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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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६० • * हित चौरासी ऐसे सुख पूर्ण, अवसर में रस का स्रोत प्रवाहित करती हुई रसेश्वरी श्रीप्रियाजी ने अपनी निकट सहचरि श्रीहित सजनि से कहा- श्रीहित अलि-राधावल्लभीय रसोपासना क्षेत्र में रसिक महानुभावों ने रसिकाचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद के मुख्यतः चार रूप बताये हैं- (१) आचार्य्य रूप – व्यास नन्दन एवं तारा तनय श्रीहित हरिवंश (२) वंशीरूप – श्रीकृष्ण के अधरों से लगी श्रीराधा का यशोगान कारिणी युगल की नित्य संगिनी (३) श्रीराधा सहचरी रूप- निकुञ्जेश्वरी श्रीराधा की स्वरूप भूता अन्तरङ्ग सहचरि, सखि, सहेली सजनि और दासी आदि रूपों से निरन्तर छायावत् साथ रहते हुए सुख चिन्तन करने वाली एक अन्तरङ्ग सखि जिसे हित अलि, हित सखि, हित सजनि आदि नामों से कहा गया है। (४) सर्व व्यापक हित रूप – ब्रज साहित्य में 'हित' शब्द का सरलार्थ प्रेम है। ये श्रीहित हरिवंशचन्द्र उसी 'हित' अर्थात् प्रेम के अवतार हैं। यह इस प्रकार है कि आप भगवान श्रीकृष्ण की वंशी के अवतार हैं और वंशी साक्षात् प्रेम रूपा है। जैसा कि पद्म पुराण में कहा है- वंशी तत्प्रेम रूपिका। वंशी उन (श्रीकृष्ण) की प्रेम रूपा है'। और श्रीहित हरिवंश चन्द्र स्वयमेव वंशी हैं) यथा- त्वमसि हि हरिवंश श्याम चन्द्रस्य वंशः, परम रसद्नादैर्मोहिताऽशेष विश्वः। – श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती पाद (हे हरिवंशचन्द्र ! यह निश्चय है कि आप स्वयं श्रीकृष्ण की वंशी के अवतार हैं; जिस वंशी ने अपने परम रसमय नाद से सम्पूर्ण विश्व को मोहित कर लिया था) प्रेम ही परमात्मा है, सर्वोपरि तत्व है। यह प्रेम निर्गुण सगुण व्यापक, एवं महान् है। अतः प्रेम रूप श्रीहित हरिवंशचन्द्र भी व्यापक हैं।