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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 67

६२ • • हित चौरासी इसी प्रकार श्रीराधा तापिन्युपनिषद् में भी- ये यं राधा यश्च कृष्णो रसाब्धि- र्देहश्चैकः क्रीडनार्थं द्विधाऽभूत्।। "(ये रससमुद्र श्रीराधा और श्रीकृष्ण वास्तव में एक देह हैं, केवल क्रीड़ा के लिये ही दो होकर प्रकट हैं।)" ऐसे ही वहीं श्रीराधातापिन्युपनिषद् में फिर भी राधया सहिते देवो माधवे नैव राधिका। योऽनयोर्भेदं पश्यति स संसृतेर्मुक्तो न भवति। यस्तु राधां विना तं ध्यायति, प्रवदति, प्रपठति स मूढतमोत्तमः। (श्रीराधा के सहित श्रीकृष्ण ही पूर्ण श्रीकृष्ण हैं। जो इन दोनों में भेद दृष्टि रखता है, वह कभी संसृति (आवागमन रूप संसार) से मुक्त नहीं हो सकता। जो श्रीराधा के बिना माधव का सेवन करता, पठन करता और कथन वर्णन करता है वह मूढ़ों में भी महामूढ़ है) अतएव श्रीहिताचार्य्य पाद ने यहाँ जल तरङ्गवत् कहकर दोनों की एकता प्रकट की है। (२) जोई जोई प्यारो करै सोई मोहिं भावै; भावै मोहिं जोई सोई करैं प्यारे। इस पंक्ति में श्रीप्रियाजी ने यह बताया है कि मुझे अपने प्रियतम की सब चेष्टाएँ प्रिय लगती हैं और मुझे उनका कुछ भी अप्रिय नहीं है परन्तु विशेषता यह है कि प्रियतम भी वही करते हैं जो कुछ मुझे प्रिय है और जो मुझे अप्रिय है उसे तो वे कभी भूलकर भी नहीं करते इस कथन में दोनों के चित्तों की एकता प्रकाश मिलता है। दूसरी पंक्ति- मोकौं तो भाँवती ठौर प्यारे के नैननिं में, प्यारौ भयौ चाहै मेरे नैननिं के तारे। इसमें यह बताया गया है कि दोनों-प्रिया प्रियतम एक दूसरे के सौन्दर्य-माधुर्य्य पर पूर्ण मुग्ध हैं। इन दोनों की दृष्टियों में विश्व के अन्य