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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 64

श्रीहित हरिवंश चन्द्रो जयति। श्रीहित राधावल्लभो जयति। हित चौरासी (सार्थ एवं सटिप्पण)

  • १ - अवतरण—श्रीराधा पद पङ्कज मधुकर, रसिकावतंस अनन्त श्रीगोस्वामी हित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद ने महामधुर एवं परमोज्वल शृङ्गार—श्रीवृन्दावन रस विलास की जो अजस्र एवं अनुपम प्रेम तरङ्गिणी प्रवाहित की है, उसकी एक एक छलक प्रत्येक कल्लोल ही 'हित चौरासी' के प्रत्येक पद हैं। प्रथम छलक रूप इस पद में प्रेमोत्सर्ग और 'तत्सुखित्व सुखितम्' की महान् एवं सर्वोत्कृष्ट झाँकी है। इसमें प्रेम की एकात्मता का गहरा परिचय मिलता है। यह पद रस सिद्धान्त का मूल है—प्राण है। इस पद वर्णना में श्रीहिताचार्य्य चरण ने श्रीराधा के मुख से (श्रीहित अलि के प्रति) जो कुछ कहलवाया है, उससे युगल किशोर के पारस्परिक असीम प्रेम, त्याग तत्सुखित्व, सेवा भाव ऐकान्तिक एकात्म भाव का सुन्दर दर्शन होता है। अस्तु, रसधाम श्री वृन्दावन में वसन्त की सुहावनी सन्ध्या है। समस्त वन अरुणिम नव नव पल्लव से सज्जित एवं पुष्पों से आभूषित हो रहा है, मानो आनन्द मोद में झूम झूम कर रँग रलियाँ सी कर रहा है। प्रेमामृत वाहिनी कलिन्द नन्दिनी के सुरम्य तट पर परम मनोहर एवं दिव्य लता भवन है। लता गृह के चारों ओर सखि समूह अपने अपने सेवा कार्य में संलग्न हैं। कुंज के अभ्यन्तर कक्ष में प्रेम, माधुर्य्य एवं रस की अधिष्ठात्री नवल किशोरी श्रीराधा अपने कोटि प्राणोपम प्रियतम के सुकण्ठ में अपनी कोमल बाहु लता लपेटे सुन्दर सुकोमल कुसुम शय्या पर विराज रही हैं। सम्मुख निकट ही मणिमय चौकी पर रूप लावण्यमयी, दिव्य गुण गण विचक्षणा, प्रेम प्रतिमा श्रीहित सजनि ऐसी शोभित हैं जैसे दूसरी नवल किशोरी श्रीराधा।