि, नहिं मोतन चितयौ प्रमदा तैं। (जै श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनि, भावै सो करहु प्रेम के नातैं।।७३।। भावार्थ – (श्रीहित अलि ने कहा- "हे राधे!) मैं तुम्हारे नयनों की क्या बातें कहूँ ये तो खंजन, मीन एवं मृग छौनों का भी मद चूर चूर कर रहे हैं। हे सुन्दरि! सुनो तुमने मोहन को अपने वश में कर लेने के लिये कितनी कितनी युक्तियाँ सोच रखी हैं ? (उन अनेक युक्तियों में से नयनों की सुन्दरता भी एक युक्ति है।) अरी ! तुमने ये तिरछे, नुकीले, चञ्चल, और वेखटक (निडर) इसी तरह अरुनारे, श्याम और स्वेत (वर्णों से युक्त) नयन कहाँ से बनाकर तैयार कर लिये? इन लोचनों की मीठी मदिरा जैसी मद पूर्ण चोटों से दूसरे का सर्वस्व अपहरण करते तुम्हें डर भी नहीं लगता?" हे प्रमोद मयी प्रमदे ! तुमने आज तक कभी मेरी ओर प्रसन्नता पूर्वक प्रेम पूर्ण दृष्टि से तनिक भी नहीं देखा ! (अतः ऐसी दृष्टि से देख देना तो उचित ही है पर यदि न देखना चाहो तो) तुम्हारी इच्छा ! जो चाहो सो करो ! हे हंस कल गामिनि! प्रेम के नाते से हमें यह सब स्वीकार है। टिप्पणी – इस पद में श्रीप्रियाजी के नेत्रों के सौन्दर्य्य की अनुपम रीति से वर्णना है। इन परम सौन्दर्य्य मयी प्रियाजी के रूप के एक कण मात्र का भी वर्णन करने में समस्त कवि कुल मण्डली अपना सिर झुका देती है-असमर्थता प्रकट कर देती है फिर रस के तीव्र आयुध आपके नयनों का वर्णन कर ही कौन
२३२ • • हित चौरासी सकता है जो सौन्दर्य की निधि, माधुर्य्य के भण्डार, आकर्षण के केन्द्र और अनन्त गुणों के आगार हैं। हाँ, अनुभवीऔर सूक्ष्म प्रज्ञाशील रसिक सन्तों ने उनके सम्बन्ध में जो अल्प मात्र सङ्केत सा किया है वही हमें उस अनुपम रस राशि की ओर प्रेरित करता है। ऐसा एक सङ्केत श्रीध्रुवदास जी ने किया है उन नयनों की वेधन शक्ति की ओर— नैंकु चितै तिरछे मुसकानी। लालहिं सुधि बुधि सबै भुलानी॥ बसी जु प्यारे लाल उर, वह चितवनि मुसकानि। तबते कबहुँ छुटी नहिं, बसी जु उर में आनि॥ एक बार जो चितवन की मुसकान श्रीलालजी के हृदय में बस गयी, सो बस गयी, फिर कभी न निकली। कितनी विचित्र वेधन शक्ति है इन नयनों में ? जिस ओर यह चितवन मुसकान जा गिरती है रूप की वर्षा सी कर देती है— बड़े बड़े उज्ज्वल सुरंग अनियारे नैना, अंजन की रेख हेरैं हियरौ सिरात री। चपलाई खंजन की, अरुनाई कंजन की, उजराई मोतिन की पानिप लजात री॥ सरस सलज्ज नये रहत हैं प्रेम भरे, चंचल न अंचल में कैसैहूँ समात री। 'हित ध्रुव' चितवन छटा जेहिं कोद परै, तेहि ओर बरसा सी रूप की ह्वै जात री॥ —श्रीहित ध्रुवदासजी यह वह चितवन है जिसका घायल जीता तो है पर मृत जैसा रहकर और मर जाने पर भी जीता रहता है उसके रूपामृत का पान करके। इस प्रकार वह जीवित और मृत के बीच बीच की स्थिति में पड़ा लूमता झूमता रहता है मदिरा पीने वाले की तरह। कितने गुण और अवगुणों से भरे हैं ये नयन— अमी हलाहल मद भरे स्वेत स्याम रतनार। जियत मरत झुकि झुकि परत जेहिं चितवत इक बार॥ —बिहारी
