हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • २५ में सुख पूर्वक छः मास निवास करके व्यास मिश्र सपरिवार देव वन चले गये। हरिवंश चन्द्र का बाल्य काल एवं यौवन देव वन में ही बीता। 'होनहार विरवान के होत चीकने पात' के न्याय से श्रीहरिवंश के बाल्यकाल में ही अनेकों चमत्कार देखने में आये। केवल छः मास की अवस्था में "श्रीराधा सुधा निधि स्तव" का गान, तीन वर्ष की आयु में श्री प्रियाजी (राधा) की भावना-ध्यान सिद्धि श्रीराधा द्वारा प्रत्यक्ष भोग आरोगना, फूलमाला प्रसादी देना, नीलाम्बर उढ़ा देना, पाँच वर्ष की आयु में कुए में कूदकर अनन्त श्री ठाकुर रंगी लालजी का श्रीविग्रह निकालना (प्रकट करना) और उनकी सेवा पूजा की सुन्दर व्यवस्था करना; अल्प काल में ही सर्व शास्त्र पारङ्गत हो जाना, आठ वर्ष की आयु में स्वामिनी श्रीराधा से मंत्र ग्रहण करके शिष्य होना इत्यादि बातें इनके अलौकिक स्वरूप को प्रकट करती हैं। अस्तु; उपवीत संस्कार और विद्याध्ययन के पश्चात् व्यास मिश्र ने आपका विवाह किया। आपकी धर्मपत्नी श्रीरुक्मणी देवी, पूर्ण पति परायणा, सुशीला और भक्ता थीं अतः उनके संग से आपको राधा भक्ति के प्रचार में अच्छी सहायता मिली। स्वामिनी श्रीराधा की आज्ञानुसार आपने अपने देश में विशुद्ध प्रेम लक्षणा श्रीराधा भक्ति का प्रचार किया। इस तरह घर में ही आपकी आयु बत्तीस वर्ष की हो गयी। इस बीच में आपके तीन पुत्र और एक पुत्री ने जन्म ग्रहण किया ; जिनके नाम क्रमशः श्रीवन चन्द्र, कृष्ण चन्द्र गोपीनाथ और साहिब देवी हैं। विपुल सम्पत्ति, योग्य सन्तति, अनुकूल पत्नी और सबसे विशिष्ट राज प्रतिष्ठा का भी परित्याग करके आप बतीस वर्ष की आयु में लोक कल्याण की भावना से श्रीवन के लिये विदा हुए। किन्तु श्रीकृष्ण की अचिन्त्य लीला शक्ति ने अपना काम किया। आपको एक की जगह दो दो कन्याओं से विवाह करना पड़ा। दहेज में अपार सम्पत्ति के साथ श्रीराधा वल्लभ जी का श्रीविग्रह भी मिला। आत्मदेव अपनी दोनों कन्याएँ श्रीकृष्ण दासी एवं मनोहरी दासी को श्रीहरिवंश चन्द्र को समर्पित कर भजन करने हिमालय चले गये और आप प्रभु विधान को सहर्ष स्वीकार कर समस्त समाज के साथ श्रीवन आये। विक्रम संवत् १५९१ कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी को आपने श्रीवन में प्रथम निवास