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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 275 में से

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पृष्ठ 66

हित चौरासी • • ६१ राग विभास मूल – जोई जोई प्यारौ करै, सोई मोहिं भावै; भावै मोहिं जोई, सोई सोई करें प्यारे। मोकौं तो भाँवती ठौर प्यारे के नैननि में। प्यारौ भयौ चाहै मेरे नैननि के तारे।। मेरे तन मन प्रानहूँ तें प्रीतम प्रिय; अपने कोटिक प्रान प्रीतम मोसौ हारे। (जै श्री) हित हरिवंश हंस हंसिनी साँवल गौर कहौ कौन करै जल तरंगनि न्यारे।।१।। भावार्थ–(श्रीप्रियाजी ने कहा"हे सखि!) प्यारे श्रीलालजी जो जो भी कुछ करते हैं, मुझे वह सभी प्रिय लगता है और मुझे जो कुछ प्रिय लगता है, वे भी वही सब करते हैं। यदि मुझे केवल उनके ही नेत्रों में रहने योग्य सुहावना स्थल है तो वह भी मेरे नयनों के तारे (पुतलियाँ) बन जाना चाहते हैं। सखि ! वे मुझे मेरे अपने तन, मन और प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं परंतु उन्होंने तो मुझ पर अपने कोटि कोटि प्राण न्यौछावर कर दिये हैं। श्रीराधा की प्रेम विभोरता से भावित श्रीहित सजनी (हित हरिवंश) ने कहा– "हे श्यामल गौर ! आप दोनों वृन्दावन प्रेम पयोधि रूप मान सरोवर के हंस हंसिनी हैं। आप जल तरङ्गवत अपृथक हैं तब आपको पृथक कर ही कौन सकता है ? टिप्पणी-(१) जल तरंगनिः- श्रीराधा और श्रीकृष्ण केवल कथनमात्र के लिये ही दो हैं, वास्तव में तो ये एक ही प्रेम तत्व के दो विग्रह हैं। इनके तन दो हैं किन्तु मन, प्राण, आत्मा एक ही हैं। क्रीड़ा के लिये ही एक प्रेम ने अपने दो और इसीप्रकार अनेक रूप धारण कर रखे हैं। इनके युगल स्वरूप के एकत्व समर्थन के विषय में शास्त्रों में अनेकों वाक्य मिलते हैं यथा-संहिता में– यः कृष्णः सापि राधा या राधा कृष्ण एव सः। (जो श्रीकृष्ण हैं, वही श्रीराधा हैं और जो श्रीराधा हैं वही श्रीकृष्ण हैं।)

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