२३४ • • हित चौरासी टिप्पणी – मानिनि नायिका श्रीप्रियाजी के वियोग में प्रियतम श्रीलालजी अत्यन्त दुःखी एवं विरह कातर हैं। सखी उनकी दशा देख कर आई है और वही सब बातें श्रीप्रियाजी से कह रही है। सखी ने कहा- "प्यारी ! वे श्याम सुन्दर तो अब आपके वियोग में प्रणय निराशा के साथ साथ जीवन से निराश हो चुके हैं। मैं सङ्कोच एवं भय वश कुछ कह नहीं सकती किन्तु दशा है ही कुछ ऐसी वे मुख में तुम्हारा नाम और हृदय में तुम्हारे ध्यान के रहने से ही अब तक जीवन धारण करने में समर्थ हो सके हैं। जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति प्रत्येक दशा में केवल 'राधा हा राधा ! रटते रहते हैं। यह दूतिका सखी प्रियतम श्रीलालजी की दशा देख कर आयी थी, उसे मालूम था कि प्रियतम की विरह व्यथा वियोग की अन्तिम स्थिति के सन्निकट है किन्तु फिर भी वह कहे कैसे अपने मुख से भावी अमङ्गल के अशुभ शब्द ? वह हेर फेर करके केवल इतना ही कह पाती है- 'मृग शावक लोचनि। अब मान बढ़ाने का समय रहा नहीं। इसका परिणाम क्या होगा जानती हो ? मैं भय वश उसे कह नहीं सकती पर तुम समझ सको तो समझो ? मैंने उनकी जो दशा देखी है मुझे उसका भय है और सङ्कोच लगता है। मानिनि ने सखी की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया तब उसने फिर कहना प्रारम्भ किया “करुणामयि राधे ! तुम सोचो तो सही क्या होगी उनकी दशा ? वे प्रेमोन्मत्त हुए मुरली में केवल आपका ही नाम गा रहे हैं। वे चिन्तन करते हैं तो आपके रूप का। उन्हें सिवाय आपके नाम, गुण लीला गायन के और कुछ मानों रुचता ही नहीं है। उन्हें विश्व प्रपञ्च से कोई प्रीति तो रही नहीं वरं उन्हें अपने आप की भी सुधि नहीं रह गयी है। उनकी उस मन मोहन दशा का कैसे वर्णन करूँ ? प्रिये ! वे प्रेम की आतुरता से प्रेम लम्पट से बन बैठे हैं। उन्हें अब प्यास है तो आपके प्रेम की। इस प्रेम के समक्ष अब उन्हें अन्य कुछ प्रिय रह ही नहीं गया है। उनका जीवन केवल आपके आधीन.....।" सखी से आगे की बात न कही गयी। वह श्रीप्रियाजी के लिये एक गम्भीरार्थ पूर्ण सम्बोधन देकर रह गयी जिससे उसके आन्तरिक भावों की पूर्ण अभिव्यक्ति हो रही थी। उसने कहा- “महा मोहन प्रियतम आतुर लम्पट श्रीलाल की दुख मोचनि।”
हित चौरासी • • २३५ उसने सम्बोधन में ही अपना तात्पर्य प्रकट कर दिया। कण्ठावरोध या प्रेमाधिक्य वश वह अपना आशय स्पष्ट न कर सकी। क्योंकि अत्यन्त विरह में जिस अमङ्गल की भयानक भावना का निवास है उसे 'हित रूपा' सहचरि कैसे अपनी जिह्वा पर ला कहती, उसका चुप होकर दो आँसू रो देना ही पर्याप्त था। इस पद में अव्यक्त व्यञ्जना से श्रीलालजी एवं सखी के प्रेम की बड़ी गम्भीर झाँकी करायी गयी है। यहाँ 'अमङ्गल' शब्द से दुःखी होने या चौंकने की भी आवश्यकता नहीं है कि महामङ्गल मय श्रीलालजी के लिये यह अमङ्गल शब्द क्यों और कैसे ? प्रेम की अत्युच्च स्थिति या विशेष भावों का प्रकाशन करने के लिये ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है जो उचित है। देखिये, श्रीकृष्ण दर्शन से श्रीराधा के मूर्च्छित हो जाने पर उनकी सखी नन्द भवन में जाकर उलाहना दे रही है। उसके शब्दों में क्या भाव हैं- जागिहै, जीहै तो जीहैं सबै, नतु पीहैं हलाहल नंद के द्वारैं। अर्थात् ("वह राधा मूर्च्छा से) जागकर जी उठेगी तो ही हम भी जीती रहेंगी अन्यथा (उनके मरणोपरान्त) हम सभी नन्द राय के द्वार पर बैठ कर विष पी लेंगी और मर जावेंगी।" उसने स्पष्ट कह दिया कि यदि श्रीराधा का जीवन न रहा तो हम भी अपना जीवन न रखेंगी। 