हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 68, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • ६३ सौन्दर्य आते तक नहीं। यदि श्रीप्रियाजी को प्रियतम के नयनों में भाँवती ठौर है, तो प्रियतम भी उनकी आँखों के तारे बन जाना चाहते हैं। जब आखों के तारे ही बन जायेंगे, तब तो अपने प्रिय-पात्र के सिवाय और कुछ दिखेगा ही नहीं, प्रियतम मय त्रिलोकी बन जायगी। कितनी साध है आत्मसात हो जाने की ? इस आत्म सात भावना के साथ साथ विश्व विस्मृति की भी कैसी अव्यक्त सूचना मिलती है इस कथन में ! मेरे तन मन प्रानहूँ तें प्रीतम प्रिय अपने कोटिक प्रान प्रीतम मोसों हारे। इस पंक्ति में प्रेम के महान् उत्सर्ग का रूप है जहाँ युगल किशोर ने अपने कोटि कोटि प्राण एक दूसरे पर न्योछावर कर रखे हैं। स्पष्ट है कि प्रेम राज्य में प्रतिक्षण त्याग पूर्वक प्रेमास्पद के प्रति पूर्ण तत्सुख भावना निवास करती है। और यही प्रेम का सहज स्वभाव है। उक्त पंक्ति में दूसरी बात यह है कि प्रेमास्पद के प्रति किये गये अपने महान्तम प्रेम को भी प्रेमी अत्यन्त नगण्य मानता है और प्रेमास्पद के अल्प प्रेम को भी महान समझता है। प्रेमी प्रेमास्पद एक विशाल 'प्रेम गरीबी' लिये रहते हैं यह प्रेम गरीबी बहुत ही स्वाभाविक है। 'मेरे तन मन हारे' इस पंक्ति में प्रेम गरीबी का बड़ा ही सरस चित्र अङ्कित किया गया है। प्रेम मणि श्रीप्रियाजी अपने प्रति किये गये श्रीलालजी के प्रेम को स्वयं अपने प्रेम से कोटि कोटि गुना मान रही हैं। इसके सिवाय एक बात और भी यह ध्वनित हो रही है कि जिस प्रेम में कोटि कोटि तन मन और प्राण न्योछावर किये जा सकते हैं, उसमें फिर और क्या शेष रह जाता है ? सबको अपने अपने तन, मन प्राण और आत्मा ही सबसे अधिक प्रिय हैं वरं आत्मा की प्रियता से ही सर्वत्र प्रियता आभासित होती है किन्तु जब वही प्राण, तन, मन आत्मा उस प्रेम पर न्यौछावर हो गये, तब अन्यान्य लोक वैभव स्वर्ग-भोग किंवा मोक्ष पर्यन्त की क्या महत्ता है ? यथा- 'लोक वेद कुलकानि सब, देत बहाये प्रेम। (रसखान)