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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 275 में से

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पृष्ठ 72

हित चौरासी • • ६७ दूसरे इस दिव्य शृङ्गार रस को काम आदि शब्दों से प्रकट करने का एक तात्पर्य और भी यह है कि यह वृन्दावन विहार रस स्थूल दृष्टि से देखने पर 'काम रस' जैसा ही दिखता है किंतु वास्तव में वह ऐसा है नहीं। इसे यों समझ सकते हैं जैसे शुद्ध खाँड़ से एक तूँबी का आकार निर्मित कर दिया जाय; जो केवल देखने में कड़वी तूँबी सी दिखने पर अन्तर बहिर माधुर्य से ओत प्रोत हो। उक्त प्रसङ्गों में व्यवहृत 'काम' शब्द के अर्थ को श्रीगोपाल तापिन्युपनिषद में इस प्रकार समझाया गया है- प्रेमैव गोप रामाणां काम इत्यगमत् प्रथाम्। "(इन गोप रमणियों का प्रेम ही काम नाम से कहे जाने की परिपाटी है) – ४ – अवतरण—मनोरम प्रातः काल है। रुचिर कुञ्ज भवन में सम्पूर्ण रात्रि भर श्रीयुगल किशोर रसिक राज किसी अनिर्वचनीय रस विहार में तल्लीन रहे हैं, फिर भी दोनों के चित्तों से रस की लालसा न्यून नहीं हुई वरं वृद्धि को ही प्राप्त हुई है किन्तु प्रातः काल होने से विवशता पूर्वक विहार–उपरत होना पड़ा है। जिन प्रेम मयी सखियों ने सम्पूर्ण रात्रि कुञ्ज रन्ध्रों से लगकर विहार दर्शन पूर्वक अपना जीवन रखा है, वे अरुणोदय काल में अनन्त अनन्त यूथों के रूप में रुचिर कुञ्ज प्राङ्गण में उपस्थित हैं। समस्त साभिलाष सखियों की भावनाओं की साक्षी श्रीहित सजनि कुञ्ज के अन्तर्भाग में प्रवेश करती हैं। वहाँ पर श्रीस्वामिनी जी की रति विगलित दशा का अपूर्व दर्शन करके कुछ मुसका देती हैं। हित सजनि की विशेषार्थ व्यञ्जिका हँसी से सङ्कुचित होकर श्रीप्रियाजी लजा जाती हैं एवं अपने रति रस सूचक चिह्नों को छिपाने लगती हैं। तब उनके संगोपन रूप व्यर्थ प्रयास की उपेक्षा पूर्वक रस–वृद्धि करती हुई श्रीहित अलिजी कहती हैं–

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