'हित चौरासी' में श्रीहिताचार्य पाद ने भी मान के अवसर में दूतिका के मुख से नायक की दशा का वर्णन कराते हुए इसी प्रकार के भाव का प्रकाश किया है- वे तौऽब गनत जीवन यौवन तब 'हित हरिवंश हरि भजहि भामिनि जौ। अर्थात् 'वे (प्रियतम श्रीकृष्ण) अपने जीवन और यौवन को तब कुछ गिनेंगे जब आप जाकर उनसे मिलेंगी, अन्यथा नहीं। यहाँ जीवन की गणना न करने का वही अर्थ है जो अमङ्गल मय कही जा सकती है जिसके लिये दूतिका ने मूल पद में कहा है- हौंऽब डरनि कछु कहि न सकत इक बात सँकोचनि।
२३६ • • हित चौरासी यहाँ सङ्कोच वश न कह सकने योग्य केवल इतनी ही बात थी कि आपके विना वहाँ कितना बड़ा अमङ्गल हो सकता है उसकी कल्पना भी मेरे लिये हृदय विदारक है, जहाँ प्रेमोदय के सात्विक अनुभावों का वर्णन हैं वहाँ स्तम्भ, स्वेद, रोमाञ्च, स्वर भङ्ग, कम्प, वेपथु, वैवर्ण्य, अश्रु, प्रलय एवं मूर्च्छा आदि सभी हैं। इसी प्रकार विरह में अभिलाषा, चिन्ता, स्मरण, गुण कथन, उद्वेग, प्रलाप व्याधि, उन्माद, जड़ता, मूर्च्छा एवं मरण तक का वर्णन किया गया है। प्रेम एवं विरह के प्रत्येक लक्षण समय समय पर युगल किशोर एवं सखियों में सर्वदा देखे जाते हैं जिनका वर्णन श्रीराधा सुधानिधि, गीत गोविन्द, हित चौरासी, श्रीध्रुवदास कृत ग्रन्थावली और प्रेमरस के अनेक ग्रन्थों में यत्र तत्र पाया जाता है। वहाँ प्रत्येक स्थल पर मूर्च्छा एवं मरण का वर्णन प्रेम की पराकाष्ठा के परिचय रूप में है न कि अमङ्गल भावना से। यदि यह मूर्च्छा एवं मरण के लक्षण युगल सरकार जो प्रेम की अवधि हैं इनमें न होंगे तो होंगे कहाँ ? क्योंकि यही तो प्रेम की साकार मूर्त्ति हैं। श्रीहिताचार्य पाद ने अपने ग्रन्थों में जिस प्रेम तत्व का प्रकाश किया है, वह अत्यन्त सूक्ष्म, अवर्णनीय, अतर्क्य और केवल अनुभव गम्य है। इसमें प्रत्येक क्षण भावों की नई–नई तरङ्गैं उठती रहती हैं। इसमें मिलन है, वियोग है, विरह है, मान है, भ्रम है, काम है, क्रोध है, लोभ है, मोह है, मद है, घृणा है, उपेक्षा है, ईर्ष्या है, असूया है, अनादर है, अभाव है, कटुता है, त्रास है, पीड़ा है, मूर्च्छा है, प्रलय है और है मृत्यु। इसमें सब कुछ है। वह सब है जो कहीं नहीं है किन्तु यह सब होकर भी कुछ नहीं है, जिस रूप में इनकी व्याख्या संसार में की जाती है। यहाँ का सब कुछ केवल प्रेम है, विशुद्ध प्रेम। इसलिये अमङ्गल रूप से जिन भावों का प्रकाश सखी ने किया वह भी दिव्य प्रेम है। – ७५ – अवतरण – वृन्दावन के ऐकान्तिक कुञ्ज भवन में श्रीयुगल किशोर सुखमयी शय्या पर विराजमान् हैं पर प्रीति सन्मुख नहीं। प्रियतम प्रेमातुर एवं दीन हैं और प्रिया मान पूर्ण भावों के कारण रूठी सी। उन्होंने अपना श्रीमुख नीचा कर रखा है वे सतत् अपने चरण नखों की ओर निहारती और जाने क्या सोचतीं हैं, प्रियतम लालजी की ओर मानो देखना ही नहीं चाहतीं।
