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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 69

६४ - • हित चौरासी अस्तु दोनों प्रेमी हैं, दोनों प्रेमास्पद हैं। दोनों दोनों पर अपने कोटि कोटि प्राणों को न्यौछावर करते हैं, दोनों प्रेम सरोवर के हंस हंसिनी हैं ये दो होकर भी एक हैं ऐसा ही कुछ महात्मा श्रीभगवत रसिकजी ने कहा है- परस्पर दोउ चकोर दोउ चंदा। दोउ चातक, दोउ स्वाति, दोउ घन, दोउ दामिनी अमन्दा।। दोउ अरविंद, दोऊ अलि लंपट, दोऊ लोहा, दोऊ चुम्बक। दोऊ आशिक, महबूब दोऊ मिलि, जुरे जराफा अंबक।। दोऊ मुदार, दोउ मोर, दोऊ मृग, दोऊ राग रस भीने। दोउ मनि विसद, दोऊ पर पन्नग, दोऊ वारि दोउ मीने।। 'भगवत रसिक' विहारिनि प्यारी रसिक विहारी प्यारे। दोउ मुख देखि जियत अधरामृत पियत होत नहिं न्यारे।।

  • २ - अवतरण-किसी विशेष सम्भ्रम से श्रीस्वामिनी को मान हो गया है। वे निकुञ्जान्तर भाग में विमना सी बैठी हैं। श्रीस्वामिनीजी को श्रीहित सजनि मधुर वचनों द्वारा चाटुकारी करती हुई प्रसन्न करना चाह रही हैं अतएव श्रीलालजी के गुण, रूप आदि के प्रशंसा पूर्ण शब्दों द्वारा उनके चित्त में प्रियतम मिलन का प्रलोभन उत्पन्न कर रही हैं। कुछ ही समय में उनका प्रयास सफल भी हो जाता है और सहज ही भोली श्रीराधा का मान कर्पूर की भाँति उड़ जाता है। पश्चात् वे शीघ्र ही अपने प्राणाधार प्रियतम से जा मिलती हैं। इस पद में उसी सरस वचन रचना और मान भञ्जन भावना का वर्णन है। मानवती श्रीप्रियाजी से हित सजनि ने कहा- राग -विभास मूल - प्यारे बोली भामिनी, आजु नीकी जामिनी; भेंटि नवीन मेघ सौं दामिनी।। मोंहन रसिक राइ री माई तासौं जु मान करै, ऐसी कौन कामिनी।