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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

६६ • • हित चौरासी शोभित हैं एवं समस्त अङ्ग प्रत्यङ्गों के आभरण अस्त व्यस्त हैं। (ललाट पटल का) तिलक कुछ कुछ शेष रह गया है। अलकावलि शिथिल (ढीली) हो चुकी है (और बिखर रही है, जिससे ऐसा) विदित होता है कि वदन कमल पर प्रमत्त भ्रमर मँडरा रहे हैं। श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि (युगल किशोर) प्रेम (मदन) के (आनन्द) रङ्ग में रञ्जित हो रहे हैं, उनके नयन वचन, कटि एवं कटि के वस्त्र (सारी आदि) सभी तो शिथिल हैं। टिप्पणी— 'मदन रँग रँगि रहे' श्रीवृन्दावन विहार में शृङ्गार और शृङ्गारोत्तर रस की ही प्रधानता है। इस रस का वर्णन करने में रसिकाचार्य्य एवं रसिक महानुभावों ने यत्र-तत्र प्रेम के विशुद्ध अर्थ में काम, मदन, मार, स्मर, मन्मथ, मनसिज, मनोज आदि शब्दों का प्रयोग किया है। चूंकि उक्त सभी शब्द 'कामदेव' के ही अर्थ के वाचक हैं, तथापि उन महात्माओं का भाव और अर्थ इन प्रयोगों में प्रेम से ही रहा है। शास्त्रों एवं सन्तों ने इसका बड़ा सुन्दर स्पष्टीकरण किया है। 'श्रीचैतन्य चरितामृत' के प्रणेता श्रीकृष्ण दासजी ने काम और प्रेम का अर्थ समझाते हुए कहा है— आत्मेन्द्रिय प्रीति इच्छा तार काम नाम। श्रीकृष्णोर प्रीति इच्छा तार प्रेम नाम।। अतएव काम प्रेमे बहोत अन्तर। काम अन्धतम प्रेम निर्मल भास्कर।। अतएव गोपीगण न करे विचार। कृष्ण सुख हेतु करे संगम विहार।। (निज सुख की वासना ही काम है और प्रेमास्पद को सुखों की पूर्ति करना ही प्रेम है। इस न्याय से सखियों किंवा श्रीप्रिया प्रियतम का प्रेम, पूर्ण तत्सुख रूप होने से काम आदि शब्दों के द्वारा प्रकट किये जाने पर भी उज्ज्वल प्रेम है।

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