हित चौरासी • • २३७ श्याम सुन्दर ने उन्हें मना लेने की बहुत कोशिश की पर वे असफल ही रहे। अन्त में श्रीहित अलि उनकी ओर से प्रयत्न करने लगीं। उन्होंने श्रीप्रिया जी से बड़े ही मधुर और दीन शब्दों में कहा- कान्हरौ मूल-हौं जु कहति इक बात सखी, सुनि काहे कौं डारत? प्रानरमन सौं क्यौंऽब करत, आगस बिनु आरत।। पिय चितवत तुव चंद वदन तन, तूँ अधमुख निजु चरन निहारति। वे मृदु चिबुक प्रलोइ प्रबोधत, तूँ भामिनि कर सौं कर टारति।। बिबस अधीर विरह अति कातर, सर औसर कछुवै न विचारति। (जै श्री) हित हरिवंश रहसि प्रीतम मिलि, तृषित नैन काहे न प्रतिपारति।।७५।। भावार्थ - "हे सखि ! मैं तुमसे यह जो कुछ एक बात कह रही हूँ तुम उसे सुनकर भी टाल क्यों देती हो ? तुम विना कारण-विना अपराध ही अपने प्राण रमण (प्रियतम श्रीकृष्ण) को क्यों दुःखित कर रही हो ? वे तो एकटक तुम्हारे मुख चन्द्र की ओर देखते हैं और तुम अपना मुख नीचे झुकाये अपने चरणों की ओर देखती रहती हो ! (उनकी ओर एक बार भी दृष्टि तक नहीं करतीं !) भामिनि ! वे तो (अनुनय पूर्वक) तुम्हारे कोमल चिबुक में अपने कर कमल का स्पर्श कर कर के तुम्हें समझा रहे हैं और तुम (उपेक्षा पूर्वक) उनके हाथों को अपने हाथों से ठेल देती हो !" (स्वामिनि ! देखो, इस समय प्रियतम) विरह के कारण अत्यन्त अधीर और दुखी हैं तथा प्रेम विवश भी। तुम तो (कुछ ऐसी हो कि) मौका वे मौका कुछ भी नहीं विचरतीं (चाहे जब मान ठान बैठतीं और फिर मनाये भी नहीं मानतीं ।") श्रीहरिवंश चन्द्र (सखी रूप से) कहते हैं "हे राधे ! अब प्रसन्नता पूर्वक अपने प्रियतम से मिल कर उनके प्रेम प्यास एवं विरह से दुःखित नयनों का प्रतिपाल क्यों नहीं करतीं ? (अर्थात् उनके नयन आपका दर्शन करके और आपको अपने अनुकूल देखकर ही सुखी होंगे ।") टिप्पणी-इस पद में कुआन्तर मान न होकर सम्भ्रम मान का वर्णन है। युगल किशोर एक ही सुखद आसन पर सुख पूर्वक विराजमान थे। अकारण
२३८ • • हित चौरासी किसी भ्रम से श्रीप्रियाजी रूठ गयीं और प्रियतम की ओर से मुँह फेर कर पीठ देकर बैठ गयीं। उनके रूठते ही श्रीलालजी व्याकुल हो गये और वे उन्हें मनाने समझाने लगे हैं। जब कभी रूठी हुई प्रियाजी उठकर अन्य किसी कुअ में जा बैठतीं हैं तब उसे कुआन्तर मान या प्रवास मान भी कहते हैं। इस समय दोनों को प्रसन्न करके एकत्र कर देने और प्रीति उत्पन्न करा देने के लिये मध्यस्थ सखी-दूतिका की आवश्यकता होती है। सम्भ्रम मान के अवसर में चाहे दूतिका की आवश्यकता न हो पर अनुनय विनय, दीनता, अधिनता, नायक गुण, रूप प्रशंसा आदि की आवश्यकता तो तब भी होती है। उक्त पद में श्रीहित सजनी मध्या सखी के रूप में चाटुकार हैं, जो रूठी हुई मानिनि प्रिया के समक्ष नायक श्रीलालजी की ओर से अनुनय विनय के भाव उपस्थित कर रही हैं। – ७६ – अवतरण – श्रीवृन्दावन के अन्तर्भाग में एक अत्यन्त रहस्य मय सघन लता भवन है। वहाँ युगल किशोर एकान्तिक रूप से सुरत क्रीड़ा का उपक्रम कर रहे हैं। क्रीड़ा के लिये प्रेम मयी सखियों ने सुमन शैय्या रचकर तैयार कर दी है, जिस पर लाड़िली लाल रस मग्न हुए आसीन हैं। दोनों , दोनों की छबि माधुरी का अवलोकन कर कर के मनोज के मधुमय भावों में डूब रहे हैं। रात्रि का मध्य होने जा रहा है और रति विहार का मधुर प्रारम्भ। इस सुरत सुख का नित्य सुख लेने वाली श्रीहित सखी जी उसका वर्णन इस प्रकार करती हैं- कान्हरौ मूल-नागरीं निकुंज ऐंन किसलय दल रचित सैन, कोक कला कुसल कुँवरि अति उदार री। सुरत रंग अंग अंग हाव भाव भृकुटि भंग, माधुरी तरंग मथत कोटि मार री।