हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • ५७ अरुन नूत पल्लव पर कूँजत कोकिल कीर। निर्त्तनि करत सिखी कुल अति आनंद अधीर॥ बहत पवन रुचि दायक सीतल मंद सुगंध। अरुन नील सित मुकुलित जहँ तहँ पूषन बंधु॥ अति कमनीय विराजत मंदिर नवल निकुंज। सेवत सगन प्रीति जुत दिन मीन ध्वज पुंज॥ रसिक रासि जहँ खेलत स्यामा स्याम किसोर। उभय वाहु परिरंजित उठे उनींदे भोर॥ कनक कपिश पट सोभित सुभग साँवरे अंग। नील वसन कामिनि उर कंचुकि कसूँभी सुरंग॥ ताल रबाब मुरज डफ बाजत मधुर मृदंग। सरस उकति गति सूचत बर बँसुरी मुख चंग॥ दोउ मिलि चाँचरि गावत गोरी राग अलापि। मानस मृग बल बेधत भृकुटी धनुष दृग चापि॥ दोउ कर तारिनु पटकत लटकत इत उत जात। हो हो होरी बोलत अति आनँद कुलकात॥ रसिक लाल पर मेलत कामिनि बन्दन धूरि। पिय पिचकारिनु छिरकत तकि तकि कुंकुम पूरि॥ कबहुँ कबहुँ चंदन तरु निर्मित तरल हिंडोल। चढ़ि दोऊ जन झूलत फूलत करत कलोल॥ वर हिंडोर झँकोरनि कामिनि अधिक डरात। पुलकि पुलकि वेपथु अँग प्रीतम उर लपटात॥ हित चिंतक निजु चेरिनु उर आनँद न समात। निरखि निपट नैननि सुख त्रिन तोरतिं बलि जात॥ अति उदार विवि सुंदर सुरत सूर सुकुमार। (जै श्री) हित हरिवंश करौ दिन दोऊ अचल विहार॥ – हित चौरासी, पद ५७