हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ • • हित चौरासी किया। ब्रज वासियों ने आपका खूब आदर सत्कार किया, रहने को भूमि दी, कुटियाएँ निर्माण कीं, और तन, मन धन से आपकी सेवा में लग गये। भै गाँव के राजा नरवाहन जी तो आपके स्वरूप पर मुग्ध होकर मंत्र शिष्य ही हो गये। अब आचार्य्यपाद अपने परिकर सहित श्रीवन में सुख पूर्वक निवास करने लगे। आपके श्रीवन आगमन के एक वर्ष पश्चात् संवत् १५९२ कार्तिकारम्भ में ओरछे के राज पण्डित श्रीहरिराम व्यास श्रीवन आए और आचार्य्यपाद के शिष्य हो गए। स्वामी श्रीहरिदास से भी श्रीहिताचार्य्य की गाढ़ी प्रीति हो गयी। तत्पश्चात् श्रीमत् प्रबोधानन्द सरस्वती पाद ने आपकी शरण ग्रहण की और इस प्रकार श्रीवृन्दावन रसिक अनन्यों का खासा अखाड़ा बन गया। इनमें से श्रीहरिवंशी श्रीहरिदासी का योग मानों मणि काञ्चन योग हुआ और उसमें व्यासजी के मिलने पर यह रसिक संगम 'रसिक त्रिवेणी' के नाम से प्रख्यात हो गया। अस्तु; श्रीहिताचार्य्य पाद श्रीवन में अठारह वर्ष संवत् १६०९ विक्रम तक विराजमान् रहे और शारदीय पूर्णिमा को आप अपने नित्य परिकर में चले गये। आपने अपने १८ वर्ष श्रीवन वास के जीवन में जिस रस की धारा बहायी वह रस- 'वृन्दावन रस' के नाम से प्रख्यात है। वह आपके ग्रन्थ श्रीराधा सुधा निधि, हित चौरासी एवं स्फुट वाणी के रूप में प्राप्त है। इस वृन्दावन रस को समझने के लिये पाठकों को तीन बातों का जानना आवश्यक है- १. श्रीहित हरिवंश का इष्ट तत्व २. श्रीहित हरिवंश का उपासना भाव और ३. नित्य विहार का स्वरूप अतः अब हम इन तीनों का क्रमशः संक्षिप्त वर्णन करेंगे- श्रीहित हरिवंश का इष्ट तत्व- श्रुति ने जिसे-रसो वै सः रस रूप ब्रह्म कहा है वह रस ब्रह्म वृन्दावन विलासी श्रीकृष्ण है। ये श्रीकृष्ण समस्त श्रुति स्मृति पुराण एवं तन्त्रादिकों से प्रतिपादित सार-सारतत्व हैं किन्तु फिर उनसे अलक्षित भी हैं। उनके लीला